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ऑटोमन सुल्तान, जिसने भाइयों की हत्या कर सत्ता पर क़ाबिज़ होना वैध किया
- Author, असद अली
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
उस्मानिया सल्तनत (ऑटोमन एम्पायर) कई सदियों तक क़ायम रहने वाली एक बड़ी सल्तनत थी, जिसमें उसने यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तर अफ़्रीका के बड़े हिस्से पर हुकूमत की और दूरगामी प्रभाव छोड़े.
उस्मानिया सल्तनत के दौर के विभिन्न किरदार आजकल टीवी ड्रामों और सिरीज़ का विषय हैं. इन्हीं में एक सिरीज़ सुल्तान अहमद प्रथम और ख़ास तौर पर उनकी पत्नी कोसेम सुल्तान की ज़िन्दगी पर बनी है.
इस सिरीज़ में सुल्तान अहमद अपने आस-पास के लोगों और सल्तनत के बड़े, ऊंचे पदों पर बैठने वालों की तरफ़ से लगातार अपने छोटे भाई को क़त्ल करने के दबाव में नज़र आते हैं.
विश्व के इतिहास में कई समाज में भाइयों, बाप-बेटों और दूसरे रिश्तेदारों में तख़्त के लिए हत्या और जंग के उदाहरण मिलते हैं. तो उस्मानिया सल्तनत के इतिहास में इस तरह की घटनाओं के क्या उदाहरण हैं. बात शुरू करते हैं सुल्तान अहमद प्रथम के पिता सुल्तान मेहमत तृतीय के गद्दी पर बैठने से.
सन 1595 का एक दिन. उस्मानिया सल्तनत अपनी बुलंदियों पर है. ये वो दिन है जब उस समय की सुपर पावर की सत्ता सुल्तान मुराद तृतीय की मौत के बाद उनके बेटे मेहमत को मिल चुकी है जो अब सुल्तान मेहमत तृतीय हैं.
लेकिन इस दिन को इतिहास में जिस वजह से याद रखा जाता है वो शायद इस्तांबुल में शाही महल में नए सुल्तान के आने से ज़्यादा वहां से 19 शहज़ादों के जनाज़ों का निकलना था.
ये जनाज़े नए सुल्तान मेहमत तृतीय के भाइयों के थे जिन्हें सल्तनत में उस समय प्रचलित भाइयों के क़त्ल की शाही परंपरा के तहत नए सुल्तान के तख़्त पर बैठते ही बारी-बारी से गला घोंट कर मार दिया गया था.
उस्मानिया सल्तनत के इतिहास पर लिखी गई किताब 'लॉर्ड ऑफ़ दि होराइज़ंस' (पूर्व और पश्चिम के आक़ा) में लेखक जेसन गुडविन ने इतिहास के विभिन्न स्रोतों के संदर्भ से शहज़ादों की मौत की कहानी सुनाते हुए लिखा है कि शहज़ादों को एक-एक करके सुल्तान के सामने लाया गया.
उनमें से उम्र में सबसे बड़े शहज़ादे ने जो ख़ूबसूरत और तंदरुस्त था उसने अनुरोध किया कि "मेरे आक़ा, मेरे भाई, जो अब मेरे पिता के समान हो मेरी ज़िन्दगी इस तरह मत ख़त्म करो. ग़म से निढाल सुल्तान ने अपनी दाढ़ी नोच ली लेकिन जवाब में एक शब्द नहीं बोला."
जेसन उस दिन का ज़िक्र जारी रखते हुए लिखते हैं कि गलियों में ये जनाज़े जाते हुए देख कर इस्तांबुल के शहरियों के दिल दहल गए थे.
इतिहासकार लेस्ली पी. पेयर्स ने अपनी किताब 'इम्पीरियल हरम: वीमेन एंड सोविरेनिटी इन दि ऑटोमन एम्पायर' में उस समय तैयार की गई एक रिपोर्ट का सन्दर्भ दिया है कि सुल्तान मुराद तृतीय के जनाज़े के एक दिन बाद ही जब उनके 19 शहज़ादों के जनाज़े निकले तो उस समय सुल्तान मुराद तृतीय के जनाज़े की तुलना में इस्तांबुल के शहरियों की दोगुनी संख्या बाहर आई थी और हर एक आँख आंसुओं से भरी हुई थी.
नौ शहज़ादों की मौत
1595 से इक्कीस साल पीछे जाएं तो पता चलेगा कि सुल्तान मेहमत तृतीय के पिता सुल्तान मुराद तृतीय के शासन का पहला दिन भी इससे कुछ अलग नहीं था. उन्हें भी ऐसे ही मुश्किल फ़ैसले का सामना करना पड़ा था. सुल्तान मुराद के पिता उस्मानिया सल्तनत के 11वें सुल्तान सलीम द्वितीय की मौत सन् 1574 में 50 साल की उम्र में हुई. (इस साल उस्मानिया सल्तनत ने उत्तर अफ्रीका में ट्यूनिस भी जीत लिया था.)
सल्तनत की बागडोर उनके सबसे बड़े बेटे मुराद तृतीय के हाथ आई जो अपने बाद वाले भाई से 20 साल बड़े थे और उनकी सत्ता को ज़ाहिरी तौर पर कोई ख़तरा नहीं था. लेकिन फिर भी फिंकल लिखती हैं, "उन्होंने अपनी तख़्तनशीनी पर अपने सब भाई मरवा दिए और जिन्हें फिर अपने पिता सुल्तान सलीम द्वितीय के बराबर में दफ़न किया गया."
इतिहासकार कैरलाइन फिंकल ने अपनी किताब 'उस्मान का ख्वाब: उस्मानिया सल्तनत की कहानी 1300-1923' में सुल्तान सलीम द्वितीय के यहूदी हकीम डोमिनिको हीरोसोलिमितानो के सन्दर्भ से शहज़ादों की मौत का दृश्य कुछ यूं बयान किया, "लेकिन सुल्तान मुराद ने, जो बहुत रहम दिल थे और ख़ून बहाना बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. अट्ठारह घंटे इन्तज़ार किया, इस दौरान वो न तख़्त पर बैठे और न ही शहर में अपने आने का एलान किया और अपने नौ भाइयों की जान बचाने के तरीक़ों पर विचार करते रहे...उस्मानिया सल्तनत के क़ानून के तोड़े जाने के डर से उन्होंने रोते हुए अपने (ख़ास तौर पर इस काम के लिए तैयार किये गए गूंगे बहरे) कर्मियों को शहज़ादों का गाला घोंट कर मारने के लिए रवाना कर दिया और इस काम के लिए उन कर्मियों के इंचार्ज को अपने हाथों से नौ रुमाल दिए."
"मुराद और मेहमत के भाइयों की छोटी-छोटी क़ब्रें बताती हैं कि सल्तनत में उस अफ़रातफ़री से बचने की क्या क़ीमत अदा की गई जो अक्सर किसी नए सुल्तान की तख़्तनशीनी के समय पैदा होती थी."
'भाइयों के क़त्ल' की पृष्ठभूमि क्या थी?
दर्जनों शहज़ादों और शहज़ादियों की इन मौतों के बारे में अहम बात ये है कि शहज़ादों का मारा जाना किसी बग़ावत या किसी और जुर्म का नतीजा नहीं था बल्कि उनमें से कुछ तो ग़लती करने के क़ाबिल भी नहीं थे.
जिस क़ानून या परंपरा के तहत इन शहज़ादों और शहज़ादियों को मारा गया उसकी नींव लगभग सौ साल पहले 15वीं सदी में सुल्तान मेहमत द्वितीय के दौर में रखी गई थी जिन्होंने सन् 1481 में अपनी मौत से कुछ साल पहले आदेश दिया था जिसके तहत नया सुल्तान अपने भाइयों को मार सकता था.
फिंकल ने लिखा है कि सुल्तान मेहमत द्वितीय ने अपने उत्तराधिकारी का नाम उजागर नहीं किया था लेकिन उन्होंने अपनी मौत से कुछ साल पहले उत्तराधिकारी के बारे में अपने ख्यालात का इज़हार कर दिया था, जिसमें उन्होंने ये कहते हुए भाइयों को मारने की इजाज़त दी कि उनका जो भी बेटा सुल्तान बने वो ठीक करेगा, अगर वो दुनिया की बेहतरी के लिए बाक़ियों को मार देता है.
तुर्की में इतिहास और क़ानून के एक विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर डॉक्टर अकरम बोरा अकंजे ने इस परंपरा के बारे में अपने एक लेख में लिखा कि सुल्तान मेहमत द्वितीय के अपने शब्दों में ये क़ानून 'विश्व वयवस्था' की बेहतरी के लिए बनाया गया था और सुल्तान के अनुसार उलेमा की अक्सर तादाद इसके हक़ में है इसलिए इसके अनुसार कार्रवाई की जाए.
डॉक्टर अकरम का ये लेख तुर्की अख़बार 'रोज़नामा सुबाह' की वेब साइट पर प्रकाशित हुआ था.
डॉक्टर अकंजे लिखते हैं, "बेशक, भाइयों के क़त्ल का क़ानून उस्मानी इतिहास के सबसे विवादित विषयों में से एक है...सल्तनत के इतिहास में कई बार इस तरह की घटनाएं हुईं जिनमें से ज़्यादातर को ठीक समझा गया लेकिन कुछ मौतें/हत्याएं ऐसी भी हुईं जिन्हें ग़लत समझा गया और आलोचना की गई."
उन्होंने आगे लिखा कि किसी शहज़ादे के मारे जाने के लिए उसका कुछ ग़लत करना ज़रूरी नहीं था और कई बार सिर्फ़ इस ख़तरे की वजह से मारने को सही समझा गया कि वो शहज़ादा/शहज़ादे भविष्य में बग़ावत कर सकते हैं.
लेकिन सुल्तान मेहमत द्वितीय ने इस क़ानून की ज़रूरत क्यों महसूस की. इसको समझने के लिए हम एक घटना की मदद ले सकते हैं. इसके लिए हमें उस्मानिया सल्तनत के इतिहास में लगभग 70 साल और पीछे जाना होगा जब जुलाई 1402 में इंक़रा के क़रीब उस्मानी बादशाह सुल्तान बायज़ीद और सुल्तान तैमूर (तैमूर लंग) के बीच एक बड़ी जंग हुई.
तैमूर लंग और उस्मानिया सल्तनत
कैरलाइन फिंकल लिखती हैं कि तैमूर लंग अपने घर से जंग की मुहिम पर निकले तो उसके 30 साल के बाद वो चीन और ईरान से होते हुए अनातोलिया (आज का तुर्की) में उस्मानी सुल्तानों के इलाक़े तक पहुंचे.
फिंकल कहती हैं कि तैमूर लंग अपने आपको चंगेज़ ख़ान का वारिस समझते थे और इसी वजह से उनके ख्याल में अनातोलिया सल्जूक़ मंगोल इलाक़ों पर उनका हक़ था. उन्होंने अनातोलिया की विभिन्न रियासतों (जो उस समय तक उस्मानी सुल्तानों के शासन में नहीं आई थी) के बीच मतभेद का फ़ायदा उठाने की कोशिश की. लेकिन उस्मानी सुल्तान बायज़ीद की नज़र भी उन्हीं रियासतों पर थी.
फिंकल बताती हैं कि इसका निष्कर्ष ये निकला कि तैमूर लंग और बायज़ीद की फ़ौजें 28 जुलाई 1402 को इंक़रा के पास आमने-सामने आ गईं. इस जंग में सुल्तान बायज़ीद की हार हुई और वो इसके बाद ज़्यादा देर ज़िंदा नहीं रहे. उनकी मौत कैसे हुई? फिंकल कहती हैं कि इसके बारे में कई मत हैं.
लेकिन आज के विषय के सन्दर्भ में अहम बात ये है कि उस्मानिया सल्तनत एक मुश्किल दौर में दाख़िल हो गई. अगले 20 साल तक उस्मानिया सल्तनत को गृह युद्ध की वजह से भारी तबाही और बर्बादी का सामना करना पड़ा.
डॉक्टर अकंजे लिखते हैं कि बायज़ीद प्रथम के चारों बेटों के अपने-अपने हज़ारों समर्थक थे और वो सालों तक आपस में लड़ते रहे.
गृह युद्ध के अंत में सुल्तान का सबसे छोटा बेटा मेहमत प्रथम अपने भाइयों को हरा कर 1413 में उस्मानिया सल्तनत का अकेला वारिस बना.
सुल्तान मेहमत प्रथम को उस्मानिया सल्तनत की अपने पिता सुल्तान बायज़ीद के दौर में जो सीमाएं थी उन तक पहुंचाने में और कई साल जद्दोजहद करनी पड़ी.
इसी दौरान नए सुल्तान और तैमूर लंग (जो मर चुके थे) के बेटे शाहरुख़ के बीच पत्रों के ज़रिए एक दिलचस्प बात चीत हुई जो हमारे आज के विषय पर रौशनी डालती है. कैरलाइन फिंकल लिखती हैं कि 1416 में शाहरुख़ ने सुल्तान मेहमत प्रथम को पत्र लिखा और अपने भाइयों को क़त्ल करने पर विरोध किया तो उस्मानी सुल्तान का जवाब था कि "एक देश में दो बादशाह नहीं रह सकते...हमारे दुश्मन जिन्होंने हमें घेरा हुआ है हर समय मौक़े की तलाश में रहते हैं."
यहां ये बात अहम है कि सुल्तान बायज़ीद ख़ुद अपने भाई 'को क़त्ल कराने के' बाद तख़्त पर बैठे थे. सन् 1389 में उस्मानिया सल्तनत के तीसरे सुल्तान मुराद प्रथम सर्बिया के ख़िलाफ़ जंग के दौरान मर गए. उस समय पर शहज़ादे बायज़ीद ने अपने भाई को मरवा कर सल्तनत का कार्यभार संभाल लिया था.
फिंकल लिखती हैं कि शहज़ादे बायज़ीद के हाथों उनके भाई शहज़ादा याक़ूब का क़त्ल 'उस्मानी ख़ानदान में भाई का पहला क़त्ल है जिसका रिकॉर्ड मौजूद है.'
लेकिन उन्होंने आगे लिखा है कि ये साफ़ नहीं है कि ये क़त्ल वहीं जंग के मैदान में अपने पिता की मौत की ख़बर मिलते ही उन्होंने करवा दिया था या कुछ महीने बाद किया गया. क्योंकि उस्मानी ये जंग जीत गए थे और सर्बिया उनके मातहत रियासत बन गई थी.
भाइयों को मारने की परंपरा और तुर्कों के उत्तराधिकारी का उसूल
तुर्कों में उत्तराधिकारी की परंपरा के बारे में जेसन गुडविन अपनी किताब 'पश्चिम और पूर्व के आक़ा' में लिखते हैं कि शुरुआत में उस्मानी सल्तनत में सत्ता ख़ानदान का मसला होता था जिसमें भाई,चाचा,कज़िन और कई बार महिला रिश्तेदार भी किसी हद तक हिस्सेदार होते थे. ये स्थिति दुनिया की सल्तनतों से अलग थी जहां सत्ता सिर्फ़ बड़े बेटे का हक़ होता था.
लेस्ली पेयर्स लिखती हैं कि उस्मानी सुल्तान सदियों में अपनी एक परंपरा शायद नहीं बदल सके. वो लिखती हैं, "उस्मानी ख़ानदान अपने हुकूमत करने के एक उसूल को पूरी तरह से कभी नहीं छोड़ सका,जिसके तहत हर शहज़ादा तख़्त पर बैठने के लायक़ ज़रूर होता था चाहे इस बात की वास्तव में संभावना कितनी ही कम क्यों न हो."
"सुल्तान मुराद और उनके बेटे मेहमत की तरफ़ से अपने भाइयों को मरवाना ये साबित करता है कि यूरोप का क़ानून जिसके तहत विरासत पूरे तौर पर सबसे बड़े बेटे को हस्तांतरित होती है और जहां छोटे भाई बड़े भाई के लिए ख़तरा नहीं होते, तुर्कों की इस सोच की जगह नहीं ले सका जिसके तहत हर बेटा अपने ख़ानदान की हुकूमत का वारिस होता है."
इस स्थिती में किसी भाई का सुल्तान के ख़िलाफ़ बग़ावत या साज़िश करना ज़रूरी नहीं था बल्कि ये भी मुमकिन था कि सल्तनत के ताक़तवर इलाक़े सुल्तान से नाख़ुश हो कर किसी भी दूसरे शहज़ादे को सुल्तान बनाने की कोशिश में लग जाते.
डॉक्टर अकरम अकंजे ने अपने लेख में ऑस्ट्रिया के एक राजदूत ओगियर ग़ुस्लिन डी बिस्बेक की प्रतिक्रिया का ज़िक्र किया जो सुल्तान सुलेमान प्रथम के दौर में वहां मौजूद थे.
"उस्मानी सुल्तान का बेटा होना कोई ख़ुशनसीबी नहीं है क्योंकि उनमें से एक जब सुल्तान बन जाता है तो बाक़ियों के लिए मौत का इन्तज़ार ही रह जाता है. अगर सुल्तान के भाई ज़िंदा हों तो फ़ौज की सुल्तान से ज़रुरत ही ख़त्म नहीं होती और सुल्तान अगर उनकी बात नहीं मानता तो वो कह देते हैं ख़ुदा तुम्हारे भाई को सलामत रखे, जिसका मतलब ये बताना होता है कि वो उसे भी तख़्त पर बिठा सकते हैं."
भाइयों के क़त्ल करने की परंपरा का ख़ात्मा
लेस्ली पेयर्स ने लिखा है कि शाही ख़ानदान में भाइयों को क़त्ल करवाने की परंपरा नापसंद होती जा रही थी.
"शुरू में इस परंपरा को सत्ता की एकता क़ायम रखने के लिए बर्दाश्त किया गया ताकि सुल्तान को किसी चैलेंज का सामना न करना पड़े."
उन्होंने आगे लिखा कि जब उस्मानिया सल्तनत का विस्तार हो रहा था और सुल्तान ख़ुद लम्बे अरसे के लिए राजधानी से दूर मुहिम पर जाते थे, लोगों को उस समय ये परंपरा ठीक लगती होगी लेकिन "सुल्तान सुलेमान के दौर के बाद कम उम्र लड़के और बच्चे जो अभी गोद में थे इस परंपरा का निशाना बने और अक्सर ऐसे सुल्तानों को बचाने के लिए जो बहुत कम राजधानी से बाहर जाते थे. सन् 1574 तक तो इस्तांबुल की जनता ने शहज़ादों के क़त्ल का ये ड्रामा देखा ही नहीं था."
इतिहासकार पेयर्स लिखती हैं, "किसी नए सुल्तान के सब भाइयों का एक साथ मारा जाना और महल से एक साथ जनाज़ों का निकलना जिनमें से कुछ बहुत ही छोटे थे देख कर लोगों को लगा होगा कि ये सब पुराने ज़माने के लिए था."
उन्होंने अपनी किताब में भाइयों को क़त्ल करवाने की इस परंपरा का ज़िक्र करते हुए इसके ख़ात्मे के अलग-अलग पहलुओं पर विस्तार से बात की है.
मेहमत तृतीय के बाद सुल्तान अहमद प्रथम तख़्त नशीन हुए लेकिन उन्होंने अपने भाई को दबाव के बावजूद क़त्ल नहीं करवाया लेकिन ये परंपरा उस समय पूरे तौर पर ख़त्म नहीं हुई.
इतिहास से पता चलता है कि सुल्तान अहमद प्रथम के सात बेटों में से चार उनके तख़्त पर बैठने वाले दो बेटों सुल्तान उस्मान द्वितीय और सुल्तान मुराद चतुर्थ के हुक्म पर मारे गए.
डॉक्टर अकरम ने लिखा कि जब सुल्तान अहमद प्रथम की मौत हुई तो उनकी जगह उनका भाई तख़्त नशीन हुआ हालांकि उनके बेटे मौजूद थे. "ये पहली बार था कि एक सुल्तान की मौत के बाद उनकी जगह उनके भाई ने ली."
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