'मैंने जॉर्ज फ़्लॉयड का वीडियो ना देखने का फ़ैसला क्यों किया'

'मैंने जॉर्ज फ़्लॉयड का वीडियो ना देखने का फैसला क्यों किया'

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    • Author, सैंड्रिन लुनगुम्बु
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

एक वायरल वीडियो जिसमें एक गोरा पुलिस अफ़सर जॉर्ज फ़्लॉयड की गर्दन पर घुटना रखकर दबा रहा है, उसे कोई ना देखे, ये लगभग नामुमकिन है.

लेकिन एक काली महिला होने के नाते मैंने फ़ैसला किया कि इस बार मैं ऐसा वीडियो नहीं देखूंगी.

ये मेरे लिए दिमागी और शारीरिक रूप से बहुत परेशान करने वाला है कि पुलिस हिरासत में लिया गया एक निहत्था काला आदमी फिर से एक गोरे पुलिस अफसर के हाथों मारा गया.

मुझे पता है कई लोग कहेंगे कि मुझे ये सोचना चाहिए कि वीडियो वायरल हुआ क्योंकि उसमें सच्चाई दिख रही है - एक गंभीर सामाजिक और सिस्टम की समस्या जो अमरीका में सदियों से चली आ रही है. एक पत्रकार के तौर पर, मेरे लिए इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण क्या हो सकता है कि सच्चाई सामने आए?

'मैंने जॉर्ज फ़्लॉयड का वीडियो ना देखने का फैसला क्यों किया'

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ट्रॉमा

लेकिन इतने सालों में मैंने ये जाना है कि इस तरह की गंभीर समस्याओं को सबके सामने लाने और अपनी मेंटल हेल्थ की सुरक्षा करने के बीच एक पतली सी रेखा है. ख़ासकर जब कहानी मेरे खुदके अनुभव से गहराई से जुड़ी हो.

मुझे लगता है हर इंसान को ये वीडियो परेशान करने वाली लगेंगी. लेकिन मेरे जैसे काले व्यक्ति के लिए इसके अलग ही मायने हैं. ये तस्वीरें किसी दर्दनाक ट्रिगर का काम कर सकती हैं.

'मैंने जॉर्ज फ़्लॉयड का वीडियो ना देखने का फैसला क्यों किया'

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इमेज कैप्शन, निआ दुमस

एक दिन में चार बार रो

जब मैंने अमरीका में रहने वाली 20 साल की अफ्रीकी-अमरीकी महिला निआ दुमस से बात की, तो उन्होंने कहा कि जॉर्ज फ़्लॉयड के आख़िरी पलों को देखकर वो अपना रोना नहीं रोक पाईं.

वो कहते हैं, "उसे देखते हुए मैं कई बार दिन में चार बार रोई. ये बहुत ही दर्दनाक था."

निआ ओहाइयो के क्लीवलैंड में रहती हैं, जहां उन्होंने बहुत हिंसा देखी है. उन्होंने अबतक की अपनी ज़िंदगी में कई काले लोगों की मौत की तस्वीरें देखी हैं.

वो कहती हैं, "अगर ये जॉर्ज फ़्लॉयड ना होते तो कोई और होते."

"जॉर्ज की वीडियो देखकर मेरे दिमाग में ट्रेवन मार्टिन की हत्या की यादें ताज़ा हो गईं. मैं तब 11 साल की थी और मैं सालों से ऐसी तस्वीरें देखती रही हूं. मैं ये सब देखकर थक चुकी हूं."

17 साल के निहत्थे ट्रेवन मार्टिन को फ्लोरिडा के मोहल्लों में हिंसा पर नज़र रखने वाले व्यक्ति ने गोली मार दी थी. 2012 में सेल्फ-डिफेंस को आधार बनाकर उनपर से सभी चार्ज हटा लिए गए.

ट्रेवन मार्टिन का ही मामला था, जब सबसे पहली बार ब्लैक लाइव्स मैटर का हैशटैग इस्तेमाल किया गया था.

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इमेज कैप्शन, टोनी एड्पेगब

'मैंने खुदको टूटा हुआ महसूस किया'

उसके बाद से ये हैशटैक कई बार इस्तेमाल किया जा चुका है. 27 साल के काले ब्रिटिश टोनी एड्पेगब ने मुझे कहा जब हम नस्लवाद की बात करते हैं तो इससे दिमाग पर गहरा असर पड़ता है.

"ये बहुत भारी महीना रहा है. इस घटना से कुछ हफ्ते पहले ही अहमद आर्बरी का वीडियो आया था. मैं अभी उस घटना से उबर भी नहीं पाया था कि मैंने फिर से ये होते हुए देखा."

25 साल के अहमद आर्बरी को अमरीका के जॉर्जिया राज्य में एक बाप-बेटे ने उस वक्त गोली मार दी थी, जब वो जॉगिंग कर रहे थे.

टोनी कहते हैं कि वो अब जॉर्ज के साथ हुई घटना से टूटा हुआ महसूस कर रहे हैं. वो सोचते हैं कि इनकी जगह वो भी हो सकते थे.

टोनी जॉर्ज फ़्लॉयड का पूरा वीडियो नहीं देख पाए.

"उस वीडियो को देखकर सबसे पहले मेरे दिमाग में यही बात आई. लोग वहां खड़े देख क्यों रहे हैं? लेकिन शायद वो ये समझ गए थे कि आसानी से जॉर्ज की जगह वो हो सकते हैं."

बीते कुछ हफ्तों में मैंने कई लोगों से इस बारे में बात की है कि इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर डालने से क्या कोई फायदा होता है.

पेरिस में जन्मी 28 साल की लिटिशा कन्डोलो एक काली महिला हैं, जिनका परिवार कांगो से आया था.

वो पहली बार में जॉर्ज फ़्लॉयड का वीडियो नहीं देख सकीं.

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इमेज कैप्शन, लिटिशा कन्डोलो

'मैं उस बेबसी को समझ सकती हूं'

"मैं बहुत कुछ महसूस कर रही थी. कुछ घंटों बाद जब इस घटना पर बहुत चर्चा होने लगी तो मैंने इसे देखा. जॉर्ज फ़्लॉयड पूरी तरह से बेबस महसूस कर रहे थे और मैं उनकी उस बेबसी को समझ सकती हूं."

लिटिशा कहती हैं, "हमें नस्लवादियों की ज़िम्मेदारी तय करने का तरीक़ा खोजना ही होगा. अगर इस तरह के वीडियो चमड़ी के रंग के आधार पर प्रिविलेज्ड माने जाने वाले लोगों को रुककर सोचने पर मजबूर करता है तो ऐसे वीडियो शेयर होने चाहिए."

लेकिन वो ये भी कहती हैं कि "ये याद रखना ज़रूरी है कि (गोरे लोग) वीडियो देख रहे हैं, लेकिन हम ये जी रहे हैं - ये हमारी सच्चाई है."

जब नॉन-ब्लैक लोगों ने इस वीडियो को शेयर किया तो कई काले लोगों के मन में कुछ सवाल भी उठे.

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संस्थागत नस्लवाद

अमरीका की निआ ऑनलाइन मिल रहे समर्थन पर संदेह जताती हैं, वो कहती हैं कि इस समर्थन का क्या फायदा, अगर व्हाइट प्रिविलेज और संस्थागत नस्लवाद जैसे मुद्दों को सुलझाया नहीं जाता.

वो कहती हैं, "मैंने कई गोरो सेलेब्रिटियों को रेडी-मेड पोस्ट शेयर करते हुए देखा. जो मुझे नकली लगती हैं, क्योंकि उनकी इंडस्ट्री में अब भी गोरे लोगों को ही महत्व दिया जाता है."

उन्होंने कई ऐसे लोगों को भी देखा है जो दिल से समर्थन देते हैं, जिसकी वो सराहना भी करती हैं. लेकिन उनका मानना है कि सोशल मीडिया पर समर्थन दिखाना नाकाफी है.

"मैं जाननी चाहती हूं कि तुम कैसा महसूस कर रहे हो, व्यक्तिगत तौर पर क्या सोचते हो, या इस बातचीत में तुम कैसे हिस्सेदार बन सकते हो, हमने एक सोच बना ली है कि किसी पोस्ट, वीडिया को शेयर करके या रिट्वीट करके समर्थन दिखाया जा सकता है...अब हम उससे आगे निकल चुके हैं."

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इमेज कैप्शन, अहमद आर्बरी

'वो वीडियो अब भी मेरे दिमाग में चल रही है'

काले लोग जब इस तरह के वीडियो देखते हैं तो एक हैशटैग के पीछे वो खुदको, अपने परिवार को और अपने पुर्वजों को देखते हैं.

टोनी कहते हैं, "जब अहमद का वीडियो आया तब मैं भी रात में काफी रनिंग करता था."

"मुझे लगा, मेरे साथ भी ऐसा हो सकता है कि कोई मुझे भागता हुआ देखे और ये सोचकर पुलिस को फोन कर दे कि मैं कोई अपराध करके भाग रह हूं. वो वीडियो अब भी मेरे दिमाग में चलती है, मुझे लगता है कि अगर मैं अमरीका में होता, तो उसकी जगह मैं हो सकता था."

लिटिशा कहती हैं, "हर काले शख़्स के साथ कुछ ना कुछ ऐसा होता है, जब उसे एहसास होता है कि वो काला है और दुनिया के लिए इस बात का क्या मतलब है."

उन्हें 18 साल की उम्र में अपने पिता के साथ की वो बातचीत याद आती है, जब वो फैशन स्कूल में जाना चाहती थीं.

"उन्होंने मुझे कहा था", "तुम काली हो और एक काले शख़्स का कलाकार होना बहुत संघर्ष भरा होता है. दूसरे के मुकाबले तुम्हें ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी. ये सुनकर मैं टूट गई. मैं रोई."

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'उनकी कहानी, मेरी कहानी है'

दुनियाभर के काले लोग जानते हैं कि उनके नस्लवाद के अनुभव छोटी-छोटी बातों से लेकर बड़ी घटनाओं तक होते हैं.

अगर मैं अपनी बात करूं तो बहुसांस्कृतिक पूर्वी लंदन में एक अफ्रीकी के तौर पर बड़े होते वक्त मुझे कड़े नस्लवाद से दो चार नहीं होना पड़ा. लेकिन जब मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी में कदम रखा तो मेरा सामना "असली दुनिया" से हुआ.

मेरे घने-घुंघराले बालों को लेकर लोग बात करते थे. मुझपर कई तरह की टिप्पणियां की गईं. ये भी कहा गया कि मेरे बाल मेरे करियर में बाधा बन सकते हैं.

नस्लवादी वीडियो और तस्वीरों से जो ट्ऱॉमा ट्रिगर होता है, वो कई ऐसी यादों से जुड़ा होता है. उनमें से कुछ व्यक्तिगत यादें होता हैं और कुछ एक समुदाय के तौर पर.

लिटिशा कहती हैं, "हम सभी को लग रहा है कि जॉर्ज फ़्लॉयड की कहानी हमारी कहानी है. हम सब उस व्यापक कहानी के किरदार हैं और उससे जुड़े हैं."

"इन तस्वीरों का काले लोगों के लिए ऐतिहासिक महत्व है. ये तस्वीरें दर्दनाक हैं. वो हमें मारने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन हम अब भी जीने की लड़ाई लड़ रहे हैं."

लेकिन ये तस्वीरें एक काले शख़्स पर गहरा असर डाल सकती हैं, यहां तक की उनकी दिमागी सेहत को नुकसान पहुंचा सकती हैं.

मैंने इस दौरान खुदको बचाने की कई कोशिशें की हैं.

अपनी प्राथमिकता तय करना

टोनी भी कहते हैं कि नस्लवाद के बारे में हो रही बातचीत का हिस्सा बनने और अपनी मेंटल हेल्थ में बैलेंस बनाना ज़रूरी है.

वो कहते हैं कि "ये भी ज़रूरी है कि जॉर्ज फ़्लॉयड को भुलाया ना जाए."

लेकिन मैं दूसरे काले लोगों को कहता हूं, उन्हें इस बात का दबाव नहीं लेना चाहिए कि वो इन तस्वीरों को देखें और शेयर करें. आपकी दिमागी सेहत आपकी प्राथमिकता है.

"ये ब्लैक बनाम व्हाइट का मामला नहीं है, ये इंसानियत का मामला है. मुझे लगता है बदलाव उस वक्त आएगा जब ये 'उनकी समस्या' नहीं, बल्कि 'हमारी समस्या' होगा."

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