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स्विट्ज़रलैंड: जनमत संग्रह में लोगों ने सार्वजनिक तौर पर चेहरा ढँकने पर प्रतिबंध का किया समर्थन
स्विट्ज़रलैंड में लोगों ने सार्वजनिक तौर पर चेहरा ढँकने पर प्रतिबंध का समर्थन किया है. इसमें मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहने जाने वाला बुर्का या नक़ाब भी शामिल है.
सार्वजनिक तौर पर चेहरा ढँकने पर प्रतिबंध को लेकर स्विट्ज़रलैंड में रविवार को जनमत संग्रह कराया गया. जिसमें लोगों ने सार्वजनिक तौर पर चेहरा ढँकने को प्रतिबंधित करने के पक्ष में वोट किया.
हालांकि प्रतिबंध लगाने के पक्ष वालों और प्रतिबंध के विरोध में वोट करने वालों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर बेहद कम था. ब्रॉडकास्टर एसआरएफ़ के अनुमान के अनुसार, क़रीब 52 फ़ीसदी लोगों ने जहां प्रतिबंध लगाने के पक्ष में वोट किया वहीं 48 फ़ीसदी ने प्रतिबंध ना लगाने के लिए मतदान किया.
दक्षिण पंथी स्विस पीपल्स पार्टी ने रविवार को हुए मतदान के दौरान "अतिवाद बंद करो" जैसे नारे भी लगाए. वहीं एक प्रमुख स्विस इस्लामिक समूह ने कहा कि मुसलमानों के लिए यह एक 'काला दिन' था.
सेंट्रल काउंसिल ऑफ़ मुस्लिम ने एक बयान जारी कर कहा कि- आज के फ़ैसले से पुराने जख़्म एकबार फिर ताज़ा हो गए हैं. इससे क़ानूनी असमानता के सिद्धांत को और बल मिला है और साथ ही मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अलग रखे जाने के भी स्पष्ट संकेत मिलते हैं.
स्विस सरकार ने प्रतिबंध के ख़िलाफ़ तर्क देते हुए कहा था कि यह तय करना राज्य के अधीन नहीं है कि महिलाओं को क्या पहनना चाहिए.
ल्यूसर्न विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, स्विट्ज़रलैंड में लगभग कोई भी बुर्का नहीं पहनता है. केवल 30 फ़ीसदी महिलाएं ऐसी हैं जो नक़ाब पहनती हैं. स्विट्ज़रलैंड की 8.6 मिलियन आबादी में पांच फ़ीसदी आबादी मुस्लिमों की है जिसमें से ज़्यादातर तुर्की, बोस्निया और कोसोवो से हैं.
प्रत्यक्ष लोकतंत्र के तहत स्विट्ज़रलैंड के लोगों को अपने से जुड़े मुद्दों के लिए मत करने का अधिकार है. उन्हें नियमित तौर पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मामलों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर वोट देने के लिए आमंत्रित किया जाता है.
यह पहली बार नहीं है जब इस्लामिक मान्यता से जुड़े किसी मुद्दे पर जनमत संग्रह कराया गया है. साल 2009 में भी नागरिकों ने सरकारी सलाह के ख़िलाफ़ जाकर मीनारों के निर्माण पर प्रतिबंध लगाने के लिए मतदान किया था.
हालांकि रविवार को जो जनमत-संग्रह कराया गया, उसके प्रस्ताव में सीधे तौर पर इस्लाम का उल्लेख नहीं था. इसका उद्देश्य प्रदर्शन आदि के समय हिंसक घटनाओं को अंजाम देने वाले ऐसे लोगों को प्रतिबंधित करने से था जो अक्सर मास्क आदि पहनकर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं. बावजूद इसके ज़्यादातर लोग इसे 'बुर्का प्रतिबंध' के तौर पर ही देख रहे हैं.
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