अज़रबैजान-आर्मीनियाः नागोर्नो-काराबाख़ में रूस के शांति सेना भेजने से क्या बदलेगा

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- Author, फैमिल इसमाइलफ
- पदनाम, संपादक, बीबीसी रूस सेवा
आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच विवादित नागोर्नो-काराबाख़ इलाक़े में सितंबर अंत से लड़ाई की शुरुआत हुई थी.
इस लड़ाई में अज़रबैजान को साफ़ तौर पर आर्मीनिया पर बढ़त मिलती दिख रही थी.
हाल ही में अज़रबैजान की सेना ने नागोर्नो-काराबाख़ के शुशा (आर्मीनिया में शुशी) शहर पर कब्ज़ा कर लिया था. इसे एक बड़ी रणनीतिक जीत बताया जा रहा था.
इसके बाद अज़रबैजान की नज़र काराबाख़ की राजधानी स्तेप्नाकियर्त पर थी.
इस लड़ाई में कई लोगों की जान गई और कई इलाक़ों को बड़े स्तर पर नुक़सान पहुंचा है. लेकिन, शुशा पर नियंत्रण के बाद अज़रबैजान को राजधानी पर कब्ज़े की लड़ाई में ज़रूर बढ़त मिली थी.
ये इलाक़ा ऊंचाई पर है तो काराबाख़ में मौजूद आर्मीनिया की सेना आसानी से अज़रबैजान के गोला-बारूद का निशाना बना सकती थी.
लेकिन, इस बीच रूस ने दख़ल दिया और दोनों देशों के बीच शांति समझौता कराया और स्तेप्नाकियर्त में शांति सेना भेज दी.

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तुर्की नहीं रूस का नियंत्रण
इससे पहले सभी को लगता था कि तुर्की अज़रबैजान को खुला समर्थन देकर इस खेल को नियंत्रित कर रहा है.
रूस की इस पहल की शुरुआत सोमवार रात से हुई जब आर्मीनिया, अज़रबैजान और रूस के नेताओं की ऑनलाइन मुलाक़ात हुई और उन्होंने नागोर्नो-काराबाख़ में संघर्ष ख़त्म करेन के लिए एक नौ सूत्री समझौते पर बात की.
अज़रबैजान इस लड़ाई को जीतता हुआ नज़र आ रहा था क्योंकि उसने 1994 से आर्मीनिया के नियंत्रण वाले कई अज़ेरी प्रांतों को वापस ले लिया था.
तीनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्मीनिया की सेना नागोर्नो-काराबाख़ के आसपास बचे हुए कब्ज़े वाले इलाक़ों से पीछे हट जाएगी. इन पर अज़रबैजान का नियंत्रण हो जाएगा.

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क्या करेगी शांति सेना
रूस की शांति सेना दोनों पक्षों की सेना को अलग-अलग करेगी और ये सुनिश्चित करेगी कि दुबारा लड़ाई शुरू ना हो.
रूसी सेना नागोर्नो-काराबाख़ के आर्मीनेयाई लोगों को मुख्य आर्मीनिया से जोड़ने वाले पांच किलोमीटर चौड़े गलियारे को भी सुरक्षित करेगी.
लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि आर्मीनियाई नियंत्रण वाले काराबाख़ का शासन भविष्य में कैसे चलेगा.
सोवियत संघ के विघटन के बाद दोनों देशों के बीच बढ़ती राष्ट्रीय पहचान ही नागोर्नो-काराबाख़ की लड़ाई की वजह बनी.
अज़रबैजान और आर्मीनिया, दोनों स्वतंत्र देशों ने तब लड़ने के लिए सोवियत सेना के छोड़े गए हथियारों का इस्तेमाल किया.
उस लड़ाई में आर्मीनिया सफल रहा था. 1994 के अंत तक उसने नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के अज़रबैजान के सात इलाक़ों पर नियंत्रण पा लिया था.
जब दोनों तरफ़ से एक-दूसरे देशों के लोगों को निकाला जाना शुरू हुआ तो करीब एक लाख लोग शरणार्थी बन गए.

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अज़रबैजान की बढ़ती ताकत
दोनों देशों के बीच हमेशा तनाव बना रहा है. बीच-बीच में छिटपुट झगड़े भी होते रहे लेकिन, इस साल 27 सितंबर को अज़रबैजान ने अपने खोये हुए इलाक़ों को वापस लेने के लिए युद्ध की शुरुआत कर दी.
ये बहुत जल्दी साफ हो गया कि दोनों देशों के बीच सैन्य ताकत का संतुलन बदल चुका है.
कैस्पियन सागर में मिले तेल और गैस के स्रोत अज़रबैजान के लिए वरदान बनकर आए और इस तेल व गैस बेचकर अज़रबैजान ने खूब पैसा कमाया.
अज़रबैजान ने इन पैसों का इस्तेमाल अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिए किया और कुछ लोग राजधानी 'बाकू' को 'कैस्पियन का दुबाई' कहने लगे.
लेकिन, अज़रबैजान की सरकार ने अपनी सेना को मजबूत करने में भी बड़े स्तर पर पैसा झोंका.
उन्होंने पिछले कई सालों में बेहतर टैंक, गोला-बारूद और खासतौर पर नई तकनीक ख़रीदने में अरबों डॉलर खर्च किए.
अज़रबैजान पूर्व सोवियत संघ का ऐसा पहला देश है जिसने युद्ध में बड़े स्तर पर ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल किया है.
सितंबर में युद्ध प्रारंभ होने के शुरुआती दिनों में अज़रबैजान ने सबसे पहले हवाई हमलों से बचाव के तरीक़ों को ख़त्म किया और उसके बाद आर्मीनियाई सेना को बाहर निकालने, हथियारों और कर्मियों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया.
सेना तैनात करके रूस अब ज़मीन पर पूरी तरह स्थिति को नियंत्रित कर रहा है. इस सेना में 2000 पैराट्रूपर्स हैं.
आर्मीनिया, अज़रबैजान और तुर्की की सेना कुछ भी ऐसा नहीं कर सकतीं जिससे रूस के सैनिकों की ज़िंदगी ख़तरे में आ जाए.

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पहले क्यों नहीं दिया रूस ने दख़ल
हम पुख्ता तौर पर तो नहीं कह सकते लेकिन ये ज़रूर है कि आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान और व्लादिमीर पुतिन के बीच बहुत अच्छे संबंध नहीं हैं.
पाशिन्यान एक सफल और लोकप्रिय नेता हैं. वो सत्ता परिवर्तन के लिए हुई क्रांति के बाद आर्मीनिया के प्रधानमंत्री बने थे. व्लादिमीर पुतिन सरकार में इस तरह के बदलाव को पश्चिम समर्थित मानते हैं.
पाशिन्यान ने आर्मीनिया की रूस पर बहुत ज़्यादा निर्भरता का विरोध किया और पश्चिमी देशों से करीबी बढ़ाई.
अज़रबैजान से इस बड़ी हार के बाद उनका राजनीतिक भविष्य संदेह के घेरे में दिख रहा है. यहां तक कि आर्मीनिया के राष्ट्रपति ने समझौते की पूरी जानकारी होने से इनकार किया है.
लेकिन, अब समझौता हो चुका है और रूस ने पूरी स्थिति को अपने नियंत्रण में ले लिया है.
रूस दोनों तरफ संतुलन बनाकर रखना चाहता है. वह आर्मीनिया को इस सुरक्षा समझौते से बांधकर रखना चाहता है लेकिन साथ ही उस पर हमले भी रोकना चाहता है.

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अज़रबैजान के लिए बड़ी जीत
अज़रबैजान में इसे बड़ी जीत की तरह पेश किया जा रहा है. हालांकि, सोशल मीडिया पर कई लोग नाराज़गी भी ज़ाहिर कर रहे हैं कि अज़रबैजान ने अपनी मज़बूत स्थिति का फायदा नहीं उठाया और पूरे नागोर्नो-काराबाख़ पर हमला नहीं किया.
लेकिन, इस असंतोष के सड़कों पर उतर आने की संभावना बहुत कम है क्योंकि लोगों में जीत की खुशी भी है.
इस जीत में अज़रबैजान ने ना सिर्फ़ अपने इलाक़े वापस लिए हैं बल्कि इससे 30 सालों से अपने घर लौटने का इंतज़ार कर रहे अज़रबैजान के लाखों शरणार्थियों का इंतज़ार भी ख़त्म हो गया है.
आर्मीनिया में इसे लेकर नाराज़गी है कि नुक़सान कम करने के लिए रूस को पहले ही इस तरह दख़ल देना चाहिए था. हालांकि, वो ये भी समझते हैं कि अगर अब लड़ाई और खिंचती तो नागोर्नो काराबाख़ में कोई भी आर्मीनियाई नहीं बचता.
इस शांति समझौते में ये भी दिख रहा है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ इससे पूरी तरह बाहर हैं.

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अब आगे क्या
विवादित नागोर्नो-काराबाख़ पर आर्मीनिया का कब्ज़ा ख़त्म नहीं हुआ है लेकिन, इस युद्ध का सबसे ज़्यादा खामियाज़ा यहां रहे आर्मीनियाई लोगों को उठाना पड़ेगा.
ये अच्छी ख़बर है कि अब और सैनिक व आम लोग नहीं मारे जाएंगे. साथ ही शरणार्थी बन चुके अज़ेरी लोग अपने घर वापस लौट सकेंगे.
लेकिन, नागोर्नो-काराबाख़ की वर्तमान या भविष्य की स्थिति, इसकी प्रशासनिक या क़ानूनी या पुलिस व्यवस्था को लेकर कोई संकेत नहीं मिलते हैं. यह एक स्वघोषित गणराज्य रहा है जिसे कोई मान्यता नहीं देता.
सबसे बड़ा सवाल ये है कि वो दो देश जिनकी एक-दूसरे के लिए नफ़रत पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है वो अब एक-दूसरे के पहले से ज़्यादा करीब कैसे रहेंगे.
ये युद्ध, इसमें हुई हिंसा और बहाए गए खून को देखते हुए मुझे डर है कि इन दोनों पड़ोसियों को पड़ोसी की तरह रहने में कई साल लग जाएंगे.
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