कम्युनिस्ट चीन ने पूंजीवाद को भी कैसे साध लिया

    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

1949 में जब कम्युनिस्ट पार्टी ने माओत्से तुंग के नेतृत्व में चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी को हराकर सत्ता हासिल की, तब चीन बेहद ग़रीब और एकदम अलग-थलग पड़ा हुआ था.

मगर इसी चीन को दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में शामिल होने में 70 से भी कम साल लगे. मंगलवार को चीन ने अपनी स्थापना की 70वीं वर्षगांठ मनाई और तियेनएनमेन चौक पर देश की आर्थिक और सामरिक शक्ति का प्रदर्शन किया.

लेकिन ग़रीब देश से आर्थिक सुपर पावर बनने के बदलाव के इस सफ़र में आज का चीन क्या वही चीन रह पाया है जिसका सपना पूंजीवाद के प्रबल आलोचक रहे चेयरमैन माओ ने देखा था?

चीन के संस्थापक माओत्से तुंग ने एक अक्टूबर 1949 को बीजिंग के तियेनएनमेन स्कवेयर में जमा जनता के सामने चीनी जनवादी गणराज्य के गठन के समय कहा था, "चीनी जनवादी गणराज्य और केंद्रीय जनवादी सरकार की आज स्थापना होती है. हमारी सरकार पूरे देश के लोगों की एकमात्र वैध सरकार है जो चीनी जनवादी गणराज्य का प्रतिनिधित्व करती है."

माओ ने अपने भाषण में 'समानता'और 'लाभ में बराबर हिस्सेदारी' पर ज़ोर देते हुए कहा था, "हम समानता, लाभ में सभी की बराबर हिस्सेदारी और विदेशी सरकारों की क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान के सिद्धांतों का पालन करना चाहते हैं."

'समाजवादी चीन' का माओ का सपना

70वीं वर्षगांठ समारोह के दौरान अपने भाषण में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी एकता, विकास और मज़बूती पर ज़ोर दिया और कहा- आज 'समाजवादी चीन' दुनिया के सामने खड़ा है.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह चीन, वाक़ई 'समाजवादी' चीन है? और क्या आर्थिक सुपर पावार बन चुका यह देश अपने संस्थापक चेयरमैन माओ के सपने को पूरा कर पाया है?

इस सवाल के जवाब में चीन मामलों की जानकार और दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं कि चीन में कम्युनिज़म का भाव अंश मात्र ही रह पाया है.

वो कहती हैं, "चीन एक ही मायने में कम्युनिस्ट है कि इस देश का शासन कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में है. इस तरह से उसने साम्यवाद का जामा ओढ़ा हुआ है. मगर इसके असल मायनों और विचारधारा की तलाश करें तो वह चीन में कम ही दिखती है, इसका भाव थोड़ा ही रह गया है."

अलका आचार्य कहती हैं, " माओ चीन को शक्तिशाली, अमीर और बहुत बड़ी ताक़त के रूप में देखना चाहते थे. यह उनका सपना तो पूरा हुआ है मगर पिछले 40 सालों में चीन ने जो नीतियां अपनाई हैं, वह माओ और उनके क्रांतिकारी साथियों के समाजवाद के सपनों से भिन्न है."

"माओ का सपना था- समता वाला ऐसा देश जहां सभी लोगों में बराबरी हो, ऊंच-नीच का भाव न हो. वह देश में पूंजीवाद का न्यूनतम भूमिका देखना चाहते थे. यह सोचा गया था कि मज़दूर देश का ढांचा संभालेंगे. किसान और मज़दूर कम्युनिस्ट पार्टी के आधार थे. आज उन्हीं को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है. न्यू मिडिल क्लास नाम का तबका उभरा है, जिसके पास पैसा है और उपभोक्तावाद में यक़ीन रखता है. ये सभी बातें माओ से दूर-दूर तक मेल नहीं खातीं."

पूंजीवाद विरोध से अब तक

माओत्से तुंग पूंजीवाद के कट्टर विरोधी थे. मगर इन 70 सालों में चीन पूंजीवाद की राह पर चलते हुए दुनिया का सबसे तेज़ी से तरक्की कर रहा देश बन गया है.

चीन के आर्थिक विकास और समृद्धि से पूरी दुनिया हैरान है. बीते साल अक्टूबर में जब कम्युनिस्ट पार्टी का अधिवेशन हुआ था, उसमें राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विचारधारा को संविधान में शामिल करते हुए उन्हें चीन के पहले कम्युनिस्ट नेता और संस्थापक माओत्से तुंग के बराबर दर्जा दिया गया था.

उस दौरान अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद का दृष्टिकोण रखा था. उहोंने कहा था, "ये नया दौर हमारे लक्ष्य की ओर बढ़ने की दिशा में पिछली सफलताओं को बरकरार रखने का दौर होगा. यह दौर चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद को सफल बनाने के लिए ऐतिहासिक प्रयास करने का है. खुलेपन से तरक्की का रास्ता खुलता है जबकि ख़ुद को अकेले रखने में आप पिछड़ जाते हैं. चीन, दुनिया के लिए अपने दरवाज़े बंद नहीं करेगा बल्कि पहले से अधिक खुलापन लाएगा."

चीन की वर्तमान अर्थव्यवस्था इसी 'चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद' पर आधारित है, जिसे 'जिनपिंग थॉट' भी कहा जाता है. लेकिन इसका मतलब क्या है और क्या यह कितना सफल रहा है? इस बारे में हमने दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह से बात की.

वो कहते हैं, "चीन आज अपने आपको एक सोशलिस्ट इकॉनमी विद चाइनीज़ कैरक्टरस्टिक्स के नाम से जानना चाहता है. यानी जिसमें मार्केट में एक सीमित आज़ादी के साथ सरकार का कड़ा रेग्युलेशन है. यह एक यूनीक मॉडल है और लगता है कि यह सफल रहा है. रूस या सोवियत संघ की सेंट्रल प्लैनिंग हो या फिर पश्चिमी देशों के मुक्त बाज़ार, दोनों को झटके लगे हैं. मगर चीन की आर्थिक वृद्धि की दर टिकाऊ रही है. 50 के दशक में चीन के संस्थापकों का यही सपना था, यह कहना मुश्किल है मगर चीन की आर्थिक सफलता को कम से कम झुठलाया नहीं जा सकता."

शाओपिंग की नीतियों का अनुसरण

जिस समय कम्युनिस्ट पार्टी चीन में सत्ता में आई थी, देश बहुत ज़्यादा ग़रीब था. न तो इसके अन्य देशों के साथ कूटनीतिक रिश्ते थे और न कोई ट्रेडिंग पार्टनर.

माओत्से तुंग ने 1976 में अपनी मौत तक 27 सालों तक चीन का नेतृत्व किया और उन्होंने देश की आत्मनिर्भरता पर ही ज़ोर दिया. उन्होंने 1950 के दशक में 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' के तहत चीन की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के औद्योगिकरण की कोशिश की. फिर कम्युनिस्ट पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों से मुक्ति पाने के इरादे से 1966 से 1976 तक सांस्कृतिक क्रांति चलाई.

माओ के निधन के बाद सत्ता में आए डांग शाओपिंग, जिन्होंने सुधारवादी क़दम उठाते हुए चीन की अर्थव्यवस्था को नई शक्ल देने की कोशिश की थी.

प्रोफ़ेसर अलका आचार्य बताती हैं कि चीन को माओ से लेकर जिनपिंग वाले दौर में पहुंचाने में डांग शाओपिंग की भूमिका अहम रही है.

"माओ ने चीन को लिबरेशन दिया था और शाओपिंग के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने चीन को अमीर बना दिया. शाओपिंग ने गद्दी संभालते ही सुधार लाते हुए चीन का कायापलट कर दिया. उनके लाए सुधार माओ के राजनीतिक आर्थिक विकास के सिद्धांतों से अलग होते चले गए और चीन में मार्केट का रोल बढ़ता गया. उनका एक कथन है- सोशलिज़्म कैन नॉट भी बिल्ट ऑन पोवर्टी यानी ग़रीबी के आधार पर समाजवादी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती."

माओ ने तरक्की के साथ-साथ सामाजिक रिश्तों को भी समतावादी करने और आत्मनिर्भरता के दम पर ढालने पर ज़ोर दिया था मगर शाओपिंग ने उस फ़ोकस को शिफ़्ट करके सिर्फ़ ग्रोथ पर जोर देना शुरू किया.

उनका विचार था कि एक बार ग्रोथ हो जाए तो बाक़ी चीज़ें संभल जाएंगी. मगर प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं अब हालात यह हैं चीन सबसे विषम समाज हो गया है और उसकी नीतियों से न सिर्फ़ एकतरफ़ा ग्रोथ हो रही बल्कि पर्यावरण वगैरह पर भी असर पड़ रहा है.

चीन बन गया दुनिया का कारखाना

आर्थिक नीतियों का जो ढांचा डांग शाओपिंग ने खड़ा किया था, आगे भी उसी आधार पर नीतियां बनीं. डांग शाओपिंग के दौर में किसानों को अपनी ज़मीनों पर खेती करने की सुविधा दी गई जिससे खाने-पीने का संकट कम हुआ और लोगों का जीवन स्तर सुधरा.

फिर जब 1979 में अमरीका और चीन के कूटनीतिक रिश्ते स्थापित हुए और विदेशी निवेश का रास्ता खुला तब सस्ते मज़दूरों और सस्ती जगहों का फ़ायदा उठाने के लिए ख़ूब निवेश आया.

साल 2001 में चीन जब विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ और इसकी आर्थिक तरक्की की रफ़्तार और बढ़ गई. जल्द ही चीनी सामान दुनिया भर में मिलने लगा. ये दुनिया की ज़रूरत की चीज़ों को तैयार करने वाला कारखाना बन गया.

प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं कि किस तरह से चीन ने साम्यवाद को नई परिभाषा दी है, "मार्क्स का दर्शन था कि मज़दूरों की क्रांति अपने आप आनी थी. उनका विचार था कि जब पूंजी कुछ हाथों में रुकती जाएगी तो ज़्यादातर लोग कमज़ोर हो जाएंगे और क्रांति होगी. मगर ऐसा नहीं हुआ. इसीलिए सोवियत संघ के गठन के समय लेनिन को एक पार्टी बनानी पड़ी. जब माओ ने चीन में क्रांति की, तब वहां पूंजीवाद नहीं था. वहां किसान थे. तो चीन ने साम्यवाद को नई परिभाषा दी. फिर आज वहां पूंजीवादियों को भी शामिल किया जा रहा है."

प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं, "चीन की 70वीं सालगिरह में एक झांकी आंत्रप्नन्यर्स की भी थी. माओ की सोच थी मज़दूरों को अहमियत देने की. उस सोच से चीन अब बड़े आंत्रप्रन्यर्स को सेलिब्रेट करने तक पहुंच गया है. ज़ाहिर है, बदलाव आया है. अगर इसकी सफलता की बात करें तो आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार में तो यह सफल नज़र आती है."

तरक्की का दूसरा पहलू

पिछले 40 सालों में चीन ने अपने यहां निवेश बढ़ाने के लिए और व्यापार के नए रास्ते तलाशने के लिए कई सारे सुधार किए हैं. इस तरह से वह अपने देश में लाखों लोगों को ग़रीबी से निकालने में भी कामयाब हुआ है.

मगर यह इस तेज़ी से तरक्की कर रहे देश की सफलता की कहानी का एक ही पहलू है.

अचानक आई समृद्धि ने असमानता में भी बढ़ोतरी की है. चीन मामलों के जानकार और जेएनयू के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह के मुताबिक़, "फ़्री मार्केट के कारण चीन को यह तीन चार दशकों में आर्थिक वृद्धि का जो इंजेक्शन लगा है, उससे विषमता बढ़ी है."

प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं कि चीन को लगता है कि हर समस्या का समाधान आर्थिक विकास से हो जाएगा, मगर ये सोच पूरी तरह ठीक नहीं कही जा सकती.

"जो सशक्तीकरण से लाभान्वित हैं, वे अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हुए हैं और अपनी बात कहना चाहते हैं. चीन को लगता है कि हॉन्ग कॉन्ग में चल रहे प्रदर्शन या फिर वीगरों को लेकर आ रही समस्या, ये आर्थिक तरक्की आने से हट जाएंगी. 70वीं वर्षगांठ पर जिनपिंग ने अपने भाषण में भी यही कहा कि हम सभी लोगों को समृद्ध करेंगे. मकाऊ और हॉन्ग कॉन्ग को लेकर कहां कि वहां समृद्धि के साथ स्थिरता भी बनाए रखेंगे."

"चीन को लगता है कि समृद्धि आने से लोगों की परेशानियां और चिंताएं ख़त्म हो जाएंगी जबकि दूसरे देश ऐसा नहीं मानते. पश्चिमी देशों का नज़रिया है कि आदमी की ज़रूरतें उसकी आर्थिक ज़रूरतें से परे होती हैं. वहां रहने, जीने और बोलने की आज़ादी को आर्थिक समानता से आगे माना गया है. पश्चिमी देशों का मानना है कि आर्थिक प्रगति करके सब ठीक करने का चीन के दृष्टिकोण के नतीजे बहुत अच्छे निकलने की संभावना कम है."

राष्ट्रवाद का सहारा

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर अलका आचार्य कहती हैं कि आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ आई इस विषमता के कारण चीन के मौजूदा नेतृत्व के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं और उससे निपटने के लिए माओ के नाम और राष्ट्रवाद का सहारा लिया जा रहा है.

यह बात मंगलवार को दिए गए शी जिनपिंग के भाषण में भी दिखी.

अलका आचार्य कहती हैं, "वह अब देश को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं. वह जानते हैं कि समाज में अनरेस्ट भी है और ऐसा नहीं है कि लोग परेशान नहीं हैं. कहीं-कहीं वे काफ़ी बेहाल हैं. ऐसे में शी जिनपिंग ख़ुद को माओ के बराबर नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करने की कोशिश कर रहे हैं. वह कई बातों में माओ का ज़िक्र करके उनके बहाने समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं."

सीमित आज़ादी वाले बाज़ार के बावजूद जिस तरह से चीन ने आर्थिक प्रगति की है, वह पूरी दुनिया के लिए मिसाल है. डांग शाओपिंग की ग्रोथ आधारित रणनीति को हर नेता ने अपने हिसाब से आगे बढ़ाने की कोशिश की है और उसमें वे काफ़ी हद तक सफल भी हुए हैं.

इससे शक्तिशाली और आत्मनिर्भर चीन का माओत्से तुंग का सपना बेशक़ पूरा होता दिख रहा है, मगर उसमें समानता और लाभ में बराबर हिस्सेदारी कहीं नज़र नहीं आती, जिसका ज़िक्र उन्होंने नए देश का गठन करते समय किया था.

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