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कोरोना ने किस तरह बदल दी ऑनलाइन शॉपिंग की दुनिया
- Author, ब्रायन लुफ़किन
- पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़
कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग में बड़ा उछाल आया है. इस दौरान ग्रॉसरी, किताबें, ब्यूटी सप्लाई, बच्चों के सामान जैसी चीजों की ऑनलाइन खरीदारी जमकर हुई है. बिना किसी संपर्क के तेज़ रफ्तार से अपने दरवाजे़ पर सामान मंगाने के लिए लोग धड़ल्ले से ऑनलाइन शॉपिंग का सहारा ले रहे हैं.
इनमें ज़रूरी और गै़र-ज़रूरी दोनों तरह के सामान शामिल हैं. अप्रैल में कनाडा में लॉकडाउन के चलते अपने घरों में फंसे हुए लोग कैन्ड क्वेल एग्स, सितार के तार और बच्चों के लिए ट्रैंपोलिन की ऑनलाइन खरीदारी कर रहे थे.
हड़बड़ाहट में होने वाली खरीदारी और जमाखोरी जैसी चीजों के साथ इस महामारी के तनाव ने हमारी खरीदारी की आदतों पर बड़ा असर डाला है.
हालांकि, ऑनलाइन शॉपिंग सालों बल्कि दशकों से चली आ रही है, लेकिन वास्तव में यह मुख्यधारा में हाल में ही आई है. एमेज़न 90 के दशक के मध्य से हमारे बीच है, लेकिन यूएस में 2010 से ही ऑनलाइन शॉपिंग की कुल रिटेल सेल्स में हिस्सेदारी 6 फीसदी से थोड़ी ज़्यादा हुई है.
और अब? यूके में सेल्स के कुल फ़ीसदी हिसाब से देखें तो ऑनलाइन बिक्री 2006 में 3 फ़ीसदी थी जो कि 2020 में बढ़कर 19 फ़ीसदी पर पहुंच गई है. महामारी के चलते अप्रैल 2020 में तो यह बढ़कर 30 फ़ीसदी पर पहुंच गई.
मई 2020 में यूएस में नॉन-स्टोर रिटेलर्स की बिक्री बढ़कर 31 फीसदी हो गई.
उभरते देशों में यह एक क्रांति की शक्ल ले चुकी है. इन देशों में 2022 तक करीब तीन अरब इंटरनेट यूज़र होंगे. बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के आंकड़े के मुताबिक, यह संख्या विकसित देशों के मुकाबले तीन गुना ज़्यादा होगी.
चीन में रिटेल में ऑनलाइन सेल्स की हिस्सेदारी पहले से ही 20 फ़ीसदी है. यह आंकड़ा यूएस, यूके, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों से बड़ा है.
डिजिटल रूप से प्रभावी खर्च - जिसमें ऐसी खरीदारी को भी शुमार किया जाता है जहां लोग ऑनलाइन चीजें सर्च करते हैं और इन्हें ऑफलाइन खरीदते हैं - इमर्जिंग मार्केट्स में 4 लाख करोड़ डॉलर के करीब पहुंचने वाला है.
कोविड-19 से पहले हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शॉपिंग के लिए इंटरनेट पर इतनी निर्भरता शायद पहले कभी नहीं थी. कुछ दशक पहले ऑनलाइन शॉपिंग एक बड़ी चीज़ मानी जाती थी. उस वक्त इंटरनेट तक पहुंच होना ही एक बड़ी चीज़ थी.
आखिर ऑनलाइन शॉपिंग हमारी ज़िंदगी का हिस्सा कैसे बन गई और महामारी के ख़त्म होने के बाद में चीजे़ं कैसी शक्ल लेंगी?
शुरुआत कहां से हुई
1984 में इंग्लैंड के गेट्सहेड में जेन स्नोबॉल नाम की एक 72 साल की दादी अपनी आरामकुर्सी पर बैठी हुई थीं. उन्होंने टेलीविजन के रिमोट कंट्रोल का इस्तेमाल मार्गरीन, कॉर्नफ्लेक्स और अंडों का ऑर्डर देने के लिए किया.
रिटेल मार्केटिंग के एसोसिएट प्रोफेसर और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सैड बिजनेस स्कूल के डिप्टी डीन जोनाथन रेनॉल्ड्स कहते हैं कि उन्होंने इंग्लिश इनवेंटर माइकल एल्ड्रिच के विकसित किए गए वीडियोटेक्स सिस्टम का इस्तेमाल इसके लिए किया था.
एल्ड्रिच ने अपना टीवी लिया और इसे एक कंप्यूटर टर्मिनल में तब्दील कर दिया. वे वीडियोटेक्स टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से अपनी टीवी स्क्रीन पर शॉपिंग लिस्ट बना लेती थीं और उनका ऑर्डर उनके स्थानीय टेस्को को फोन कर बता दिया जाता था. इसके बाद सामान उनके घर पहुंचा दिया जाता था. यह सब जादू जैसा था.
रेनॉल्ड्स बताते हैं, "शुरुआत में इसे बुजुर्ग और हाशिये पर मौजूद तबकों के लिए एक सामाजिक सेवा के तौर पर माना गया था."
उस वक्त एल्ड्रिच और स्नोबॉल को शायद ही पता रहा होगा कि एक दिन उनका यह छोटा सा प्रयोग यूके में ही 186 अरब डॉलर की इंडस्ट्री की बुनियाद रखेगा.
ऑनलाइन शॉपिंग के क्षेत्र में इस शुरुआती ग्रॉसरी सर्विस के बाद अगला बड़ा इनोवेशन 1994 में हुआ. उस वक्त 21 साल के एक कंप्यूटर विशेषज्ञ डैनियल एम कोन ने नेटमार्केट नाम से एक ऑनलाइन मार्केटप्लेस शुरू किया.
यह न केवल एक शॉपिंग मॉल के जैसा था, बल्कि यहीं पर पहली बार डिजिटल रूप से सुरक्षित ऑनलाइन ट्रांजैक्शन भी हुआ.
पहली खरीदारी एक स्टिंग सीडी थी जो कि 12.48 डॉलर में बेची गई थी.
तब से शुरुआती इंटरनेट - जिसमें डायल-अप की किरकिराती आवाज आती थी- ने लोगों की जिंदगी में शामिल होना शुरू कर दिया. और हालांकि, आज वर्चुअल रूप से सभी बड़ी कंपनियां ऑनलाइन हैं, शुरुआती दिनों में चंद कंपनियां ही ई-कॉमर्स स्ट्रैटेजी पर काम कर रही थीं.
इनमें से एक पिज्जा हट थी. 1994 में इस अमरीकी चेन ने अपने पिज्जानेट पोर्टल के जरिए पिज्जा ऑनलाइन बेचना शुरू कर दिया था. यह एक फ्लैट, ग्रे वेबसाइट थी जो कि आप जितना सोच सकते हैं उतनी प्राचीन दिखती थी. इसमें कस्टमर का पता और फोन नंबर वाले ही फील्ड थे.
लेकिन, 1994 में ही एमेजॉन भी लॉन्च हुई. उस वक्त यह साइट मोटे तौर पर किताबें बेचती थी. 1995 में ईबे आई.
जापान की सबसे बड़ी ईकॉमर्स साइट राकुटेन इसके दो साल बाद मार्केट में आई. गुजरे कुछ सालों में इसने कई पश्चिमी देशों में विस्तार किया है.
चीन की अलीबाबा का जन्म 1999 में हुआ. ये कंपनियां एक ऑनलाइन शॉपिंग के दौर की शुरुआत के लिए मंच सजा रही थीं.
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस की एडजंक्ट प्रोफेसर थोमाई सेरदारी कहती हैं कि 1990 के दशक के मध्य में वैश्वीकरण भी एक अहम वजह थी जिसने ईकॉमर्स को एक मुनाफे़ वाला और फायदेमंद धंधा बनाने में मदद की.
कनेक्टेड दुनिया ने तेज़ी से उत्पादन बढ़ाने की क्षमता दी. वे कहती हैं, "ग्राहक सबसे बढ़िया या स्वीकार्य उत्पाद कम कीमत पर लेने के लिए उत्सुक थे. इंटरनेट ने ग्राहकों को अच्छी तरह से पड़ताल करने के बाद उत्पाद को खरीदने की ताकत दी है."
सेरदारी कहती हैं कि हालांकि, एमेजॉन और ईबे जैसी साइट्स ने ऑनलाइन शॉपिंग के लिए प्लेटफॉर्म मुहैया कराए, लेकिन असली वजह ग्राहक थे जिनके व्यवहार में बदलाव के चलते ऑनलाइन शॉपिंग आज बड़े पैमाने पर कामयाब हुई है.
बढ़ता दबदबा
ऑनलाइन शॉपिंग की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव 2017 के दौरान आया.
प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक, "2016 के अंत तक कई अमरीकियों के लिए ऑनलाइन शॉपिंग करना एक आम आदत हो गई थी."
हर 10 में से आठ अमरीकियों ने उस साल कंप्यूटर या फोन का इस्तेमाल ऑनलाइन शॉपिंग के लिए किया. साल 2000 में महज 22 फीसदी लोगों ने ही ऑनलाइन शॉपिंग की थी.
2017 का साल इसलिए अहम है क्योंकि इस दौरान दुनियाभर में 80 फीसदी आबादी की पहुंच स्मार्टफोन तक हो गई थी.
2019 का डेटा बताता है कि ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी यूएस में कुल सेल्स की 16 फीसदी है. इसका मतलब है 601.75 अरब डॉलर का खर्च.
ग्लोबल ईकॉमर्स सॉफ्टवेयर दिग्गज शॉपिफाई के मुताबिक, पूरी दुनिया में ऑनलाइन सेल्स 2019 में बढ़कर 3.5 लाख करोड़ डॉलर के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई.
अमरीका में 2020 की पहली तिमाही में ये आंकड़ा 2019 की इसी अवधि के मुकाबले 14 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ गया.
2020 ने न केवल ऑनलाइन शॉपिंग की अहमियत को बदल दिया, बल्कि इसने इसकी ग्रोथ को भी तेज़ रफ्तार दे दी.
पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के व्हार्टन स्कूल ऑफ बिजनेस की मार्केटिंग प्रोफेसर बारबरा कान कहती हैं कि महामारी ने ऑनलाइन शॉपिंग के लिए दो से तीन साल बाद आने वाली स्थिति को आज ला दिया है.
मार्च 2020 से अप्रैल 2020 के बीच यूएस में ईकॉमर्स सेल्स 49 फीसदी बढ़ गई है. इसकी अगुवाई ऑनलान ग्रॉसरी ने की है जिसकी रोज़ाना की बिक्री में 110 फीसदी की ग्रोथ हुई है.
बना रहेगा ऑनलाइन शॉपिंग का दौर
बड़े पैमाने पर ईकॉमर्स अपनाए जाने से ऑनलाइन शॉपिंग की तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है. इसके अलावा, मर्चेंट्स के भी ऑनलाइन शॉपिंग के लिए आगे आने से भी इसमें इजाफा हुआ है.
सेरदारी कहती हैं, "करीब 30 फीसदी कारोबारी ऑनलाइन सामान बेचते हैं, लेकिन कोविड-19 ने कई रिटेलर्स को खुद को टिकाए रखने के एक जरिये के तौर पर इसका इस्तेमाल करने के लिए मजबूर किया है."
ऑनलाइन शॉपिंग के भविष्य को लेकर सकारात्मक संकेतों के बावजूद ग्राहक महामारी के चलते अपने खर्चों पर लगाम लगाए हुए हैं.
बड़ा सवाल यह है कि ऑफलाइन दुकानों के खुल जाने के बाद भी क्या ग्राहक ऑनलाइन स्टोर्स पर अपनी खरीदारी के लिए बने रहेंगे और इस कारोबार को ग्रोथ देंगे या नहीं.
कान कहती हैं कि हाइब्रिड शॉप्स में भी इज़ाफा हो सकता है. वे अमेज़न का उदाहरण देती हैं जो कि ऑनलाइन शॉपिंग और अमेज़न गो जैसी सेवाओं के साथ फिजिकल स्टोरफ्रंट दोनों फॉर्मेट में है.
कंपनी आपकी ऑनलाइन खरीदारी आदतों को ट्रैक करती है और इसकी फिजिकल शॉप पर ग्रॉसरी तैयार रहती है जहां से आप काम से घर लौटते हुए अपनी ग्रॉसरी ले सकते हैं.
लेकिन, महामारी के बाद क्या होगा?
हालांकि, ऑनलाइन शॉपिंग की शुरुआत सामाजिक दूरी और संक्रमण के डर के पैदा हुई ज़रूरत के चलते बढ़ी है, लेकिन हो सकता है कि महामारी के ख़त्म होने के बाद भी यह ट्रेंड जारी रहे.
(यह लेख मूलरूप में बीबीसी वर्कलाइफ में पब्लिश हुआ था)
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