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COP26: ग्लासगो में जलवायु समझौता क्यों अटका, भारत ने सम्मेलन में ऐसा क्या कहा?
- Author, पॉल रिनकॉन
- पदनाम, साइंस एडिटर, बीबीसी न्यूज़ वेबसाइट
ग्लासगो में चल रहे COP26 शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के ख़तरों को कम करने के लिए किया जाने वाला समझौता बीच में ही अटक गया है.
ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट, ग्रीनहाउस गैसों के लिए सबसे बड़े ज़िम्मेदार जीवाश्म ईंधन और कोयले के इस्तेमाल को कम करने की स्पष्ट योजना बनाने वाला पहला जलवायु समझौता है.
इस समझौते में तत्काल अधिक कार्बन उत्सर्जन में कटौती और विकासशील देशों के लिए ज़्यादा मदद का वादा किया गया, ताकि ग़रीब देशों को जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों के अनुकूल बनाने में मदद की जा सके.
लेकिन वर्तमान समय में की जा रहीं कोशिशें धरती के तापमान की वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लक्ष्य के लिए पर्याप्त नहीं है.
इससे पहले बातचीत के मसौदे में कोयले के इस्तेमाल को 'चरणबद्ध तरीके से ख़त्म' करने की प्रतिबद्धता को शामिल किया गया था लेकिन भारत के विरोध जताने के बाद इसे हटा दिया गया.
इस बिंदु पर भारत के जलवायु मंत्री भूपेंद्र यादव ने पूछा था कि विकासशील देश कोयले और जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को ख़त्म करने का वादा कैसे कर सकते हैं? जबकि उन्हें "अभी भी अपने विकास के एजेंडा और गरीबी उन्मूलन से निपटना है."
आख़िरकार कुछ अन्य देशों की अभिव्यक्तियों के बीच, ये सहमति बनी कि ये देश कोयले के इस्तेमाल को पूरी तरह 'ख़त्म' ना करके 'कम' करेंगे. COP26 के अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा- ''इस तरह की परिस्थितियों के सामने आने का उन्हें दुख है.''
क्यों फंस गया समझौता?
उन्होंने प्रतिनिधि मंडलों से कहा कि इस पूरे समझौते को बचाना हमारे लिए सबसे अहम है, ये बात कहते हुए आलोक शर्मा भावुक भी हो गए.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि 'ग्लासगो में हुआ COP26, जलवायु परिवर्तन के अंत की शुरुआत साबित होगा' और वादा किया कि 'वह तय उद्देश्यों तक पहुंचने के लिए अथक परिश्रम करते रहेंगे.'
उन्होंने कहा, ''आने वाले सालों में और भी बहुत कुछ करना बाक़ी है. लेकिन आज का समझौता एक बड़ा क़दम है. और, गंभीर रूप से, हमारे पास कोयले के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से कम करने की बात करने वाला पहला अंतरराष्ट्रीय समझौता है, और ये ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री तक सीमित करने का रोडमैप है. ''
अमेरिकी जलवायु दूत जॉन केरी ने कहा, "वास्तव में हम जलवायु से पैदा होने वाली अराजकता से बचने, स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी और एक स्वस्थ ग्रह हासिल करने के लक्ष्य की ओर पहले से कहीं ज्यादा क़रीब हैं."
लेकिन इस समझौते से संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनिओ गुटेरेस अपनी बात कहते हुए इन राजनेताओं की अपेक्षा कम उत्साहित नज़र आए.
उन्होंने कहा, ''हमारा यह ग्रह एक नाज़ुक धागे के साथ लटक रहा है हम अभी भी जलवायु आपदा के दरवाज़े पर खड़े हैं और दस्तक दे रहे हैं. यह आपातकालीन मोड में जाने का वक़्त है. वरना नेट ज़ीरो तक पहुंचने की हमारी संभावना स्वयं शून्य हो जाएगी. ''
इस समझौते में देशों ने तय किया है कि वह अगले साल फिर मिलेंगे ताकि तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कार्बन के इस्तेमाल को कम करने से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लिए जा सकें.
मौजूदा वक़्त में देशों ने जो प्रतिज्ञाएं ली हैं उसके मुताबिक़ ग्लोबल वॉर्मिंग की दर 2.4 डिग्री सेल्सियस तक रहेगी. लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की दर से बढ़ता रहा तो इसके परिणाम घातक होंगे, लाखों लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा.
स्विट्ज़रलैंड की पर्यावरण मंत्री सिमोनेटा सोमारुगा ने कहा, "हम अपनी गहरी निराशा व्यक़्त करना चाहते हैं कि कोयले और जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को लेकर जिस भाषा पर हम सहमत हुए हैं, उससे हमारी कोशिशें और कमज़ोर और अपारदर्शी बन गई हैं. ये हमें 1.5 डिग्री सेल्सियल के टारगेट के क़रीब नहीं लाएगा बल्कि इसे प्राप्त करना और कठिन बना देगा."
क्यों कोयले को लेकर है इतनी चर्चा?
सम्मेलन में कोयले के इस्तेमाल को लेकर भाषा कमज़ोर होने के बावजूद, कुछ जानकार अभी भी इस डील को एक जीत के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि यह पहली बार है जब इस प्रकार के संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ों में कोयले के इस्तेमाल का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है.
कोयला हर साल लगभग 40% कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार है, लिहाज़ा यह 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य तक पहुंचने के प्रयासों में केंद्र में है. 2015 में पेरिस में किए गए समझौते में तय हुआ था कि वैश्विक उत्सर्जन को 2030 तक 45% करने और इस सदी के मध्य तक लगभग शून्य तक करने की आवश्यकता है.
ग्रीनपीस के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी निदेशक जेनिफ़र मॉर्गन ने कहा, "उन्होंने एक शब्द बदल दिया, लेकिन वे इस COP से सामने आने वाले संकेत को नहीं बदल सकते कि कोयले का युग समाप्त होने वाला है. ये सभी देशों के हित में है, उनके भी जो अभी भी कोयला जलाते हैं, और उन्हें स्वच्छ अक्षय ऊर्जा की ओर आगे बढ़ना चाहिए."
हालांकि चैरिटी संस्था एक्शनएड के नीति निदेशक लार्स कोच ने कहा कि यह निराशाजनक है कि केवल कोयले का ही उल्लेख किया गया.
उन्होंने कहा, "यह उन अमीर देशों को खुली छूट देता है जो तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन जारी रखने के लिए एक सदी से भी ज़्यादा समय से प्रदूषण बढ़ा रहे हैं."
फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ इंटरनेशनल से जुड़ी सारा शॉ ने कहा कि यह सम्मेलन "एक घोटाले से कम नहीं" था.
उन्होंने कहा, "सिर्फ 1.5 डिग्री शब्द कह देने के कोई मायने नहीं हैं, अगर इसे पाने के लिए समझौते में कुछ भी नहीं है तो ये व्यर्थ है. COP26 को वैश्विक दक्षिण देशों के साथ एक विश्वासघात के रूप में याद किया जाएगा."
विकसित देश वादा निभाने से चूके
सम्मेलन के दौरान पैसा एक विवादास्पद मुद्दा बना रहा. विकसित देशों ने साल 2009 में वादा किया था कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को हर साल 100 बिलियन डॉलर मदद 2020 तक दी जाएगी. हालांकि, ऐसा करने में विकसित देश चूक गए. इसे विकासशील देशों को जलवायु प्रभावों के अनुकूल बनाने और स्वच्छ ऊर्जा की तरफ़ बढ़ने में मदद करने के इरादे के साथ तय किया गया था.
आलोक शर्मा ने कहा है कि 2025 तक लगभग 500 बिलियन डॉलर विकासशील देशों की मदद के लिए जुटाए जाएंगे.
गरीब देश पूरी बैठक में नुकसान और क्षति के सिद्धांत के माध्यम से आर्थिक मदद के मुद्दे को उठाते रहे. विकासशील देशों का कहना है कि अमीर देशों को गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और ऊर्जा के अन्य स्त्रोतों के लिए आगे बढ़ने में मदद करनी चाहिए जो इन देशों के लिए बिना मदद कर पाना बेहद मुश्किल है.
कई प्रतिनिधिमंडलों के लिए ये बड़ी निराशा साबित हुई कि उनके असंतोष के बावजूद, कई देशों ने इस तर्क को समर्थन दिया कि 'वित्तीय नुकसान और क्षति' पर बातचीत जारी रहेगी.
गिनी और कीनिया जैसे अफ़्रीकी, लैटिन अमेरिकी देश, छोटे द्वीप और भूटान जैसे एशियाई देश के प्रतिनिधिमंडल चाहते थे कि आर्थिक मदद के मसले पर बात आगे बढ़े.
एंटीगुआ और बारबुडा के प्रतिनिधि लिया निकोलसन ने कहा, "हम बातचीत के लिए एक सामान्य आधार तैयार करने की अध्यक्ष जी की कोशिशों को समझते हैं. मुझे उम्मीद थी कि इस दिशा में हमें कुछ हासिल होगा लेकिन हम किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के क़रीब भी नहीं हैं."
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