भारत में हिंसक प्रदर्शनों पर पाकिस्तानी अख़बारों ने क्या कहा?: पाक उर्दू प्रेस रिव्यू

    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में इस हफ़्ते कुआलालंपुर समिट, जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की सज़ा, और भारत प्रशासित कश्मीर और भारत में सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन से जुड़ी ख़बरें सुर्ख़ियों में रहीं.

सबसे पहले बात भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) और एनआरसी के ख़िलाफ़ हो रहे देश-व्यापी विरोध प्रदर्शनों की.

भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. कई जगहों पर प्रदर्शन हिंसक हुए हैं और उत्तर प्रदेश में अब तक कम से कम 15 लोग पुलिस की गोली से मारे जा चुके हैं. मंगलुरु में भी दो लोगों की मौत हो चुकी है. पाकिस्तानी मीडिया में इस ख़बर के बारे में ख़ूब चर्चा हो रही है.

एक्सप्रेस अख़बार ने लिखा है, ''विवादित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ भारत में भारी विरोध प्रदर्शन, पुलिस फ़ायरिंग में छह की मौत.''

अख़बार लिखता है कि जानी मानी लेखिका अरुंधति रॉय ने भी दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया. अख़बार के अनुसार अरुणधति ने कहा कि मोदी सरकार पूरे भारत को कश्मीर बनाने की कोशिश कर रही है.

अख़बार जंग ने लिखा है कि 'नागिरकता क़ानून के ख़िलाफ़ लाखों भारतीय सड़कों पर उतर गए हैं'. अख़बार दुनिया ने लिखा है कि 'भारत में प्रदर्शनकारियों का समंदर.'

श्रीनगर की जामा मस्जिद में जुमे की नमाज़

भारत प्रशासित कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करने के पाँच महीने बाद श्रीनगर की जामा मस्जिद में जुमे की नमाज़ हुई. ये ख़बर पाकिस्तान के सारे अख़बारों में प्रमुखता से छपी.

अख़बार नवा-ए-वक़्त ने सुर्ख़ी लगाई है, ''श्रीनगर जामा मस्जिद में पाँच महीने बाद नमाज़-ए-जुमा, लेकिन दूसरी मस्जिदों में अभी भी ताले लगे हैं.''

अख़बार लिखता है कश्मीर की छह सौ साल पुरानी ऐतिहासिक श्रीनगर जामा मस्जिद पाँच महीने तक बंद रहने के बाद जुमे को नमाज़ के लिए खोल दी गई. अख़बार के अनुसार मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वाले एक नौजवान शाहिद का कहना था, ''आज 19 हफ़्तों बाद जामा मस्जिद में अज़ान हुई है. हम समझते हैं कि आज हमारी ईद है.''

कुआलालंपुर समिट में इमरान का ना जाना

मलेशिया में हुए कुआलालंपुर समिट से जुड़ी ख़बरें भी सुर्ख़ियों में रहीं. इसी साल सितंबर महीने में न्यूयॉर्क में मलेशियाई पीएम महातिर मोहम्मद, तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन और पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान के बीच इस समिट को लेकर सहमति बनी थी.

इसके बाद पिछले महीने 29 नवंबर को मलेशिया के उप-विदेश मंत्री मर्ज़ुकी बिन हाजी याह्या ने इमरान ख़ान को फ़ोन कर इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था. इमरान ख़ान ने इस आमंत्रण को स्वीकार भी कर लिया था. लेकिन आख़िरी वक़्त में इमरान ख़ान ने समिट में जाने से मना कर दिया. इसको लेकर कई तरह की बातें हो रही हैं.

अख़बार जंग ने सुर्ख़ी लगाई है, ''न धमकी दी, न समिट में जाने से रोका: सऊदी अरब''.

दरअसल इस तरह की बात कही जा रही है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इमरान ख़ान पर दबाव डाला था कि वो इस समिट में शरीक न हों.

अख़बार जंग के अनुसार इस्लामाबाद स्थित सऊदी दूतावास ने एक बयान जारी कर कहा कि सऊदी अरब पाकिस्तानी मीडिया में चलने वाली इन ख़बरों को सख़्ती से ख़ारिज करता है जिनमें कहा जा रहा है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान को मलेशिया में होने वाले समिट में शामिल न होने के लिए मजबूर किया है.

ये बात इसलिए अहम है क्योंकि तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने ठीक एक दिन पहले कहा था कि पाकिस्तान अपनी मजबूरी के कारण शामिल नहीं हो सका.

अख़बार एक्सप्रेस के अनुसार अर्दोआन ने कहा कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान को धमकी दी थी कि अगर वो कुआलालंपुर समिट में शामिल होगा तो सऊदी अरब पाकिस्तान के बैंक में रखे अपने पैसे निकाल लेगा और सऊदी अरब में काम कर रहे 40 लाख पाकिस्तानियों को वहां से निकाल देगा और उनकी जगह बांग्लादेश के लोगों को अपने यहाँ नौकरी देगा.

'इमरान की राजनयिक ग़लतियां'

अख़बार जंग के संपादकीय पेज पर इस मामले में एक लेख भी है जिसमें इमरान ख़ान की जमकर आलोचना की गई है. पत्रकार सलीम साफ़ी के इस लेख का शीर्षक है, 'राजनयिक ग़लतियां'.

इस लेख में इमरान ख़ान की अब तक की सात राजनयिक ग़लतियों का ज़िक्र किया गया है. सलीम साफ़ी लिखते हैं कि जिस फ़ोरम की स्थापना सिर्फ़ दो महीने पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाह के बाद चार मित्र राष्ट्रों ने की थी और जिसके पहले समिट के एजेंडे में भारत प्रशासित कश्मीर को भी शामिल कर दिया गया था, उसमें शामिल होने से पाकिस्तान आख़िरी वक़्त में मुकर गया.

लेखक के अनुसार कश्मीर के मामले में पूरी दुनिया में चीन के अलावा तुर्की, मलेशिया और ईरान ही तीन ऐसे देश हैं जो पाकिस्तान और कश्मीर के समर्थन में खुलकर सामने आए थे. लेख में कहा गया है कि पहली बार दुनिया को ये संदेश गया है कि पाकिस्तान अपनी विदेश नीति में स्वतंत्र नहीं है.

परवेज़ मुशर्रफ की फांसी

पाकिस्तान की एक विशेष अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति और सेना के पूर्व अध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को देशद्रोही क़रार देते हुए फांसी की सज़ा सुनाई है.

इस फ़ैसले के बाद पाकिस्तानी सेना और न्यायपालिका एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हो गए हैं. फ़ैसले के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ ग़फ़ूर ने कहा था कि 40 साल तक देश की सेवा करने वाला व्यक्ति कभी देश का ग़द्दार नहीं हो सकता.

लेकिन पाकिस्तानी बार काउंसिल ने सेना के इस बयान को ख़ारिज करते हुए कहा कि सेना को लगता है कि देश की सारी संस्थाएं उसके मातहम काम करती हैं.

अख़बार नवा-ए-वक़्त के अनुसार पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आसिफ़ सईद खोसा ने कहा है कि मुशर्रफ़ केस में फ़ैसले को लेकर न्यायपालिका को बदनाम करने की साज़िश रची जा रही है.

रिटायरमेंट के समय अपने सम्मान में दिए गए फ़ेयरवेल में उन्होंने कहा कि उनपर ये आरोप लगाया जा रहा है कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ मामले में उन्होंने स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले को प्रभावित किया है.

जस्टिस खोसा के अनुसार ये बेबुनियाद आरोप न केवल उनको बल्कि पूरी न्यायपालिका को बदनाम करने की साज़िश है. उन्होंने कहा कि सच का बोलबाला होगा. उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को पहले भी बदनाम करने की कोशिश की गई है लेकिन अदालत ने उन चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला किया है और संविधान की रक्षा की है.

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