अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के क़ब्ज़े के बाद रूस से कैसे होंगे रिश्ते?

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पर तालिबान का क़ब्ज़ा होने के बाद भारत समेत अधिकतर देशों ने वहाँ से अपने दूतावास कर्मचारियों को बाहर निकालना शुरू कर दिया है.

लेकिन केवल तीन ऐसे हैं जिनके दूतावास वहाँ अब भी ख़ुले हैं. ये देश हैं - रूस, चीन और पाकिस्तान.

चीन की तरह तालिबान ने रूस को यह आश्वासन दिया कि वो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल अपने पड़ोसियों पर हमला करने के लिए नहीं होने देगा.

पाकिस्तान पर हमेशा से तालिबान का साथ देने का आरोप ख़ुद अफ़ग़ान सरकार लगाती रही है.

रूसी विदेश मंत्रालय ने भी रविवार को सरकारी मीडिया से कहा था कि सरकार की दूतावास कर्मचारियों को बाहर निकालने से जुड़ी कोई योजना नहीं है. हालाँकि उसने ये भी कहा था कि वो अपने दूतावास के कुछ कर्मचारियों को वापस बुलाएगा.

मंगलवार को रूसी राजदूत दिमित्री ज़िरनॉफ़ तालिबान के नेताओं से मुलाक़ात करने वाले हैं.

ऐसे में चीन और पाकिस्तान की तालिबान के साथ दोस्ती भारत के लिए इस वक़्त चिंता का सबसे बड़ा सबब है.

लेकिन रूस आने वाले दिनों में तालिबान के साथ कैसा व्यवहार रखता है, इस पर भारत की निगाहें ज़रूर टिकी हैं.

रूस के साथ भारत के दोस्ताना संबंध है और पिछले सात सालों में रूस के रिश्ते तालिबान के साथ ज़्यादा मज़बूत हुए हैं.

लेकिन तालिबान के संबंध हमेशा से रूस के साथ दोस्ताना रहे हों, ये भी सच नहीं है.

ऐसा माना जाता है कि तालिबान के उदय में रूस की भूमिका रही है. दोनों के बीच की शुरुआती दुश्मनी के बाद दोस्ती और फिर वर्तमान में अफ़ग़ानिस्तान शांति वार्ता की पहल तक - कैसे रहें हैं दोनों के रिश्ते, बीबीसी संवाददाता सरोज सिंह ने बात की जेएनयू के सेंटर फ़ॉर रशिन स्टडी में प्रोफ़ेसर संजय पांडे से. उन्हीं से बातचीत पर आधारित है ये रिपोर्ट.

अफ़ग़ानिस्तान में रूस की दिलचस्पी

बात 19वीं सदी की है.

उस वक़्त ब्रिटिश अपना शासन भारतीय उप-महाद्वीप में स्थापित कर रहे थे और पंजाब को अपने क़ब्ज़े में करते हुए अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़ बढ़ रहे थे. उस समय पंजाब और अफ़ग़ानिस्तान एक दूसरे से लगे हुए थे.

उस वक़्त रूस एक बड़ी शक्ति हुआ करता था, वो अपना प्रभाव अपने बॉर्डर पर बढ़ा रहा था. जैसे चीन के कई हिस्सों पर वो अपना आधिपत्य स्थापित कर चुका था.

ईरान से कई हिस्से उसने ले लिए थे. मध्य एशिया, जो कई छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था उनको अपने साथ मिला लिया था. इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान से रूस की सीमाएँ जुड़ गई थी.

यही वक़्त था जब रूस की अफ़ग़ानिस्तान में दिलचस्पी बढ़ने लगी. उसे डर था कि कहीं ब्रिटिश, अफ़ग़ानिस्तान तक आ गए तो उसकी (रूस) सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है.

यानी ये वो दौर था जब ब्रिटेन और रूस के बीच अफ़ग़ानिस्तान 'बफ़र स्टेट' बन गया था.

साल 1839 में ब्रिटिश सैनिकों ने पहला अफ़ग़ान युद्ध लड़ा. फिर 40 साल बाद दूसरा अफ़ग़ान युद्ध लड़ा गया और 1919 में आख़िरी अफ़ग़ान युद्ध लड़ा था. लेकिन इसके बावजूद अफ़गानिस्तान पर ब्रिटिश प्रभाव तो पड़ा, लेकिन वे यहाँ पूरा आधिपत्य स्थापित नहीं कर पाए.

ये वही वक़्त था, जब यूरोप के साथ साथ मध्य एशिया में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और रूसी साम्राज्यवाद के बीच द्वंद्व युद्ध चल रहा था, जिसे 'ग्रेट गेम' कहा जाने लगा.

बाद में जब दक्षिण एशिया से ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो गया, तब तक अफ़ग़ानिस्तान एक स्वतंत्र राज्य के रूप में उभर चुका था.

उस वक़्त से मोहम्मद जहीर शाह, अफ़ग़ानिस्तान के शासक बन गए थे.

सोवियत संघ भी दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक महाशक्ति के रूप में उभरा. उसकी सीमाएँ अफ़ग़ानिस्तान से लगी हुई थी और वो वहाँ अपना प्रभाव बढ़ाना चाह रहा था. जो आज के स्वतंत्र राज्य हैं- तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान उस समय सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे. मोहम्मद जहीर शाह ने भी सोवियत संघ के साथ अच्छे संबंध स्थापित किए.

साल 1973-74 में अफ़ग़ानिस्तान में तख़्तापलट हो गया. मोहम्मद जहीर शाह के संबंधी मोहम्मद दाऊद ख़ान ने अपने आप को अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया था. सोवियत संघ का प्रभाव उस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान पर और ज़्यादा बढ़ने लगा.

साल 1978 आते-आते अफ़ग़ानिस्तान में दाऊद ख़ान का शासन भी समाप्त हो गया था और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान (PDPA) सत्ता में आ गई. लेकिन उसका भी शासन बहुत स्थिर नहीं था. इसलिए एक साल बाद 1979 में सोवियत संघ ने अपनी फ़ौज कम्युनिस्टों के समर्थन में वहाँ भेज दी. उसके बाद 1980 से लेकर 1988 तक सोवियत संघ की फ़ौज अफ़ग़ानिस्तान में रही.

इस तरह से शीत युद्ध का एक नया दौर एशिया के इस भूभाग में शुरू हुआ. अमेरिका, सोवियत संघ का विरोधी था. उसने सोवियत विरोधी अफ़ग़ान गुटों 'मुज़ाहिदीन' का समर्थन किया.

इसमें अमेरिका को पाकिस्तान से भी मदद मिली. अमेरिका और पाकिस्तान के समर्थन से मुज़ाहिदीन ने सोवियत संघ के ख़िलाफ़ अपना युद्ध जारी रखा. साल 1985 में सोवियत संघ में राष्ट्रपति के तौर पर मिखाइल गोर्बाचोफ़ शासन में आ चुके थे.

अपनी नई विदेश नीति के तहत, जो भी मसले उनके लिए 'नासूर' बन चुके थे, उन्हें सुलझाने का प्रयास किया. अफ़ग़ानिस्तान भी सोवियत संघ के लिए वैसा ही 'घाव' बन चुका था. साल 1988 में गोर्बाचोफ़ ने अफ़ग़ानिस्तान से अपनी फ़ौज वापस बुलाने का निर्णय कर लिया था.

फरवरी 1989 में सोवियत संघ की फ़ौज अफ़ग़ानिस्तान से वापस चली गईं. लेकिन अगले 3-4 साल तक अफ़ग़ानिस्तान में कम्युनिस्ट शासन बना रहा. साल 1992 में नजीबुल्लाह की सरकार गिर गई और मुज़ाहिदीन ने काबुल पर क़ब्ज़ा कर लिया.

लेकिन मुजाहिदीन कई धड़ों में बँटे हुए थे. इनका आपस में एकमत नहीं था. इनमें से एक नई शक्ति उभरी, जो पाकिस्तान पोषित मानी जाती थी, जिसे तालिबान कहा गया. यहीं से उनका जन्म हुआ. साल 1996-2001 तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का शासन रहा.

रूस और तालिबान के रिश्तों में खटास

रूस पहले तालिबान शासन को लेकर बहुत आशंकित हुआ करता था. रूस के चेचन्या प्रांत में पृथकतावाद और आतंकवाद था. तालिबान ने चेचन्या के चरमपंथी गुटों को मान्यता दे दी थी.

इस वजह से रूस अपनी संप्रभुता के लिए इसे बहुत बड़ा ख़तरा मानता था. इतना ही नहीं, तालिबान ने मध्य एशिया के दूसरे छोटे देशों जैसे उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के चरमपंथी गुटों को भी अपना समर्थन दिया, ताकि पड़ोस के देशों में उसी तरह की ताक़तों का दबदबा बना रहे.

दोनों ही तरह से तालिबान रूस के लिए ख़तरे का सबब था. इसी वजह से अमेरिका पर 9/11 का आक्रमण जब हुआ, तब रूसी राष्ट्रपति ने सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को फ़ोन कर अपना समर्थन उन्हें दिया.

अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका ने आतंकवाद के विरुद्ध जो युद्ध की घोषणा की थी, उसमें भी रूस ने अमेरिका का साथ दिया. एक समय ऐसा भी आया, जब अमेरिकी फ़ौज को सामान पहुँचाने के लिए रूसी रास्ते का प्रयोग किया जाता था. तालिबान के ख़िलाफ़ रूस का ये सहायक अभियान क़रीब क़रीब साल 2014 तक चला.

रूस और तालिबान के रिश्तों में जब कम हुई दूरियाँ

वर्ष 2014 में रूस ने क्राइमिया को अपने में मिला लिया. इससे पहले क्राइमिया, यूक्रेन का हिस्सा हुआ करता था. इसके बाद पूर्वी यूक्रेन में गृह युद्ध आरंभ हुआ.

इस वजह से अमेरिका और यूरोप के देशों ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए. अमेरिका और रूस के संबंधों में पहले से दरार थी. लेकिन 2014 में वो ऐतिहासिक रूप से अपने निम्नतम स्तर पर चली गई थी.

यही वो वक़्त था, जब रूस ने पहली बार तालिबान के लिए दरवाज़ा खोला. पिछले सात वर्षों में लगातार रूस ने तालिबान के साथ संपर्क बनाए रखा. ये संबंध आधिकारिक नहीं थे लेकिन धीरे धीरे ये संबंध 'सेमी-ऑफ़िशियल' ज़रूर बन गए हैं.

इसी साल जनवरी में तालिबान का आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल मॉस्को भी गया था.

दूसरी तरफ़ साल 2014 के बाद से ही रूस-चीन भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों और मंचों पर ज़्यादा क़रीब आ गए हैं. इस समय भी दोनों देश अफ़ग़ानिस्तान पर अपने-अपने पोजीशन को को-ओर्डिनेट कर रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में रूस के हित

अफ़ग़ानिस्तान में रूस का कोई ख़ास निवेश नहीं है. भविष्य में रूस ज़रूर इस दिशा में अपना आर्थिक दख़ल बढ़ाने के विषय में सोच सकता है. फ़िलहाल रूस की अफ़ग़ानिस्तान में भू-राजनैतिक (जियोपॉलिटिकल) दिलचस्पी ज़्यादा है.

तालिबान के साथ रूस की अभी की नज़दीकी के दो महत्वपूर्ण कारण है.

रूस चाहता है कि तालिबान उसके यहाँ और मध्य एशिया में पृथकतावादियों और आतंकवादियों को समर्थन न दे. इसके अलावा चीन की तरह ही रूस भी चाहता है कि अमेरिका का प्रभुत्व एशिया के इस हिस्से में न बढ़े.

हालाँकि औपचारिक रूप से रूस ने तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में अभी मान्यता नहीं दी है. लेकिन इतना ज़रूर कहा है कि अशरफ़ ग़नी सरकार के मुक़ाबले तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान को ज़्यादा स्थायित्व दे सकता है या दे रहा है. दूसरी तरफ़ तालिबान के सैनिक काबुल में रूसी दूतावास की सुरक्षा में लग गए हैं.

लेकिन ये भी सच है कि रूस हड़बड़ी में तालिबान को मान्यता नहीं देगा चाहता. फ़िलहाल रूस को नहीं मालूम कि तालिबान ने जो भी वादा रूस से किया है उसे निभाएगा या नहीं.

रूस अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर भी थोड़ा सतर्क है. अगर इन दोनों मुद्दों पर तालिबान की तरफ़ से रूस आश्वस्त हो जाता है, तो हो सकता है कि वो तालिबान को आधिकारिक तौर पर मान्यता दे भी दे.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान को लेकर चिंता जताई जा रही है कि उनके राज में अफ़ग़ान लोगों के मानवाधिकार सुरक्षित नहीं होंगे. ख़ास तौर पर महिलाओं के. लेकिन मानवाधिकार के मुद्दे पर रूस, अमेरिका और यूरोप के देशों के साथ नहीं रहा है. रूस मानता है कि मानवाधिकार के नाम पर किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप अस्वीकार्य है.

अफ़ग़ान स्थिति में भारत की मदद की संभावना

भारत-तालिबान के बीच रूस 'मॉडरेटर' का रोल अदा कर सकता है, ताकि दोनों के बीच शंका वाली स्थिति ख़त्म हो कर बातचीत की शुरुआत हो सके. ऐसा इसलिए क्योंकि रूस कभी नहीं चाहेगा कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर पूरी तरह से अमेरिका के खेमे में चला जाए.

पिछले दिनों जब अमेरिकी फ़ौज अफ़ग़ानिस्तान से निकल रही थी और एक समझौते की कोशिश अलग-अलग स्तर पर चल रही थी, उस समय कई मौक़ों पर रूस ने तालिबान से मुलाक़ात की, जिसमें भारत को दावत नहीं दी.

इसी साल मार्च के महीने में अफ़ग़ानिस्तान में शांति वार्ता को लेकर रूस ने एक कॉन्फ़्रेंस का आयोजन किया था. इसमें अमेरिका, पाकिस्तान और चीन को आमंत्रित किया गया था, लेकिन भारत को नहीं बुलाया गया. हालांकि जुलाई आते आते रूस के रुख़ में थोड़ा बदलाव देखने को भी मिला था.

इसके पीछे पाकिस्तान और रूस के अच्छे होते रिश्ते एक वजह हैं. लेकिन रूस ये भी नहीं चाहता कि भारत के साथ उसके रिश्ते बिगड़ें.

ऐसे में बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच फिलहाल ये सब अभी संभवानाएँ हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं)