पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा
सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) के अध्यक्ष और पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने
कहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूरी तरह से सैनिकों के पीछे हटने के लिए एक पैकेज डील के बजाय सैनिकों को “चरणबद्ध” तरीक़े से पीछे करने पर सहमति का फ़ैसला भविष्य में चिंता की वजह बन
सकता है.
श्याम सरन का
कहना है कि उत्तरी पैंगोंग त्सो के फिंगर एरिया में बफर ज़ोन या “नो मेंस लैंड” बनाना, चाहे वो अस्थायी हो, इसका मतलब होगा कि सैनिक
अप्रैल 2020 के पहले की यथास्थिति में नहीं लौट सकेंगे. उन्होंने कहा कि भविष्य इस
बात पर निर्भर करेगा कि बीते सप्ताह शुरू हुए डिसएंगेजमेंट की बाक़ी प्रक्रिया
कितनी सुचारू रूप से चल पाती है.
श्याम सरन ने द हिंदू अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “पहले हमें ऐसा आभास
मिला कि भारतीय साइड इस इंगेजमेंट को सेक्टर दर सेक्टर नहीं बल्कि पूरे एलएसी पर
कर रही है, जिसमें हॉट स्प्रिंग एरिया और देपसांग भी शामिल होगा.”
उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि ये यथास्थिति में वापस आना होगा, जिसकी हम लगातार मांग कर
रहे थे. ऐसा लगता है कि हम सीमा पर शांति बहाल करने पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं,
बजाय ये कहने के कि हमें बीते साल अप्रैल के आस-पास की स्थिति में वापस लौटना
चाहिए.”
शनिवार को भारतीय और चीनी कोर कमांडरों ने बैठक कर हॉट स्प्रिंग्स और गोगरा बिंदु
जैसे क्षेत्रों में डिसएंगेजमेंट के अगले चरण पर चर्चा की, जहाँ चीनी सैनिकों ने
बीते साल बहुत बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है, हालांकि जुलाई
2020 में एक आंशिक डिसएंगेजमेंट (सैनिकों का पीछे हटना) हुआ था.
सीमा पर तनाव घटाने को लेकर हुए चीन के साथ समझौते की कई विशेषज्ञ आलोचना कर रहे हैं. जाने-माने सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने भी ट्वीट कर कहा है कि चीन को पीछे हटना था और पिछले साल के अप्रैल महीने से पहले की यथास्थिति लाने की ज़िम्मेदारी उसी की थी लेकिन भारत अपने सैनिकों को पीछे क्यों कर रहा है?
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और चीन में भारत के राजदूत रहे शिवशंकर मेनन ने भी इस इस समझौते को भारत के हक़ में नहीं बताया है. मेनन ने जाने-माने पत्रकार करन थापर को दिए इंटरव्यू में कहा है कि चीन को पीछे हटना था लेकिन भारत उन इलाक़ों से पीछे हट रहा है, जहाँ भारतीय सैनिक पहले से गश्त लगाते रहे हैं. मेनन ने कहा है कि चीन दो क़दम आगे बढ़ता है और एक क़दम पीछे हटता है और यही उसकी रणनीति रही है.
2013 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए एलएसी पर इन्फ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत से जुड़े सुझावों की एक रिपोर्ट तैयार करने वाले श्याम सरन के मुताबिक़, डिसएंगेजमेंट के पहले चरण में भारतीय सैनिकों का कैलाश रेंज हाइट्स, जिसमें रेचिन ला और रेजांग ला शामिल हैं, उसे ख़ाली करने का फ़ैसला तब मान्य होता जब सभी अन्य क्षेत्रों को ख़ाली करने का “समग्र समझौता” किया जाता, जिसका चीन भी पालन करता.
हालांकि, उन्होंने कहा कि 2017 में डोकलाम विवाद के बाद भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को भूटान के क्षेत्र में एक सड़क बनाने से रोक दिया था, लेकिन चीनी सैनिक बाद में उसी क्षेत्र के अन्य इलाक़ों में सड़कों और इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करने लगे.
वो कहते हैं, अगर कैलाश रेंज खाली करना एक बड़े समझौते का हिस्सा है, जहां हम यथास्थिति पर लौट जाएंगे और इस प्रक्रिया की आख़िर में पूरे एलएसी पर डिसएंगेजमेंट करवा पाते हैं तो हाँ, ये ठीक रहेगा. लेकिन अगर हम इन ऊंचाई वाली जगहों को ख़ाली कर देते हैं और बाद में हमें पता चलता है कि चीनी डिसएंगेजमेंट की हमारी उम्मीद उस तरह से पूरी नहीं हुई जो ज़मीन पर हुआ है, तो हाँ, हम कहेंगे कि ये हमारी तरफ़ से कोई होशियारी भरा क़दम नहीं था.
जब उनसे पूछा गया कि उन्हें क्या लगता है कि चीन डिसएंगेजमेंट के लिए राज़ी क्यों हुआ होगा, जबकि उसने क़रीब एक साल से एलएसी के पास के इलाक़े कब्ज़े में लिए हुए हैं, इस पर सरन ने कहा कि हो सकता है चीन ने “ग़लत अनुमान” लगा लिया हो कि उसके आक्रामक रवैये की“ कम क़ीमत या कम जोखिम” होगा.
लेकिन गलवान की घटना के बाद जिसमें 20 भारतीय सैनिक मारे गए थे और चीन ने भी अपने कम से कम चार सैनिक मारे जाने की बात कही है, चीनी“स्क्रिप्ट” उम्मीद के मुताबिक़ नहीं रही और बल्कि ऐसा भी लग सकता है कि चीन को तनातनी से ज़्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ, क्योंकि भारतीय सेना अपनी ज़मीन पर बनी रही.