You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ईरान: मौत की सज़ा पाने वाले स्वीडन के डॉक्टर के परिवार की आपबीती
- Author, कावून खामूश
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
वो आम तौर पर अपने काम के सिलसिले में तेहरान जाया करते थे और फिर वापस अपने घर स्टॉकहोम लौट आते थे. उस दिन जब वो दो हफ्ते के लिए तेहरान जा रहे थे, तब ये उनके लिए एक नियमित तौर पर करने वाला सफर था लेकिन उनकी बीवी वीदा मेहराननीया को अब इस बात का अफ़सोस है कि उन्होंने अपने पति को 'ठीक से अलविदा' भी नहीं कहा.
पेशे से डॉक्टर अहमदरेज़ा जलाली अक्सर सेमिनार में हिस्सा लेने और लेक्चर देने ईरान जाया करते थे. वो इमरजेंसी मेडिसिन के विशेषज्ञ थे.
साल 2016 में जब वो एयरपोर्ट के लिए घर से निकले थे तब वीदा को पता नहीं क्या हुआ कि उन्होंने रास्ते में उन्हें कॉल करके 'सुरक्षित यात्रा' की शुभकामनाएँ दीं.
स्टॉकहोम के कैफ़े में बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे बताया, "उस वक़्त दो हफ्ते की जुदाई भी ज्यादा लगती थी."
वो मुझसे अपने घर पर नहीं मिल सकती थी क्योंकि उनके छोटे बेटे को नहीं मालूम है कि उसके पिता ईरान की जेल में बंद हैं. वो अब तक यही सोचता है कि उसके पिता काम पर बाहर गए हुए हैं.
चार साल से ईरानी-स्वीडिश डॉक्टर अहमदरेज़ा जलाली ईरान की जेल में बंद हैं. उन्हें ईरान की ख़ुफ़िया एजेंसी ने जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किया हुआ है.
उन पर इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद को ख़ुफ़िया जानकारी देने और ईरानी परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या में मदद करने का आरोप है.
उन्हें ईरान की अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई है. जबकि उनके वकील का कहना है कि उन्हें डरा-धमका कर अपराध क़बूल करवाया गया है.
एकांत कारावास
इस साल 24 अक्टूबर को जलाली को एवीन जेल के एकांत कारावास में भेज दिया गया है. यह तेहरान का सबसे बड़ा जेल है. यहाँ पर ज्यादातर राजनीतिक क़ैदी रखे गए हैं.
एक दिसंबर को उन्होंने अपने परिवार के लोगों से फ़ोन पर थोड़ी देर के लिए बात की थी. तब उन्होंने बताया था कि उन्हें मौत की सज़ा देने के लिए यहाँ लाया गया है.
वीदा बताती हैं कि ईरान के अधिकारियों ने 45 साल के उनके पति अहमदरेज़ा जलाली को मृत्यु दंड देने की तैयारी कर ली है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "वो बहुत हताश थे और मुझसे अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए मदद माँग रहे थे."
"वो ख़ुद को बहुत कमज़ोर महसूस कर रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि वो कुछ नहीं कर सकते हैं और उनके पास अपनी ज़िंदगी को बचाने का कोई रास्ता नहीं है क्योंकि वो जेल में अकेले फँस गए हैं."
उन्होंने अपनी 18 साल की बेटी से फिर बात की.
वीदा बताती हैं, "वो (उनकी बेटी) रो रही थी. उसने सभी राजनेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से अपने पिता की जान बचाने की गुहार लगाई."
"इस सब से गुज़रना बहुत मुश्लिक है. कोई इसकी कल्पना नहीं कर सकता कि हम किन हालात से गुज़र रहे हैं. यह प्रताड़ना की तरह है."
पारिवारिक जीवन
वीदा कहती हैं, "मेरा छोटा बेटा चार साल का था जब अहमदरेज़ा ईरान गए थे. अब वो आठ साल का हो गया है."
"वो हमेशा अपने डैड के बारे में पूछता है. वो उस वक़्त को याद करता है जब उसके डैड उसे अपने कंधों पर उठा लेते थे और वे ख़ूब सारी मस्ती करते थे."
अहमदरेज़ा जलाली ने कहा है कि अगर उन्हें फांसी होती है तब उनके बेटे को यह नहीं बताया जाए कि उनके पिता की मौत कैसे हुई.
पढ़ाई-लिखाई
अहमदरेज़ा जलाली 2009 में आगे की पढ़ाई के लिए स्वीडन आए थे.
उनका परिवार एक साल के बाद उनके साथ रहने आया. तब उन्हें स्टॉकहोम के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में पीएचडी करने के लिए चयनित किया गया था.
इसके बाद वो इटली पोस्ट डॉक्टोरल करने के लिए गए. 2015 में वो वापस स्वीडन लौटे.
ईरान में गिरफ़्तार होने से पहले उनका परिवार एक आम परिवार की तरह ही ज़िंदगी जी रहा था.
2018 में स्वीडन ने उन्हें अपनी नागरिकता दी. इस वक़्त वो ईरान के जेल में थे. ईरान में कुछ लोगों ने इस पर प्रतिक्रिया दी कि इससे साबित होता है कि वो 'पश्चिम के लिए एक धरोहर हैं.'
हालांकि उनकी पत्नी ने इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि पीएचडी पूरी करने के बाद उन्हें स्थायी रूप से रहने की इजाज़त मिल गई थी.
प्रतिष्ठित वैज्ञानिक
वो स्वीडन में एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक थे. उन्होंने अस्पताल को नुक़सान रोधी बनाने पर काम किया हुआ था.
उनकी तस्वीर अभी भी कैरोलिना इंस्टीट्यूट की शाखा जिस अस्पताल में है, वहाँ के नोटिस बोर्ड पर चिपकी हुई है.
वो अपने पीएचडी सुपरवाइज़र प्रोफ़ेसर लीसा कुरलैंड के संपर्क में हमेशा रहते थे. अप्रैल 2017 में वे दोनों किसी रिसर्च के सिलसिले में मिलने भी वाले थे लेकिन ये मुलाक़ात फिर कभी नहीं हो पाई.
प्रोफ़ेसर लीसा कुरलैंड बताती हैं, "उनके साथ जो कुछ भी हुआ, उसे देखकर मैं अचरज में हूं. मैंने उनसे बहुत पहले भी पूछा था और हर बार वहाँ से लौटने के बाद भी पूछती थी क्या ये यात्राएँ उनके लिए सुरक्षित हैं और वो हाँ में जवाब देते थे. "
जब अहमदरेज़ा जलाली की ईरान में गिरफ़्तारी हुई तब शुरू में उनके परिवार वालों ने अपने दोस्तों और सहकर्मियों को बताया कि उनका एक्सिडेंट हो गया है और वो वहाँ अस्पताल में भर्ती हैं.
परिवारवालों को लगा था कि इससे उन्हें रिहा होने में मदद मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिर उन लोगों ने इसे सार्वजनिक करने का फ़ैसला लिया.
मृत्यु दंड
लीसा कहती हैं कि जब उनकी मौत की सज़ा की ख़बर मिली तो इस पर यक़ीन करना अकल्पनीय था.
वो कहती हैं, "मैं उनके जज़्बे को याद करती हूँ कि कैसे वो समाज में फ़र्क़ पैदा करना चाहते थे. वो पीएचडी के लिए वैज्ञानिक उपकरणों और तरीक़ों का इस्तेमाल करना चाहते थे लेकिन वो इसके माध्यम से ईरान की जनता की मदद भी करना चाहते थे."
अहमदरेज़ा के दोस्तों और सहकर्मियों ने मुझे यूरोप और ईरान के कई जगहों पर सेमिनार में हिस्सा लेते हुए उनकी तस्वीरें दिखाई.
कैटारिना बॉहम और वैरोनिका लिंड्स्ट्रॉम दोनों ही उनके साथ एसोसिए प्रोफ़ेसर थीं और वो कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में एक ही डेस्क शेयर करते थे.
वे बताती हैं कि अहमदरेज़ा एक विनम्र और सभ्य इंसान हैं. वो हमेशा ईरान के बारे में बातें करते थे. वो वहाँ के राजनीतिक हालात के बावजूद वहाँ के यूनिवर्सिटीज में जाकर उन लोगों से जानकारी शेयर करना और वहां के लोगों की मदद करना चाहते थे.
अपील
2017 में 75 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने ईरान की सरकार को एक खुला पत्र लिखा था और उनकी रिहाई की माँग की थी.
दो हफ्ते पहले 150 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने ईरान के सबसे बड़े नेता अली ख़ामेनेई को एक दूसरा पत्र लिखा है और अहमदरेज़ा को रिहा करने की बात कही है.
पिछले महीने एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ईरान से फांसी रोकने की माँग की है.
स्वीडन के विदेश मंत्री ने अपने ईरानी समकक्ष से बात कर उनकी मौत की सज़ा रोकने की माँग की है. हालांकि ईरान ने स्वीडन की अपील ठुकरा दी और 'सभी तरह के दख़ल' के लिए चेतावनी दी.
ईरान की ओर से जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किए गए विदेशी और दोहरी नागरिकताओं वाले नागरिकों की सूची लंबी है.
मानवाधिकार समूहों ने आरोप लगाया है कि ईरान उन्हें विदेशी सरकारों से रियायत पाने के लिए चारे के रूप में इस्तेमाल कर रही है.
पिछले महीने ईरान ने एक ब्रितानी ऑस्ट्रेलियाई लेक्चरर को तीन ईरानी क़ैदियों के बदले रिहा किया है. वो दस सालों तक ईरान की जेल में कै़ै थे.
ब्रितानी-ईरानी समाजसेवी नाज़ानीन ज़ाग़ारी-रैटक्लिफ़ भी हिरासत में हैं.
अहमदरेज़ा ने अपनी पीएडी ईरान के लोगों को समर्पित की हुई थी. उन्होंने पहले पेज पर लिखा था, "दुनिया भर में तबाही में मारे गए ख़ासतौर पर ईरान के बाम शहर के लोगों के लिए."
2003 में बाम शहर में आए भूंकप में 26,000 से ज्यादा लोग मारे गए थे.
उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि इमरजेंसी मेडिसिन पर किया गया उनका काम उन्हें मौत के दरवाज़े तक ले जाएगा.
उनकी बीवी कहती हैं कि वो हमेशा लोगों की जान बचाना चाहत थे.
अहमदरेज़ा की बेटी अब अपने पिता के ही नक्श-ए-क़दम पर चल रही है और उन्होंने उसी यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया है जहां से उनके पिता ने डॉक्टोरेट किया था.
उनकी मां भी उनके इस फ़ैसले के साथ हैं.
वीदा रोते हुए कहती हैं, "जब उसने टॉप स्कोर के साथ हाई स्कूल पास किया तब उसके पिता उस लम्हे में उसके साथ ख़ुशियाँ मनाने के लिए साथ नहीं थे. जब उसे कैरोलिन्सका इंस्टीट्यूट में दाख़िला मिला और उसने अपने पिता की तरह ही मेडिसिन चुना तब भी उसके पिता साथ नहीं थे."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)