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भारत हो या पाक, इन दिनों 'ग़द्दारी' का है सीज़न- वुसअत का ब्लॉग
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत हो या पाकिस्तान, दोनों जगह इन दिनों ग़द्दारी और संतरों का सीज़न चोटी पर है.
जब से सर्दियां शुरू हुई हैं, दोनों देशों में अगर पुलिस कोई पर्चा काटे और अगर उसमें साज़िश रचने, लोगों को उकसाने, गद्दारी और देश द्रोह के आरोप न लगें तो शक़ होने लगता है कि न तो अभियुक्त सही मायने में देशभक्त है और न ही पुलिस अपने काम में माहिर.
बस यूं समझिए कि हमारे यहां तो ब्रिटिश इंडियन पीनल कोड के क़ानूनी दहेज में मिली 140 साल पुरानी धारा 124ए की लूट सेल लगी हुई है.
ये धारा लगने का मतलब है कि आपको किसी बंद कमरे में देश के ख़िलाफ़ साज़िश रचने या हथियार उठाने या दुश्मन को राज़ बेचते हुए पकड़े जाने की ज़रूरत नहीं रही. बस हाथ का ग़लत इशारा भी आपको ग़द्दार साबित करने के लिए काफ़ी है.
दीदें, दाएं से बाएं की बजाय, बाएं से दाएं घुमाने से भी पुलिस ग़द्दार साबित कर सकती है और न साबित करना चाहे तो सामने से देश द्रोह का हाथी भी निकल जाए तो उसे चींटी बता दे.
गद्दारी की धारा
सारा खेल इस बात का है कि अभी सत्ता में कौन है और आप इस समय किस नज़रिए और पक्ष के हैं और आजकल देश भक्ति के लेटेस्ट फ़ैशन के साथ हैं या नहीं.
ऊपर वाला मेहरबान तो गांधी जी की मूर्ति पर गोबर मलने पर भी कोई पर्चा नहीं कट सकता और अगर ऊपर वाला नहीं मेहरबान तो जन गण मन एक साथ खुले में गाने के पीछे भी देश द्रोह मंडली का शक हो सकता है.
अब जैसे हैदराबाद की सिंध यूनिवर्सिटी में छात्रों ने हॉस्टल में पानी न आने के मुद्दे पर वीसी दफ़्तर के बाहर नारे लगाए तो उन पर गद्दारी की धारा ठोक दी गई.
इसी तरह पिछले हफ़्ते पश्तून तहफ्फुज़ मूवमेंट के अध्यक्ष मंज़ूर पश्तीन को न सिर्फ़ ग़द्दारी के आरोप में जेल भेज दिया गया बल्कि उनकी रिहाई के लिए इस्लामाबाद के प्रेस क्लब के बाहर जो तीस चालीस लोगों की भीड़ जमा थी उसमें से भी तीस पर भी गद्दारी की धारा लगा दी गई.
डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल्स
अगर ग़द्दारी वाक़ई साबित हो जाए तो कम से कम सज़ा उम्र क़ैद है.
मगर पुलिस सरकार और राष्ट्रवाद के व्यवहार में रफ़्ता-रफ़्ता कुछ बेहतरी भी आ रही है.
अंग्रेज़ों के बनाए गए डिफेंस ऑफ़ इंडिया रूल्स के बँटवारे के बाद डिफ़ेंस आफ़ पाकिस्तान यानी डीपीआर कहा जाने लगा.
ये वही रूल्स हैं जिनके तहत हिंदुस्तान छोड़ दो आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई थी.
पाकिस्तान में 1965 से 1985 तक डीपीआर के तहत बीस साल तक इमर्जेंसी लागू रही.
सरकार विरोधियों को...
इसके तहत सरकार को विरोधियों को जेल में रखने के लिए 90 दिनों तक तो कोई पर्चा काटने की भी ज़रूरत नहीं थी.
अगर अदालत किसी को रिहा भी कर देती तो उसे जेल से बाहर निकलते ही बिजली की तारें काटने या भैंस चोरी के आरोप में फिर अंदर डाल दिया जाता.
लेकिन आज चूंकि इमर्जेंसी लागू नहीं है लिहाज़ा भैंस चोरी जैसे घटिया आरोपों के बजाए ग़द्दारी जैसे आला इल्ज़ाम में पकड़ा जाता है.
और आजकल तो ये आरोप हर किसी पर टके से लग रहा है.
जैसे नाइन इलेवन (11 सितंबर, 2001) के बाद अगर पाकिस्तान में मस्जिद के बाहर जूते चुराते हुए भी कोई पकड़ा जाता तो उस पर आतंकवाद फैलाने की धाराएं लगा दी जाती थीं.
भारत और पाकिस्तान
फिर किसी ने सरकारी कर्मचारियों के कान में कहा कि भैया अगर तुम चांटा मारने पर भी आतंकवाद की धाराएं लगाओगे तो असली आत्मघाती हमला करने वालों पर क्या लगाओगे?
इस मश्वरे के बाद से बस इतना फ़र्क़ पड़ा है कि अब मामूली अपराध पर आतंकवाद की धाराओं की जगह ग़द्दारी की धाराएं लगने लगी हैं.
मज़े की बात है कि ख़ुद ब्रिटेन में अब से 11 साल पहले 2009 में ग़द्दारी की धारा क़ानून की किताबों से बाहर निकाल दी गई.
मगर हम इंडियन और पाकिस्तानी चूंकि पुरखों की एक-एक रवायत गले से लगाकर रखने के आदी हैं लिहाज़ा हमारे लिए बहुत मुश्किल है कि अगले 140 सालों तक भी 1870 से लागू 124ए जैसी अमृत धाराओं से इजाज़त ले सकें या ख़ुद ही छोड़ दें.
क्या हुआ कि हम काले हैं, ख़ून तो वही सफ़ेद है ना!
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