कौन था अमरीका से लेकर फ्रांस की सरकारों को हिलाने वाला ठग

    • Author, डेलिया वेंचुरा
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड

आपने नटवर लाल का नाम और ठगी के कारनामे सुने होंगे लेकिन ये कहानी एक ऐसे शख़्स की है जिसका ठगी के मामले में कोई सानी नहीं था.

पांच भाषाएं बोलने वाले इस शख़्स को कम से कम 47 नामों से जाना गया. इनमें विक्टर लुस्टिग, चार्ल्स ग्रोमर, अलबर्ट फ़िलिप्स, रॉबर्ट जॉर्ज वेग्नर जैसे 47 अन्य नाम शामिल हैं.

हमने अब तक आपको इनका असली नाम नहीं बताया है. क्योंकि, सच कहें तो हमें भी नहीं पता.

अमरीकी जांच एजेंसी एफ़बीआई से जुड़े साल 1935 के इस दस्तावेज़ को देखिए. ये उस शख़्स के बारे में बताता है जो कई दशकों तक जांच एजेंसियों की आंखों में किरकिरी बना रहा.

हालांकि, एफ़बीआई ने इस ठग को विक्टर लुस्टिग कहा है लेकिन ये नाम इसके 47 अन्य नामों में से एक ही है.

खुलेआम उड़ाता था एफ़बीआई का मज़ाक

इस ठग की कहानी में जब जब एफ़बीआई का नाम आता है तो कहानी अपने आप दिलचस्प हो उठती है.

ब्रिटिश पत्रकार जैफ़ मेश ने इस किस्से पर 'हैंडसम डेविल' नाम की किताब लिख़ी है.

जैफ़ बताते हैं, "जब भी वो एफ़बीआई से भाग रहा होता था तो अपना पीछा करने वाले एजेंट्स का मज़ाक उड़ाने के लिए उनके नाम से होटलों में कमरे बुक करने और उनके नाम पर जहाजों की सवारी किया करता था."

एफ़बीआई के दस्तावेज़ के मुताबिक वह एक अक्टूबर, 1890 को होस्टाइन में पैदा हुआ था. होस्टाइन पहले अस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य था और अब हम इसे चेक गणराज्य के नाम से जाना जाता है.

लेकिन ये भी सबसे ज्यादा कही जाने वाली बात ही है.

जैफ़ बताते हैं, "उसने हमें इतनी कहानियां सुनाईं कि हम आज भी ये तक नहीं जानते कि वो पैदा कहां हुआ था. मैंने एक स्थानीय इतिहासकार से इस बारे में बात की लेकिन यहां के दस्तावेज़ों में उसके इतने नामों में से कोई भी पंजीकृत नहीं है. वो यहां था ही नहीं!"

मोहब्बत में घायल हुआ था ये शख़्स

अमरीका में 1920 का दशक खूंखार गैंगस्टर अल कपोनी और जैज़ के लिए जाना जाता है.

ये वो दौर था जब पहला महायुद्ध ख़त्म हुआ था, अमरीका अपने चढ़ान पर था. डॉलर के आने और जाने की स्पीड बेहद तेज थी.

इसी दौर में अमरीका के 40 शहरों के जासूसों ने इस ठग को अल सिट्राज़ निकनेम दिया था.

सिट्राज़ एक स्पैनिश शब्द है जिसका अर्थ घाव होता है.

और, ये नाम इस शख़्स के बाएं गाल पर एक चोट के निशान की वजह से मिला था जो उसे पेरिस में उसकी एक महबूबा से मिला था.

और, जब बिक गया पेरिस का एफ़िल टावर

ये साल 1925 की बात है.

अमरीकी सीक्रेट सर्विस के एजेंट जेम्स जॉनसन के संस्मरण के मुताबिक, विक्टर लुस्टिग मई के महीने में पेरिस पहुंचा.

लुस्टिग ने पेरिस के एक लग्ज़री होटल में मैटल वेस्ट इंडस्ट्री के बड़े उद्योगपतियों के साथ एक मीटिंग का आयोजन किया.

इस मीटिंग के लिए लुस्टिग ने खुद को फ्रांसीसी सरकार का अधिकारी बताकर सरकारी स्टांप के साथ पत्र भिजवाया.

लुस्टिग ने इस मीटिंग में कहा, "इंजीनियरिंग से जुड़ी असफलताओं, खर्चीली मरम्मत और कुछ राजनीतिक समस्याएं जिन्हें मैं आपके साथ साझा नहीं कर सकता, की वजह से एफ़िल टावर का गिरना आवश्यक है."

उसने कहा, "टावर सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को दिया जाएगा."

इस मीटिंग में मौजूद किसी भी व्यापारी ने लुस्टिग के इस प्रस्ताव पर शक नहीं किया क्योंकि उन्होंने समझा कि ये फ्रांसीसी सरकार का एक कदम है.

कुछ सूत्रों का कहना है कि उसने ऐसा एक बार फ़िर किया. वह होटल में छिपा रहा और जब उसे पता चला कि वो एक बार फ़िर ऐसा कर सकता है तो उसने एक बार फ़िर ऐसा कर दिखाया.

विक्टर लुस्टिग ने अपनी जिंदगी में ऐसे कई किस्सों को अंजाम दिया जिसने कई सरकारों की रातों की नींद हराम कर दी.

जेलों को तोड़ना उसके लिए बाएं हाथ का खेल था.

लेकिन, आखिर में अमरीकी सरकार ने उसे एक अल्काट्राज़ जेल में रखा जहां साल 1947 में 11 मार्च को शाम के आठ बजकर 30 मिनट पर उसकी मौत निमोनिया से हुई.

वो सबसे खर्चीला और शानशाही से रहने वाला ठग था लेकिन उसकी मौत के सरकारी दस्तावेज़ में उसे सिर्फ़ नौसिखिया सेल्समैन कहा गया.

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