कोरोना वायरस पर क़ाबू पाने के बाद जाँच के लिए चीन तैयार

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस कहां से शुरू हुआ, इसकी जाँच की मांग को लेकर 73वीं वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में एक ड्राफ्ट प्रस्ताव पेश किया गया है.
चीन का बचाव करते हुए सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि चीन ने इस पूरे मामले में पार्दर्शिता और ज़िम्मेदारी के साथ काम किया है. शी जिनपिंग ने कहा, "हमने विश्व स्वास्थ्य संगठन और संबंधित देशों को समय पर सारी जानकारी दी थी."
उन्होंने कहा कि कोरोना पर क़ाबू पा लेने के बाद चीन किसी भी जाँच का समर्थन करता है.
जिसका भारत ने भी समर्थन किया है. इस प्रस्ताव को पेश करने वालों में भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, भूटान, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, सऊदी अरब, अफ्रीकी समूह और उसके सदस्य देश, यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देश समेत 100 से ज़्यादा देशों के नाम हैं.

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आपको बता दें कि 194 सदस्य देशों वाली वर्ल्ड हेल्थ असेंबली, विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख नीति निर्धारक इकाई है.
हर साल वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में ये देश मिलकर संयुक्त राष्ट्र की इस हेल्थ एजेंसी के काम की समीक्षा करते हैं और आने वाले साल के लिए उसकी प्राथमिकताएं तय करते हैं.
इस बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए 18-19 यानी दो दिन इस सभा का आयोजन होने जा रहा है. जिसमें इस बार फोकस कोविड-19 महामारी पर होगा.
इस बार इस महामारी पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की समीक्षा की जाएगी. सवाल ये भी होंगे कि डब्ल्यूएचओ और उसके सदस्य देशों ने वायरस के प्रसार को किस तरह हैंडल किया? ये बैठक ऐसे वक्त में होने जा रही है जब अमरीका और चीन के बीच वायरस को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं.
प्रस्ताव में किसी देश का नाम नहीं लिया गया
वायरस की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए जाँच की माँग करने वाले इस प्रस्ताव में कहीं भी किसी देश या जगह का ज़िक्र नहीं है, लेकिन डब्ल्यूएचओ से अपील की गई है कि ‘वो ज़ूनॉटिक कोरोना वायरस के स्रोत की निष्पक्ष जाँच करे और पता लगाए कि मनुष्यों तक ये वायरस कैसे पहुंचा.’

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इस प्रस्ताव में शामिल इस बिंदु को समझने के लिए बीबीसी हिंदी ने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के सीनियर डॉक्टर अतुल कक्कड़ से बात की, जिन्होंने बताया कि ज़ूनॉटिक स्रोत का मतलब है 'एनिमल सोर्स'.
उनके मुताबिक़, जाँच कर ये पता लगाने के लिए कहा गया है कि ये वायरस इंसानों में सीधे जानवरों से आया या बीच में कोई और लिंक भी था?
प्रस्ताव में कहा गया है कि देखना चाहिए कि कहीं 'इंटरमीडिएट होस्ट' की संभावित भूमिका तो नहीं थी. कहा गया है कि वैज्ञानिकों को मिलकर इसपर सोचना चाहिए.

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इस प्रस्ताव में किसी देश का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सीधे तौर पर चीन पर आरोप लगाते रहे हैं. उन्होंने तो यहां तक कहा कि उन्होंने इसके सबूत देखे हैं कि कोरोना वायरस चीन की लैब में ही बना है. हालांकि अमरीका वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में पेश किए जा रहे इस प्रस्ताव का हिस्सा नहीं है.

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ऑस्ट्रेलिया ज़रूर इस प्रस्ताव का हिस्सा है. जिसके प्रधानमंत्री ने बीते दिनों माँग की थी कि कोविड-19 बीमारी फैलने की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच की जाए. वायरस फैलने में चीन की भूमिका की जाँच करने की माँग भी ऑस्ट्रेलिया ने की थी.
लेकिन चीन ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया था और ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापार पर कुछ प्रतिबंधों की घोषणा की थी.
चीन दावों को करता है ख़ारिज
इन सब दावों को चीन ख़ारिज करता रहा है. एक प्राइवेट टीवी चैनल से बात करते हुए भारत के लिए चीन के राजदूत सुन वीडोंग ने कहा भी था, "चीन ने वायरस के बारे में सबसे पहले जानकारी दी तो इसका मतलब ये नहीं है कि वायरस वुहान से शुरू हुआ." इससे पहले एक चीनी राजनयिक ने ये थ्योरी भी दी थी कि अमरीकी सेना ये वायरस चीन में लेकर आई.
हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि मौजूदा सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि ये वायरस जानवरों से आया है और इसे कहीं लैब में नहीं बनाया गया या छेड़छाड़ नहीं की गई है.
लेकिन अमरीका डब्ल्यूएचओ की इस बात से सहमत नहीं है. अमरीका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन पर चीन के प्रति पक्षपाती रवैया रखने का आरोप लगाकर उसकी फंडिंग रोक दी थी. उसने आरोप लगाया कि डब्ल्यूएचओ ने चीन से वायरस के फैलाव को कवर-अप किया.
हालांकि डब्ल्यूएचओ एक एडवाइज़री बॉडी है और उसके पास ये शक्ति नहीं है कि वो देशों पर कोई जानकारी साझा करने के लिए दबाव बना सके. सभा में डब्ल्यूएचओ को और शक्ति देने की बात भी हो सकती है, ताकि वो आउटब्रेक शुरू होते ही देशों में जाकर स्वतंत्र जांच कर सकें.
डब्ल्यूएचओ ने जनवरी और फरवरी में चीन में वैज्ञानिकों की एक टीम भेजी भी थी. लेकिन ये चीनी अधिकारियों के साथ एक संयुक्त मिशन था.
भारत क्या कहता है

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दो दिवसीय इस वर्ल्ड हेल्थ असेंबली में भारत की तरह से स्वासथ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन देश का प्रतिनिधित्व करने जा रहे हैं.
इससे पहले पिछले हफ्ते भारत के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एनडीटीवी से बातचीत में दावा किया था कि "ये नेचरल वायरस नहीं है, बल्कि आर्टिफिशियल वायरस है. ये लैब में तैयार हुआ है. वैज्ञानिकों को भी पता नहीं. डॉक्टरों को भी पता नहीं है. ये नेचुरल वायरस होता तो अभी तक हमारे मेडिकल साइंटिस्ट या सबको पता होता. ये लैब में तैयार हुआ वायरस है."
हालांकि दक्षिण एशिया मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं कि नितिन गडकरी ने किसी देश का नाम नहीं लिया. उन्होंने ये कहा कि ये लैब में बना हो सकता है, लेकिन किसकी लैब में बना हो सकता है और कैसे लैब से बाहर आया, इसपर उन्होंने कोई दावा नहीं किया.
भारत-चीन के संबंधों पर क्या असर होगा?

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भारत ने प्रस्ताव को जो समर्थन दिया है, इससे भारत और चीन के रिश्तों पर क्या कोई असर हो सकता है?
इसपर दक्षिण एशिया मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं कि चीन को इससे ऐतराज़ होगा और दोनों देशों के बीच कई मामलों पर पहले ही तनाव है, इस मुद्दे से दोनों के बीच तनाव और बढ़ सकता है.
वो कहते हैं कि भले ही इस प्रस्ताव में चीन का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन इस जाँच में चीन भी ऑबजेक्ट होगा. "जांच होगी कहां पर? ज़्यादातर जाँच चीन पर ही फोकस होगी. इसलिए चीन को डब्ल्यूएचओ में पेश होने वाले इस प्रस्ताव पर सख्त ऐतराज़ होगा."
वहीं चीन मामलों की एक्सपर्ट गीता कोचर बीबीसी हिंदी से कहती हैं कि उन्हें नहीं लगता कि चीन इतनी गैर ज़िम्मेदारी से काम करेगा कि इस प्रस्ताव की वजह से भारत और चीन के रिश्तों में कोई दरार आए.
वो कहती हैं, "क्योंकि भारत ये नहीं बोल रहा कि चीन ने ये ग़लत किया है. भारत ने ये बोला है कि ऐसी एक समस्या आई है और हम सबको मिलकर ये पता लगाना चाहिए कि ये समस्या क्यों और कहां से आई है, ताकि हम उस तरीके से इसका हल निकाल सकें. भारत ये नहीं कह रहा कि चीन ने उसके लोगों को कुछ नुक़सान पहुंचाने के लिए ये किया है. सब देश इस समस्या से निजात पाना चाहते हैं, इसलिए मुझे नहीं लगता कि चीन कहेगा कि भारत ये प्रस्ताव से क्यों जुड़ा है और भारत के खिलाफ हो जाएगा."
भारत-अमरीका रिश्ते

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गीता कोचर कहती हैं कि अगर अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप अगर सोचते हैं कि भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन कर उसका साथ दिया है तो ये अच्छी बात है, क्योंकि भारत सही चीज़ों को हमेशा से सपोर्ट करता आया है और आगे भी करता रहेगा.
वहीं सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में रिसर्च फेलो अतुल भारद्वाज बीबीसी हिंदी से कहते हैं कि अमरीका वायरस शुरू होने के वक्त से ही डब्ल्यूएचओ की काफ़ी निंदा कर रहा है. अब जब भारत इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहा है तो समझा जा सकता है कि भारत अमरीका का साथ दे रहा है, क्योंकि भारत और अमरीका के बीच अच्छे संबंध भी हैं.
हालांकि अतुल भारद्वाज का मानना है कि डब्ल्यूएचओ एक स्वतंत्र संस्था है और प्रस्ताव पास हुआ तो वो स्वतंत्र रूप से जांच करेगी.
"अभी ये कहना ग़लत होगा कि जाँच में चीन का ही नाम आएगा. ये कहना भी ग़लत होगा कि ये जाँच चीन को निशाने पर रखकर की जाएगी, क्योंकि उससे संस्था की पूरी जांच पर सवाल खड़े हो जाते हैं. अभी से ये मानना उचित नहीं होगा. चीन भी कह चुका है कि कोई भी जांच निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीक़े से हो."
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा में ग्लोबल पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर देवी श्रीधर कहते हैं कि इस बीमारी के साथ सबसे बड़ी चुनौती ये है कि कोई भी देश इसे अपने ऊपर लेना नहीं चाहता. हर देश कहना चाहता है कि ये बीमारी उसके देश में नहीं है और मौतों के आँकड़े कम करके दिखाना चाहता है."
प्रोफेसर श्रीधर कहते हैं कि इस तरह की गंभीर बीमारियों को रोकने का सकारात्मक तरीका ये है कि डब्ल्यूएचओ एक तकनीकी अंतरराष्ट्रीय मिशन भेज सके. जिसका काम किसी पर आरोप लगाना या किसी पर उंगली उठाना ना हो, बल्कि सच में वायरस की शुरुआत कहां से हुई हो ये पता लगाए और दूसरे देशों को सही सलाह दे.

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