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मुस्लिम देशों का संगठन OIC क्या भारत के ख़िलाफ़ जाएगा?
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने रविवार को कहा कि भारत का नया नागरिकता क़ानून मुसलमान विरोधी है और इस पर ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी को प्रभावी आवाज़ उठानी चाहिए.
ओआईसी इस्लामिक देशों का संगठन है और इसमें सऊदी अरब का दबदबा है.
पाकिस्तान के मुल्तान में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए क़ुरैशी ने कहा कि ओआईसी कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और नागरिकता संशोधन क़ानून का प्रभावी तरीके से विरोध करे.
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा कि उन्होंने इन मामलों को लेकर अन्य इस्लामिक देशों से बात की है और ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक का प्रस्ताव दिया है. क़ुरैशी ने कहा कि उन्हें इस मामले में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है.
रेडियो पाकिस्तान ने रविवार को अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ओआईसी ने भारत प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन और नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर एक बैठक करने का फ़ैसला लिया है. कहा जा रहा है कि इस तरह की बैठक अगले साल अप्रैल में इस्लामाबाद में होगी.
पाकिस्तान का मोदी सरकार पर निशाना
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दावा किया कि भारत नरेंद्र मोदी के शासनकाल में सेक्युलरिज़म और हिन्दुत्व की विचारधारा में स्पष्ट तौर पर बँट गया है.
उन्होंने कहा, ''भारत के अल्पसंख्यक और पढ़ी-लिखी हिन्दू आबादी मुस्लिम विरोधी नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हैं. 11 दिसंबर को यह क़ानून बनने के बाद से भारत में विरोध-प्रदर्शन के दौरान अब तक 25 लोगों की मौत हो चुकी है. इस क़ानून के आलोचकों का कहना है कि यह मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है. दुनिया भर के अंतर्राष्ट्रीय अख़बारों ने इस क़ानून को आड़े हाथों लिया है.''
क़ुरैशी ने कहा, ''भारत के कम से कम पाँच राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस क़ानून को लागू करने से इनकार कर दिया है. मैंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को कश्मीर के मामले में भी कई पत्र लिखे हैं.''
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान अल साउद पिछले हफ़्ते पाकिस्तान आए थे. पाकिस्तानी अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार इसी दौरे में सहमति बनी है कि ओआईसी कश्मीर और विवादित नागरिकता संशोधन क़ानून पर सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक करेगा.
पाकिस्तान और सऊदी के रिश्तों में पिछले कुछ हफ़्तों से तनाव की बात कही जा रही थी क्योंकि सऊदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को मलेशिया में 19-20 दिसंबर को आयोजित कुआलालंपुर समिट में जाने से रोक दिया था.
ओआईसी से पाकिस्तान की उम्मीद
इसके बाद ही सऊदी के विदेश मंत्री पाकिस्तान के दौरे पर आए. पाकिस्तान ने कुआलालंपुर समिट में नहीं जाने के फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा था कि वो इस्लामिक दुनिया में सेतु बनाना चाहता है न कि टकराव बढ़ाने की मंशा रखता है.
हाल ही में बाबरी मस्जिद, नागरिकता संशोधन क़ानून और कश्मीर को लेकर ओआईसी ने एक बयान जारी किया था. इस बयान में ओआईसी ने कहा था, ''भारत के हालिया घटनाक्रम को हम क़रीब से देख रहे हैं. कई चीज़ें ऐसी हुई हैं, जिनसे अल्पसंख्यक प्रभावित हुए हैं. नागरिकता के अधिकार और बाबरी मस्जिद केस को लेकर हमारी चिंताएं हैं. हम फिर से इस बात को दोहराते हैं कि भारत में मुसलमानों और उनके पवित्र स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.''
ओआईसी ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों और दायित्वों के अनुसार बिना किसी भेदभाव के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मिलनी चाहिए. ओआईसी ने कहा कि अगर इन सिद्धांतों और दायित्वों की उपेक्षा हुई तो पूरे इलाक़े की सुरक्षा और स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी कश्मीर मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. शनिवार को इमरान ख़ान ने कहा था, ''अमरीका में अभी भारत की लॉबी पाकिस्तान की तुलना में मज़बूत है. भारत की मज़बूत लॉबीइंग कारण पाकिस्तान का पक्ष हमेशा दब जाता है और इसका नतीजा ये होता है कि अमरीकी नीतियों में हम पर भारत भारी पड़ जाता है.''
ओआईसी की भूमिका पर सवाल
जम्मू-कश्मीर का जब भारत ने विशेष दर्जा ख़त्म किया था तो ओआईसी लगभग ख़ामोश था. ओआईसी में सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों का दबदबा है. सऊदी ने भी अनुच्छेद 370 हटाने के मामले में पाकिस्तान का साथ नहीं दिया था और संयुक्त अरब अमीरात ने इसे भारत का आंतरिक मामला कहा था.
इसी साल मार्च में यूएई ने ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को आमंत्रित किया था. इसे लेकर पाकिस्तान ने कड़ी आपत्ति जताई थी. इसके बाद पाँच अगस्त को भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया तो ओआईसी ने भारत की आलोचना नहीं की थी. हालांकि तुर्की और मलेशिया ने इस मामले में भारत की खुलकर आलोचना की थी.
पाकिस्तान के नीति निर्माताओं के बीच यह आम सोच है कि सऊदी के नेतृत्व वाले ओआईसी ने कश्मीर के मामले में भारत के ख़िलाफ़ बिल्कुल समर्थन नहीं दिया. दूसरी तरफ़ ईरान, तुर्की और मलेशिया ओआईसी को सीधे चुनौती देना चाहते हैं कि वो इस्लामिक दुनिया के सेंटिमेंट को समझने और मंच देने में नाकाम रहा है.
ओआईसी भारत के ख़िलाफ़ जाएगा?
वहीं सऊदी अरब ओआईसी के ज़रिए मुस्लिम वर्ल्ड में राजनीतिक और राजनयिक प्रभाव क़ायम रखना चाहता है. अगर मलेशिया, तुर्की और ईरान की कोशिश सफल रही तो आने वाले महीनों में ओआईसी की प्रासंगिकता को गंभीर चुनौती मिलेगी. कहा जा रहा है कि मलेशिया, तुर्की, ईरान और पाकिस्तान इस समिट में जम्मू-कश्मीर पर भी चर्चा करने वाले थे.
मलेशिया और तुर्की कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में खुलकर भारत के ख़िलाफ़ बोले भी थे. सऊदी को लेकर पाकिस्तान के भीतर कहा जा रहा है कि भारत के साथ उसके अपने हित जुड़े हैं इसलिए कश्मीर मामले में वो ख़ुद बोल नहीं रहा.
14 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के मुज़फ़्फ़राबाद में असेंबली को संबोधित करते हुए कहा था कि कश्मीर पर दुनिया के सवा अरब मुसलमान एकजुट हैं लेकिन दुर्भाग्य से शासक चुप हैं.
कश्मीर पर इमरान ख़ान मुस्लिम देशों से लामबंद होने की अपील लगातार कर रहे हैं लेकिन इसी बीच मुकेश अंबानी ने घोषणा कर दी थी कि सऊदी अरब की तेल कंपनी अरामको अब तक का सबसे बड़ा निवेश भारत में करने जा रही है.
यह सऊदी की सरकारी कंपनी है और इस पर नियंत्रण किंग सलमान का है. यह घोषणा इमरान ख़ान की चाहत के बिल्कुल उलट थी.
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