भारत-इसराइल के बीच जल्द हो सकता है मुक्त व्यापार समझौता: इसराइली राजदूत

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत और इसराइल के बीच जल्द ही फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) यानी मुक्त व्यापार समझौता हो सकता है.

भारत में इसराइल के राजदूत नाओर गिलोन ने बुधवार को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान इस बात की ओर इशारा किया.

भारत और इसराइल के बीच आधिकारिक रूप से राजनयिक संबंध बहाल होने के तीस साल पूरे होने के अवसर पर इसराइली राजदूत पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि दोनों ही देश एफ़टीए को अंतिम रूप देने के लिए इच्छुक हैं और आने वाले 'उच्चस्तरीय' दौरों में इस पर समझौता हो सकता है.

उन्होंने साफ़ शब्दों में नहीं कहा लेकिन माना जा रहा है कि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू और विदेश मंत्री जल्द ही भारत का दौरा करने वाले हैं.

भारत और इसराइल के बीच एफ़टीए को लेकर 2010 में बातचीत शुरू हुई थी लेकिन इस दिशा में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पा रही थी.

यरुशलम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र मिश्र कहते हैं कि 2016 के बाद से बातचीत लगभग ठप्प पड़ी थी लेकिन साल 2021 में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की इसराइल यात्रा में एफ़टीए को लेकर बातचीत में तेज़ी आई. उस समय लगने लगा था कि साल 2022 में दोनों देशों के बीच एफ़टीए पर हस्ताक्षर हो जाएंगे.

लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर 2010 से चल रही बातचीत अब तक क्यों नहीं पूरी हो पा रही है, इसके जवाब में हरेंद्र मिश्र कहते हैं कि भारत की मांग है कि इसराइल अपने यहां के सर्विसेज़ सेक्टर को भारतीयों के लिए खोले. लेकिन इसराइल इसको लेकर बहुत सहज नहीं लग रहा था.

भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी सितंबर 2022 में अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान कहा था कि जब तक भारत को इसराइल से अच्छी डील नहीं मिलेगी एफ़टीए पर समझौता नहीं होगा. उन्होंने कहा था कि समझौते से दोनों देशों को फ़ायदा होना चाहिए और इसराइल को सर्विस सेक्टर भारत के लिए खोलना होगा.

इसके अलावा भारत की मेक इन इंडिया योजना भी एक मुद्दा है. इसराइली राजदूत ने भी इस तरफ़ इशारा किया था.

दरअसल मेक इन इंडिया के तहत विदेशी कंपनियों को भारत में ही अपना सामान बनाना होता है.

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिफ़ेंस स्टडीज़ एंड एनालीसिस में एसोसिएट फ़ेलो सैमुअल राजीव कहते हैं कि सर्विसेज़ सेक्टर के अलावा फ़ार्मास्युटिकल के क्षेत्र को लेकर भी कुछ मतभेद थे.

हरेंद्र मिश्र के अनुसार 2022 में लगभग सहमति हो गई थी लेकिन इस बीच इसराइल एक दूसरे देश से एफ़टीए की बातचीत करने में व्यस्त हो गया था और इस तरह की बातचीत के लिए इसराइल के पास विशेषज्ञों की टीम काफ़ी छोटी है.

हरेंद्र मिश्र कहते हैं कि अब इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच ऐसा लगता है कि सहमति बन गई है और जल्द ही दोनों देशों के बीच एफ़टीए पर दस्तख़त हो सकते हैं.

एफ़टीए से क्या फ़ायदा होगा

1992 में जब भारत ने इसराइल से राजनयिक संबंध स्थापित किए थे उस समय दोनों देशों के बीच 20 करोड़ डॉलर का सालाना कारोबार होता था जो कि अब बढ़कर क़रीब आठ अरब डॉलर हो गया है. इसमें व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है.

हीरे का व्यापार द्विपक्षीय व्यापार का लगभग 50 फ़ीसद है.

भारत एशिया में इसराइल का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, और दुनिया भर में सातवां.

1993 से 2018 के बीच जिन देशों के बीच भारत का एफ़टीए है उनसे व्यापार सालाना 13.4 फ़ीसद बढ़ा है.

सैमुअल राजीव के अनुसार जानकारों का मानना है कि एफ़टीए पर समझौता हो जाने के बाद दोनों देशों के बीच अगले पांच सालों में व्यापार कम से कम दो गुना हो जाएगा.

सैमुअल राजीव के अनुसार इसराइल एक छोटा देश है और भारत उसके लिए एक बड़ा बाज़ार साबित होगा, इसलिए इसराइल इस समझौते के लिए ज़्यादा उत्सुक है. भारत इसराइल की हाईटेक उद्योग का फ़ायदा उठा सकता है.

हरेंद्र मिश्र के अनुसार सर्विस सेक्टर खुलने से भारत के पेशेवर लोगों को इसराइल में नौकरी मिल सकेगी. और इस कारोबार में इसराइल से रक्षा सौदे शामिल नहीं हैं.

रूस के बाद इसराइल भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है और भारत इसराइल के रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा ख़रीदार है.

अदानी को लेकर विवाद

भारत के अरबपति कारोबारी गौतम अदानी ने हाल ही में इसराइल के हाइफ़ पोर्ट का अधिग्रहण किया है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसी महीने संसद में एक भाषण के दौरान कहा था कि गौतम अदानी को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी निकटता के कारण इसराइल में कारोबार मिला है.

इसराइली राजदूत ने राहुल गांधी के इन आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि सिर्फ़ अदानी ही नहीं बल्कि भारत के 80 से ज़्यादा कंपनियों के साथ इसराइल के व्यापारिक समझौते हो रहे हैं.

हरेंद्र मिश्र भी कहते हैं कि गौतम अदानी को इसराइल में व्यापार मिलना पूरी तरह एक व्यापारिक फ़ैसला है और इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है.

सैमुअल राजीव कहते हैं कि चीन ने भी इसराइल के एक बंदरगाह का अधिग्रहण किया है इसलिए अदानी के कारोबार को सिर्फ़ व्यापार के नज़रिए से ही देखना चाहिए और इससे दोनों देशों को फ़ायदा होगा.

इसराइल को लेकर भारतीय विदेश नीति

भारत ने वर्ष 1950 में इसराइल को आधिकारिक रूप से मान्यता दे दी थी लेकिन दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 29 जनरवरी, 1992 को स्थापित हुए थे. भारत में उस समय पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी.

जानकारों का मानना है कि इसराइल को लेकर भारतीय विदेश नीति में किसी तरह का कोई मतभेद नहीं है.

तो क्या राहुल गांधी के बयान के बाद कहा जा सकता है कि इसराइल को लेकर भारत सरकार और विपक्ष के नज़रिए में कोई फ़र्क़ आ रहा है.

सैमुअल राजीव कहते हैं कि इससे भारत और इसराइल के संबंधों में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. हरेंद्र मिश्र भी कहते हैं कि भारत और इसराइल के संबंधों में राजनीतिक हावी नहीं होती है और दोनों देशों में इसको लेकर सरकार और विपक्ष में आम सहमति है.

हरेंद्र मिश्र के अनुसार इसराइल में भी चाहे किसी की सरकार रहे, भारत से उनके संबंधों को लेकर कभी कोई मतभेद सामने नहीं आएं हैं.

भारत और इसराइल के व्यापारिक और सामरिक रिश्ते

तीस साल पहले भारत और इसराइल के बीच रक्षा सौदों से रिश्तों की शुरुआत हुई थी लेकिन आज हथियारों और दूसरे रक्षा उपकरणों के अलावा कृषि, ऊर्जा और दूरसंचार के क्षेत्र में दोनों देशों में सहयोग बढ़ रहा है.

लेकिन व्यापार के अलावा भारत और इसराइल के बीच सामरिक और रणनीतिक संबंध हैं जो बहुत अहम हैं.

कुछ दिनों पहले संयुक्त अरब अमीरात में I2U2 की बैठक हुई थी जिसमें भारत, इसराइल, यूएई और अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व ने हिस्सा लिया था. उसमें कई अहम फ़ैसले लिए गए हैं.

हरेंद्र मिश्र इसका हवाला देते हुए कहते हैं कि यह व्यापार के अलावा एक रणनीतिक और सामरिक संबंध भी है.

उनके अनुसार हाइफ़ा पोर्ट के अधिग्रहण के मामले में I2U2 देशों के बीच इस बात को लेकर सहमति थी किसी भी तरह चीन को इससे बाहर रखा जाए और पूरी कोशिश थी कि इन्हीं चारों देशों के बीच किसी को इसका ठेका मिले.

हरेंद्र मिश्र कहते हैं कि भारत और इसराइल के बीच रणनीतिक संबंध पहले से हैं और I2U2 एक तरह का ऐसा ही प्रयास है कि इसका और विस्तार किया जाए.

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