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अमरीकी कांग्रेस का सवाल : कश्मीर को लेकर कैसे करें भारत पर भरोसा
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीकी कांग्रेस में हुई एक लंबी सुनवाई में अमरीकी नेताओं ने कश्मीर को लेकर भारत के रुख की आलोचना की है.
अमरीकी कांग्रेस में मंगलवार को दक्षिण एशिया क्षेत्र के मानवाधिकारों पर हुई चर्चा के दौरान कश्मीर का मुद्दा ही हावी रहा.
अमरीकी संसदीय समिति ने अमरीकी सरकार की ओर से पेश अधिकारियों के अलावा कश्मीर मुद्दे पर स्थानीय गवाहों की बात भी सुनी.
दक्षिण एशिया मामलों की सहायक विदेश मंत्री एलिस वेल्स ने समिति के समक्ष कहा कि अमरीका ने कश्मीर के हालात को लेकर अपनी चिंता से भारत को अवगत कराया है.
उन्होंने कहा, "विभाग ने भारत को सैकड़ों लोगों और जम्मू कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत कई नेताओं को लगातार हिरासत में रखे जाने को लेकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया है. हमने भारतीय अधिकारियों से इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बहाल करने की अपील की है और जल्द से जल्द विधानसभा चुनाव कराने की मांग की है."
वेल्स ने कहा, "अमरीका कश्मीरी लोगों के शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार का समर्थन करता है लेकिन उन लोगों की आलोचना करता है जो बातचीत को कमज़ोर करने के लिए हिंसा और डर का इस्तेमाल करते हैं."
एलिस वेल्स ने ये भी कहा कि कश्मीर से 'अनुच्छेद 370 हटाना भारत का आंतरिक मामला है' लेकिन उनकी चिंता यहां हो रहे 'मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर है'.
भारत पाकिस्तान दोनों से सवाल
अमरीकी कांग्रेस के सदस्यों ने सुनवाई के दौरान विदेशी पत्रकारों, विदेशी राजनयिकों और अधिकारियों के कश्मीर में जाने पर रोक के मुद्दे को भी उठाया और कहा कि इस वजह से यहां से सही सूचनाएं भी नहीं मिल पा रही हैं.
इस सुनवाई के दौरान पाकिस्तान की भी अपनी ज़मीन से आतंकवाद को समाप्त न करने को लेकर आलोचना की गई लेकिन अधिकतर अमरीकी अधिकारियों के सवाल भारत पर ही केंद्रित रहे.
उप-समिति के चेयर ब्रेट शर्मन ने सवाल किया, "क्या हम भारत सरकार के अधिकारियों का भरोसा कर सकते हैं जब भारत सरकार हमारे राजनयिकों को वहां जाकर हालात का जायज़ा लेने से ही रोक रही है?"
इस सवाल के जवाब में वेल्स ने कहा कि अमरीकी अधिकारी कश्मीर के बारे में जानकारी के लिए भारतीय अधिकारियों पर ही निर्भर हैं.
वहीं समिति के समक्ष अपनी बात रखते हुए शिक्षाविद और लेखिका निताशा कौल ने भारत के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा, "यहां मूल सवाल लोगों की मर्ज़ी का है. अगर कोई क़दम लोगों के कल्याण और विकास के लिए उठाया गया है तो फिर दसियों हज़ार सैनिकों को बुलाने की ज़रूरत क्यों पड़ी?"
निताशा ने कहा, "क्यों ये फ़ैसला लोगों की कोई भी राय लिए बिना अचानक किया गया, यहां तक की भारत समर्थक नेताओं तक को जेल में डाल दिया गया. जनता को राय ज़ाहिर करने के अधिकार से पूरी तरह वंचित कर दिया गया, अगर ये उनके भले के लिए हैं तो फिर उनमें से किसी को इस बारे में कुछ भी बोलने क्यों नहीं दिया जा रहा है?
कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण?
अमरीकी समिति में कश्मीर का मुद्दा उठने के बाद एक बार फिर सवाल उठा है कि क्या कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण हो रहा है?
ऑब्ज़रवर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े कशिश परपियानी कहते हैं, "कश्मीर का मुद्दा अभी भी अधिकतर द्विपक्षीय ही है. अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस मुद्दे की चर्चा हुई है तो ये कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीयकरण हुआ है लेकिन क्या किसी और का कहना यहां माना जाएगा तो ऐसा नहीं हो रहा है. इस लिहाज से ये कहा जा सकता है कि ये मुद्दा अभी भी पूरी तरह द्विपक्षीय ही है."
वहीं भारत के पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं, "मानवाधिकारों का मुद्दा चिंता का विषय बना रहता है. ख़ासकर जिस तरह के हालात दुनिया में बने हुए हैं. शरणार्थियों के संकट की वजह से भी मानवाधिकारों का मुद्दा और गंभीर हो जाता है. लेकिन मैं ये नहीं मानता कि अमरीकी कांग्रेस में कश्मीर में मानवाधिकारों पर चर्चा से कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण हुआ है. सभी देशों ने ये बात कही है कि ये भारत का अंदरूनी मसला है और भारत और पाकिस्तान को अपने मुद्दे आपस में निपटाने चाहिए."
शशांक कहते हैं, "भारत में मानवाधिकारों को लेकर संवेदनशीलता है और यहां मानवाधिकार आयोग और अदालतें हैं. कश्मीर में जो पाबंदियां हैं उन्हें जल्द से जल्द हटाने पर भारत का ज़ोर है. भारत के लिए सबसे ज़रूरी ये है कि सुरक्षा हालात को सुधारते हुए लोगों के मानवाधिकार सुनिश्चित किए जाएं. "
शशांक ये भी कहते हैं कि कश्मीर में सुरक्षा की दृष्टि से जो पाबंदियां लगाई गई हैं उन्हें जितना जल्द हो सके, हटाया जाना चाहिए. भारत के संविधान ने जो आज़ादी लोगों को दी है वो उन्हें मिलनी चाहिए.
ऑब्ज़रवर रिसर्च फ़ाउंडेशन से जुड़े कशिश का ये भी मानना है कि सुनवाई के दौरान रिपब्लिकन नेता का झुकाव भारत की ओर दिखा. इसका उदाहरण देते हुए कशिश कहते हैं कि अमरीकी विदेश नीति भी बंटी हुई नज़र आई और मानवाधिकारों का मुद्दा अधिकतर डेमोक्रेट सांसद ही उठा रहे थे.
उन्होंने कहा, "रिपब्लिकन नेता टेड होहो ने अपने सवालों के दौरान कई बार ज़ोर दिया कि कश्मीर में जो भी हुआ है उसकी बड़ी वजह ये है कि पाकिस्तान आंतकवाद के ख़िलाफ़ ज़रूरी क़दम नहीं उठा सका. वो क्रिया की प्रतिक्रिया की बात कर रहे थे. मानवाधिकारों के मुद्दे पर भारत की आलोचना अधिकतर डेमोक्रेट सांसदों की ओर से ही हुई. एक तरह से विदेश नीति के मामले में अमरीका बंटा हुआ नज़र आया."
कशिश कहते हैं, "पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति थॉमस जेफ़रसन ने एक बार कहा था कि घरेलू मुद्दों की बात हो तो हम भले ही एक बंटे हुए देश की तरह रहें लेकिन विदेश नीति के हर मामले में हम एकजुट रहें. डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं की राजनीति अमरीका की सीमा तक ही सीमित रहे. अमरीकी विदेश नीति का ये विचार अब टूट रहा है. विदेशी मुद्दों पर रिपब्लिकन और डेमोक्रेट नेता बंटे हुए नज़र आ रहे हैं."
सुनवाई के दौरान एलिस वेल्स ने ये भी कहा कि अमरीका के इस आंकलन का भारत के साथ रिश्तों पर असर नहीं होगा.
कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रमुख प्रावधानो को हटाए जाने के बाद अमरीका के कई नेताओं ने कश्मीर के हालात पर चिंता तो ज़ाहिर की है लेकिन अमरीका और भारत के रिश्तों में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है.
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