मारग्रेट थैचर: एक युग का अंत

मारग्रेट थैचर 20वीं सदी की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक थीं. श्रीमती थैचर की विरासत उनके बाद बने ब्रिटेन के प्रधानमंत्रियों की नीतियों में झलकती रही. भले ही उनका संबंध कंजर्वेटिव पार्टी से हो या फिर लेबर पार्टी से.
हालांकि बतौर प्रधानमंत्री उनके 11 साल के कार्यकाल में अनुदारवादी और कभी कभी टकराव वाला नजरिया भी देखने को मिला.
श्रीमति थैचर ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए आम लोगों के कल्याण के लिए कई काम किए. उन्होनें कम आमदनी वाले लोगों के लिए बने-बनाए सरकारी घर दिए. उनके ही कार्यकाल में गरीब लोगों को ब्रिटिश गैस और बीटी में हुए निजीकरण के बाद उनमें शेयर होल्डर बनने का मौका मिला.
लेकिन उन्होंने आम सहमति से चलने वाली राजनीति को खारिज कर दिया और इसीलिए कई लोगों की आंखों में वह खटकने लगीं.
उनकी नीतियों और काम करने के तौर तरीकों का विरोध होने लगा और अंततः न सिर्फ उनकी पार्टी में विद्रोह हो गया बल्कि सड़कों पर भी लोगों का विरोध दिखाई दिया.
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पिता का असर
मारग्रेट हिल्डा थैचर का जन्म 13 अक्टूबर, 1925 को लिंकनशायर के ग्रैंथेम में हुआ और उनके पिता एल्फ्रेड रॉबटर्स की अपनी परचून की दुकान थी. इसके अलावा वो मैथेडिस्ट चर्च के धर्म प्रचारक और स्थानीय परिषद के सदस्य भी थे.
मारग्रेट के जीवन और उनकी नीतियों पर उनके पिता का बहुत प्रभाव रहा.
उन्होंने ऑक्सफर्ड के समरविले कॉलेज से पढ़ाई की और वो ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी में कंजर्वेटिव एसोसिएशन की तीसरी महिला अध्यक्ष बनीं.

स्नातक की पढ़ाई के बाद वो कॉलसेस्टर चली गईं और जहां उन्होंने एक प्लास्टिक कंपनी के साथ काम किया और इसके साथ ही वे कंजरवेटिव पार्टी की स्थानीय इकाई के लिए भी काम करने लगीं.
1949 में उन्होंने पहली बार केंट में डार्टफोर्ड की सीट से चुनाव लड़ा लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
1951 में उन्होंने एक तलाकशुदा कारोबारी से शादी की. इसके दो साल बाद वे बैरिस्टर बन गईं और उसी साल उनके जुड़वां बेटों का जन्म भी हुआ.
मारग्रेट थैचर 1959 में संसद की सदस्य बनीं और दो साल के भीतर ही उन्हें जूनियर मिनिस्टर बना दिया गया.
इसके बाद 1964 के आम चुनावों में कंजरवेटिव पार्टी की हार के बाद वो छाया मंत्रिमंडल की सदस्य बनाई गईं.
'दूध छीनने वाली'
जब 1970 के आम चुनावों के बाद कंजर्वेटिव पार्टी की सत्ता में वापसी हुई और टैड हीथ प्रधानमंत्री बने तो थैचर को शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई.
लेकिन जब उन्होंने सात से 11 साल के बच्चों को स्कूल में दूध दिए जाने की योजना रोक दी तो विपक्षी लेबर पार्टी की ओर से उन पर खूब हमले किए गए और उन्हें 'दूध छीनने वाली' करार दिया और नारा उछाला गया “मारग्रेट थैचर, मिल्क स्नैचर”.
1975 में वो छद्म मंत्रिमंडल में पर्यावरण मंत्री बनाई गईं, लेकिन वह इस बात से नाराज थी कि हीथ ने कंजरवेटिव पार्टी की आर्थिक नीतियों के बिल्कुल उलट रुख अख्तियार कर लिया है.
इसलिए उन्होंने कंजर्वेटिव पार्टी के नेता पद के लिए चुनाव में हीथ के खिलाफ उतरने का फैसला किया. चुनाव के पहले दौर में ही उन्होंने हीथ को हरा दिया जिसके बाद हीथ को इस्तीफा देना पड़ा.
दूसरे दौर में उनका सामना विली व्हाइटलॉ से हुआ लेकिन जीत मारग्रेट को मिली और वो ब्रिटेन के इतिहास में किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी की पहली महिला नेता चुनी गईं. जल्दी ही उन्होंने नेता के तौर पर अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी.
1976 में अपने एक भाषण में जब उन्होंने सोवियत संघ की दमनकारी नीतियों की आलोचना की तो रूस के एक अखबार ने उन्हें 'लौह महिला' कहा. इससे वो बहुत खुश हुईं.
नीतियां

1979 में प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद उन्होंने देश की भूमिका को सीमित कर मुक्त व्यापार को बढ़ावा दिया ताकि ब्रिटेन की वित्तीय हालत को दुरुस्त किया जा सके.
इस सिलसिले में कई बिल पेश किए जिनका मकसद सरकारी उद्योगों का निजीकरण करना था. साथ ही गरीब लोगों को ये सुविधा दी गई कि जो सरकारी घर उन्हें रहने के लिए दिए गए हैं, वे चाहें तो उन घरों को खरीद सकते थे.
इससे पहले ब्रिटेन के जिन लाखो लोगों की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी बिल्कुल नहीं थी या थी तो बहुत ही कम, वे लोग अब घर खरीदने में सक्षम थे और सरकारी कंपनियों के निजीकरण के बाद उनके शेयर खरीद सकते थे.
नई मौद्रिक नीतियों के बाद लंदन दुनिया में सबसे तड़क भड़क वाले और सफल वित्तीय केंद्रों में से एक बन गया.
1982 आते-आते ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटनी शुरू हो गई और इससे लोगों में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता भी बढ़ने लगी.
वे लोकप्रियता के चरम पर 1982 में उस वक्त पहुंची जब उन्होंने फॉकलैंड द्वीप समूह पर अर्जेंटीना के हमले का सख्ती से जवाब दिया और उसे पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया.
1983 के चुनावों में कंजर्वेटिव पार्टी को भारी जीत मिली.
अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन थैचर की आर्थिक नीतियों के प्रबल समर्थक थे. हालांकि पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री ने सोवियत संघ के सुधारवादी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव के साथ भी गठबंधन किया.
थैचर का ये बयान खासा मशहूर हुआ था, “हम एक साथ कारोबार कर सकते हैं.”
सत्ता से किनारा

वो 1987 में लगातार तीसरी बार आम चुनाव जीतीं. लेकिन 1989 में यूरो शिखर सम्मेलन और अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों जिओफ्री और माइकल हेसेलटाइन के साथ मतभेदों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया.
इसके बाद जॉन मेजर को उनके उत्तराधिकारी के तौर पर चुना गया और मारग्रेट थैचर सांसदों वाली कुर्सियों पर लौट आईं. 1992 में उन्होंने चुनाव न लड़ने का फैसला किया जब तमाम अटकलों के विपरीत कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में लौट आई.
उन्होंने बाद में अपने दो संस्मरण भी लिखे. 2001 में जब उनकी तबियत खराब रहने लगी तो उन्होंने अपनी सार्वजनिक गतिविधियां कम कर दीं.
उनके डॉक्टरों ने उन्हें सार्वजनिक तौर पर भाषण देने या कार्यक्रमों में हिस्सा न लेने की हिदायत दी थी.
थैचर के समर्थक उन्हें बोझ तले दबे देश को वापस पटरी पर लाने, ताकतवर मजदूर यूनियनों का असर कम करने और दुनिया में ब्रिटेन का रुतबा बहाल करने का श्रेय देते हैं.
बेशक वे दमदार राजनेता थी जिनमें मजबूती से खड़े रहने का मद्दा था, भले ही परिस्थितियां उनके अनुकूल रही हों या विपरीत.












