देवीमाया, 28 साल, नेपाल
देवीमाया (बदला हुआ नाम) पूर्वी नेपाल की रहने वाली है. देवीमाया और उसका पति कुवैत और सउदी अरब में नौकरी करते थे. 2008 में देवीमाया के साथ बलात्कार हुआ. वह गर्भवती हो गई. वहां से नेपाल लौटने के बाद उसने एक विकलांग बच्ची को जन्म दिया.
देवीमाया की कहानी पढ़िए उनकी ही ज़ुबानी:
"मैंने बलात्कार के बारे में अपने पति को फोन पर बताया. वे उस समय सउदी अरब में थे. उन्होंने मुझे सांत्वना दी और कहा कि मुझे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. उन्होंने कहा कि वे इस घटना के बारे में नेपाल में अपने माता-पिता से बात करेंगे. उन्हें मनाने की कोशिश करेंगे कि वे मेरे प्रति कोई दुर्भावना न रखें. क्योंकि जो हुआ इसमें मेरी कोई ग़लती नहीं थी. मैं बहुत असहाय महसूस कर रही थी और घर लौटने के लिए बेचैन थी.
कुवैत में यह मामला पुलिस में दर्ज नहीं हो सका क्योंकि मेरे साथ बलात्कार करने वाले को मैं नहीं जानती थी. मैं यह भी नहीं जानती थी कि संबंधित अधिकारियों से कैसे मदद ली जाए. मैं कुवैत के एक घर में आया का काम कर रही थी. वहां की भाषा या स्थानीय तौर-तरीकों की मुझे कोई जानकारी नहीं थी. मदद के लिए किसे कहना है और कहां जाना है, यह भी मालूम नहीं था. मेरे मालिक मदद करने वालों में से नहीं थे.
घर वापस जाने के लिए दो महीने तक उनसे मिन्नतें करती रही, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी. जब उन्हें पता चला कि मैं पेट से हूं यानी गर्भवती हूँ, तब जाकर उन्होंने मुझे छोड़ा.
कुवैत से लौटने के बाद मैंने एक बच्ची को जन्म दिया, वह जन्म से विकलांग है. अब वह क़रीब तीन साल की है.
वापस घर आने के बाद मेरे मां-बाप ने मेरे ससुराल वालों से बात की. उन्होंने उनसे पूछा कि क्या वे मुझे फिर से अपनाना चाहते हैं. उन्होंने मेरे पति से भी बात की. मेरे गर्भ के नौ महीने पूरे होने वाले थे. मेरे पति ने अपने मां-बाप को बताया कि वे मेरे बच्चे को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. वे मान गए और अपने साथ रहने की इजाज़त दे दी. मैं उन्हें कुवैत से पैसे भेजा करती थी.
मगर तीन-चार दिन बीतते ही अचानक उनका रवैया बदलने लगा. उन लोगों ने बातचीत करनी बंद कर दी और मेरे साथ गाली-गलौज करने लगे. यही नहीं, उन्होंने मुझे मारना-पीटना भी शुरू कर दिया. वे चाहते थे कि मैं उनके घर से चली जाऊं, मगर मैंने इनकार कर दिया.
इसके बाद उन्होंने घर का सारा सामान समेटा और निकल गए. आजकल वे कहीं और रह रहे हैं, मुझे नहीं पता कि कहां. हमारे आठ साल के बेटे को भी वे अपने साथ ले गए. तब से मेरे पति ने भी फोन करना बंद कर दिया. मुझे मालूम है कि वे मुझे अब प्यार नहीं करते. मेरे ससुराल वाले इस घर को बेचने की धमकी दे रहे हैं. मगर मैंने भी कानून की मदद ली. एक गैर सरकारी संस्था की मदद से अपने घर को बिकने से बचा लिया.
जब लोगों को पता चला कि मेरे साथ बलात्कार हुआ है तो अधिकांश लोगों का मेरे प्रति व्यवहार बदल गया. उन लोगों ने मुझे काम देना बंद कर दिया. वे यह कह कर ताने देने लगे हैं कि मैं अपने साथ एक ‘मुसलमान बच्चा’ ले आई हूं. लोगों के इसी रवैये के चलते मैंने वहां से बहुत दूर जाकर काम करना शुरू कर दिया, जहां मेरे अतीत के बारे में कोई नहीं जानता.
जीवन बेहद कठिन हो गया है, मगर जब तक मौत नहीं आती मुझे जीना होगा, चलते रहना होगा.
मैंने अपने भाग्य को स्वीकार कर लिया है. मेरे घर वाले गरीब हैं, वे मेरा मनोबल बनाये रखने के अलावा मेरी किसी और तरह से मदद नहीं कर सकते.
मेरे पति के कुछ दूर के रिश्तेदार हैं, जो बड़े दयालु हैं. वे मेरे साथ सहानुभूति रखते हैं. उन्होंने अपनी जमीन के एक टुकड़े पर मुझे काम करने की इजाजत दे दी है. इस तरह मैं अपना और अपनी बच्ची का पेट पालने की कोशिश कर रही हूं."












