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अनुच्छेद 370: कश्मीर पर क्यों मुश्किल है पाकिस्तान की राह-विश्लेषण
- Author, श्रुति अरोड़ा
- पदनाम, एशिया-पैसेफिक विशेषज्ञ, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारत ने कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 को हटाने का फ़ैसला ऐसे समय में किया है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अपने कार्यकाल की पहली सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहे हैं.
यह ऐसी अभूतपूर्व स्थिति है जिसका अनुमान लगाना मुश्किल था.
पांच अगस्त को भारत प्रशासित कश्मीर को विशेष दर्जे के तहत मिली स्वायत्तता को ख़त्म कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार न केवल इस मुस्लिम बहुल राज्य को संघीय शासन के तहत ले आई बल्कि इसने दुनिया के सबसे लंबे समय से चल रहे संघर्षों में से एक को वार्ता की मेज़ से ही हटा दिया.
जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेश में बाँटने का भारत का एकतरफ़ा फ़ैसला दुनिया के लिए यह एलान है कि कश्मीर भारत का 'आंतरिक मामला' है.
इससे भारतीय दृष्टिकोण से सब कुछ बदल जाता है.
लेकिन पाकिस्तान ने भारत की कड़े शब्दों में आलोचना की है. उसने कश्मीर को संवेदनशील मुद्दा बताते हुए कहा कि यह उनके देश के इतिहास, राजनीति, रणनीति और पहचान से जुड़ा है.
1947 में ब्रिटिश शासन से मिली आज़ादी के बाद से कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच दो युद्धों का कारण रहा है. दोनों देश इस पर दावा करते हैं लेकिन दो भौगोलिक हिस्सों पर दोनों का अलग-अलग प्रशासन है.
क्या पाकिस्तान को इसकी उम्मीद थी?
इसके साफ़-साफ़ संकेत थे.
दशकों तक, भारत की दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और इसकी पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) लगातार कहते रहे हैं कि कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 370, राज्य को देश के बाक़ी हिस्सों के साथ जोड़ने से रोकती है.
इस प्रावधान को ख़त्म करने की घोषणा बीजेपी का लंबे समय से किया गया वादा था. 2019 के चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद सत्तारूढ़ पार्टी के पास आख़िरकार वो चुनावी जनादेश आ गया जिसकी ज़रूतर उसे अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए थी.
लेकिन ज़्यादातर भारतीयों की तरह, पाकिस्तान के लिए भी बीजेपी की अगुवाई वाली भारत सरकार का यह फ़ैसला अचरज भरा था.
स्थानीय मीडिया के मुताबिक़ पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा कि भारत की यह कार्रवाई 'पूरी तरह आश्चर्यचकित' करने वाली है.
पाकिस्तानी चैनल जियो टीवी के मुताबिक़, उन्होंने कहा, "हमें कुछ-कुछ अंदाज़ा था कि भारत ऐसी कोई कार्रवाई कर सकता है और इसे जानते हुए हम किसी भी घटना के लिए तैयार थे लेकिन हमें पता नहीं था कि यह 24 घंटे के भीतर ही हो जाएगा."
आलोचकों का तर्क है कि इस क़दम को एक आश्चर्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए था क्योंकि भारत प्रशासित कश्मीर में बीते कुछ हफ़्तों की घटनाएं इस तरह का कुछ होने वाला है इस ओर इशारा कर रही थीं.
देश में विपक्षियों समेत कुछ लोगों ने पाकिस्तान की 'साधारण' प्रतिक्रिया और उसकी विदेश नीति की तत्परता की भी आलोचना की.
कश्मीर पर भारत की इस घोषणा से पहले, पाकिस्तान अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और विरोधियों पर क़ानूनी कार्रवाई जैसे घरेलू मुद्दों से निपटने में लगा था.
स्थानीय मीडिया ने विपक्षी नेताओं के ख़िलाफ़ चल रही जांच और डराने धमकाने के मामलों की सूचना दी लेकिन सरकार ने उन आरोपों को ख़ारिज कर दिया.
स्थानीय दैनिक पाकिस्तान टुडे के मुताबिक़, "इसकी वजह से उनके पास कश्मीर के बारे में बीजेपी के शीर्ष नेताओं के बीच जो चर्चा हो रही थी, उसके बारे में जानकारी इकट्ठा करने का बहुत कम समय था."
इसके संपादकीय में लिखा गया है, "पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ) सरकार और इसके समर्थकों ने चुनाव के बाद भारत से आ रहे संकेतों की सही व्याख्या नहीं की. वे इस घोषणा के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे."
पाकिस्तान ने कैसे जवाब दिया?
उम्मीद के अनुरूप, भारत के कश्मीर की स्वायत्तता समाप्त होने के बाद पाकिस्तान आगबबूला हो रहा है.
भारत की घोषणा के दिन ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे 'अवैध' कार्रवाई बताते हुए ख़ारिज करने का बयान दिया.
बयान के अनुसार, "भारत अधिकृत जम्मू-कश्मीर (भारत प्रशासित कश्मीर) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है. भारत सरकार का एकतरफ़ा क़दम इस विवादित स्थिति को बदल नहीं सकता क्योंकि यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के प्रस्ताव में लिखा गया है."
तब से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान सैन्य और शीर्ष सरकारी अधिकारियों के साथ कई बैठकें कर रहे हैं.
देश की शक्तिशाली सेना ने छह अगस्त को एक बयान जारी कर कहा कि वह कश्मीर के लोगों के लिए अपने 'दायित्वों' को पूरा करने के लिए 'किसी भी हद तक' जाने के लिए तैयार हैं.
पाकिस्तान ने बुधवार को भारत के साथ अपने राजनयिक संबंध को कमतर कर दिया, द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया और भारतीय उच्चायुक्त अजय बिसारिया को इस्लामाबाद से निष्कासित कर दिया.
साथ ही इसने अपने राजदूत मोइनुल हक़ को भी भारत न भेजने का फ़ैसला किया है, जो अपनी नई राजनयिक भूमिका निभाने वाले थे.
पाकिस्तान के राजनयिक संबंध कम करने की घोषणा पर भारत ने गुरुवार को कहा कि "अनुच्छेद 370 से जुड़ा फ़ैसला पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है." इस दावे को पाकिस्तान ने ख़ारिज करते हुए कहा कि कश्मीर पर अंतिम निर्णय संयुक्त राष्ट्र को लेना है.
इस बीच, इस्लामाबाद भी इस मुद्दे पर भारत के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की क़वायद में लग गया है.
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र परिषद में इस क़दम को चुनौती देगा. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
उसी दिन, विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने भी सऊदी अरब में इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की बैठक में एक पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था.
इमरान ख़ान के लिए इसके क्या मायने हैं?
भारत के अचानक उठाए इस क़दम ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पर फ़ौरन जवाब देने का दबाव डाल दिया, जो शायद उनके एकवर्षीय कार्यकाल में सबसे बड़ी चुनौती बन गई.
ऐसा कर पाने में नाकाम रहने की स्थिति में पाकिस्तान में उनके नेतृत्व की छवि और भविष्य निश्चित ही प्रभावित होगी.
स्थानीय अख़बार डेली टाइम्स में एक पाकिस्तानी एंकर की टिप्पणी छपी है, "इतिहास इमरान ख़ान को कश्मीर थाल में सजाकर देने के लिए याद रखेगा."
यह वो समय है जब इमरान की सरकार के कूटनीतिक कौशल की परीक्षा होगी.
इमरान ने सऊदी अरब, ब्रिटेन, मलेशिया, तुर्की समेत कई देशों के नेताओं से इस मसले पर चर्चा की.
अब यह तो समय ही बताएगा कि भारत के ख़िलाफ़ कार्रवाई में वह अन्य देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को समझाने में कितना कामयाब रहता है.
क्या पाकिस्तान का प्लान काम करेगा?
भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव पर अपनी गंभीर चिताएं व्यक्त करते हुए अधिकांश अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं में दोनों परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों से संयम बरतने का आग्रह किया गया है.
इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं को स्थानीय मीडिया ने 'ठंडा', 'उदासीन', 'औपचारिक', 'नरम' और 'बेहद कमज़ोर' बताया.
उम्मीद की जा रही है कि बिना किसी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के यह आगे भी ऐसी ही बनी रहेगी.
डोनल्ड ट्रंप ने मध्यस्थता की पेशकश की. लेकिन हम निश्चिंत नहीं हो सकते कि वो अपने वादे पर खरे उतरेंगे. ख़ासकर तब जब अगर उन्हें अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने के अपने प्राथमिक लक्ष्य में कोई ख़तरा महसूस हुआ.
एक अन्य स्थानीय अख़बार द न्यूज़ लिखता है कि, "भूराजनीतिक वास्तविकताएं और बदले हुए, कठोर, नस्लवादी भारत ने कश्मीरियों के लिए अच्छा नहीं किया."
भारत अमरीका, ब्रिटेन और फ़्रांस जैसे देशों का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है. भारत की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उम्मीद नहीं है कि ये देश पाकिस्तान की तरफ़ खड़े हों जिससे नई दिल्ली अपना फ़ैसला बदलने के लिए बाध्य हो.
ऐसी स्थिति में लगता है कि पाकिस्तान को जो करना है वो अपने दम पर ही करना होगा.
द्विपक्षीय संबंधों को तोड़ने के मामले में अभी यह देखा जाना बाक़ी है कि इस्लामाबाद का यह फ़ैसला भारत या पाकिस्तान किसे ज़्यादा प्रभावित करता है.
इसके अलावा, बहुत कम उम्मीद है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर को लेकर नैतिकता का हवाला दे क्योंकि वो ख़ुद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में ऐसे शासन में लगा है जहां आए दिन मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठता रहता है.
तो अब क्या?
ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच तनाव हर बार नई ऊंचाइयों को छूता है, अब दोनों ही देशों में एक ही सवाल पूछे जा रहे हैं: क्या पाकिस्तान और भारत एक और युद्ध की तरफ़ बढ़ रहे हैं?
वैसे तो जवाब आम तौर पर न है, कम से कम पारंपरिक युद्ध तो नहीं होगा.
क्योंकि कोई भी पक्ष इससे होने वाले आर्थिक नुक़सान को नहीं झेल सकेगा.
जो उम्मीद की जा सकती है उसमें, सीमा पार से होने वाली घटनाएं बढ़ सकती हैं. अन्य संभावनाओं में गुप्त सैन्य अभियानों और प्रॉक्सी वॉर के बढ़ने की उम्मीद जताई जा सकती है.
कुछ का यह भी कहना है कि पाकिस्तान, अमरीका और अफ़ग़ान तालिबान चरमपंथी समूह के बीच चल रही शांति वार्ता से अपना प्रभाव कम कर लेगा.
डेली टाइम्स में लिखा गया, "पाकिस्तान को अफ़ग़ान समस्या में सहयोग और अपनी भूमिका को तब तक के लिए रोक देना चाहिए जब तक अमरीका और उसके नाटो सहयोगी संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को पालन करने के लिए भारत पर दबाव डालने में सकारात्मक भूमिका नहीं निभाते."
"चीन अगर सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे) को निर्बाध चलते रहने देना चाहता है तो पाकिस्तान के साथ इस मुद्दे पर उसे कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा."
यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत-अफ़ग़ानिस्तान व्यापार मार्ग और पाकिस्तान का हवाई मार्ग भारत के लिए बंद होना चाहिए.
लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है क्योंकि अमरीका और चीन जैसे बड़े देशों के समर्थन के बग़ैर पाकिस्तान के हित बौने साबित होंगे.
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, "पाकिस्तान के पास भारत से दो दो हाथ करने के बहुत कम विकल्प हैं. अधिक से अधिक वह राजनयिक चैनलों के माध्यम से दुनिया भर के देशों की राय एकजुट कर सकता है."
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