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लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद: पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के नए प्रमुख
लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद को पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई (इंटरसर्विसेज इंटेलिजेंस एजेंसी) का नया प्रमुख बनाया गया है.
पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग के अनुसार वो लेफ्टिनेंट जनरल आसिम मुनीर की जगह लेंगे. अक्तूबर 2018 में आसिम मुनीर को यह प्रभार दिया गया था और अब वो सैन्यदल कमांडर गुजरांवाला की जिम्मेदारी संभालेंगे.
फ़ैज़ हमीद को इस साल अप्रैल के महीने में प्रमोशन मिला था और वो लेफ्टिनेंट जनरल बनाए गए थे. आईएसआई के महानिदेशक बनाए जाने से पहले वो पाकिस्तानी सेना के जनरल हेडक्वार्टर (जीएचक्यू) में सहायक जनरल के पद पर कार्यरत थे.
बीबीसी उर्दू के संवाददाता फरहत जावेद के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल फैज़ हमीद बलूच रेजिमेंट से हैं. वो पहले रावलपिंडी के 10 सैन्यदलों के चीफ ऑफ स्टाफ रह चुके हैं. इसके अलावा वो आईएसआई के काउंटर इंटेलिजेंस विभाग के मुखिया भी रहे हैं.
2017 में आए चर्चा में
उनका नाम नवंबर 2017 में तब चर्चा में आया था जब इस्लामाबाद के फैज़ाबाद में धार्मिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक के सदस्य धरने पर बैठे थे और उन्होंने सरकार और पार्टी के बीच मध्यस्थता की थी.
यह समझा गया था कि तब मेजर जनरल के पद पर नियुक्त फ़ैज़ हमीद ने धरने पर बैठे धार्मिक संगठन और सरकार के बीच समझौता करने में मदद की थी.
इस विरोध-प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले में देश के गृहमंत्री को यह आदेश दिया गया था कि वो उन सैन्य अधिकारियों पर कार्रवाई करे जिन्होंने "नियमों का उल्लंघन करते हुए राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप किया था."
यह दिलचस्प है कि यह आदेश जस्टिस क़ाजी फ़ैज़ ईसा ने सुनाया था, जो फिलहाल सर्वोच्च न्यायिक परिषद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा दायर एक मामले का सामना कर रहे हैं.
इस साल पाकिस्तान दिवस के मौके पर लेफ्टिनेंट जनरल फ़ैज हमीद को देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान हिलाल-ए-इम्तियाज़ से नवाज़ा गया था.
उनके इस सम्मान के बाद सोशल मीडिया पर कई सवाल उठाए गए थे कि कथित तौर पर राजनीतिक मामलों में शामिल किसी व्यक्ति को यह सम्मान कैसे दिया जा सकता है.
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आईएसआई का मुखिया कितना ताकतवर होता है?
पर्यवेक्षकों के अनुसार आईएसआई राजनीतिक और सैन्य, दोनों मोर्चे पर काम करता है और खुफिया सूचनाएं जुटाता है.
आईएसआई प्रमुख रह चुके लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) जावेद अशरफ क़ाजी बताते हैं कि आईएसआई प्रमुख अपने संस्थान की हद तक बहुत ताक़तवर होते हैं.
"वो अपने संस्थान के अंदर लोगों को रख सकते हैं, निकाल सकते हैं, उन्हें वापस फ़ौज में भेज सकते हैं या फिर स्थानांतरण कर सकते हैं."
"लेकिन जहां तक संस्थान से बाहर की बात है तो आईएसआई प्रमुख की ताक़त का आधार उनके प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के साथ संबंधों पर है. प्रधानमंत्री उन्हें पद से हटा सकते हैं और उनके मातहत तमाम अधिकारी सेना प्रमुख की ओर से मिलते हैं और सेना के अंदर ताक़तवर तो सेना प्रमुख ही होता है."
लेफ़्टिनेंट जनरल जावेद अशरफ़ क़ाज़ी पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के दूसरे कार्यकाल में आईएसआई के प्रमुख थे.
उनका कहना है कि सीधे टकराव के बजाए बेनजीर भुट्टो आईएसआई के मुखिया के ज़रिए भी बात करती थीं. इस तरह आईएसआई प्रमुख सरकार और सेना के बीच अहम पुल का काम करता है.
आईएसआई के नए मुखिया बनाए जाने के अलावा सेना के कई अन्य बदलाव भी किए गए हैं. लेफ्टिनेंट जनरल शमशाद मिर्ज़ा को लेफ्टिनेंट जनरल फैज़ हमीद के स्थान पर सहायक जनरल के रूप में नियुक्त किया गया है.
इनके अलावा लेफ्टिनेंट जनरल आमिर अब्बासी को क्वार्टर मास्टर जनरल बनाया गया है, जबकि लेफ्टिनेंट जनरल मोअज़्ज़म एजाज को इंजीनियर इन चीफ़ नियुक्त किया गया है.
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क्या आईएसआई सरकार में भी दख़ल देती है?
इस सवाल का जवाब देते हुए पाकिस्तान के पूर्व सैन्य सचिव लेफ़्टिनेंट जनरल आसिफ़ यासीन ने कहा कि, "ख़ुफ़िया एजेंसियों का राजनीति में दख़ल तो दुनियाभर में होता है, कहीं कम तो कहीं ज़्यादा. लेकिन समय बीतने के साथ-साथ पाकिस्तान समेत दुनिया भर में राजनीति में सेना के किरदार में कमी आ रही है. जिसका कारण लोकतंत्र का मज़बूत होना है."
सेना में आमतौर पर ये माना जाता है कि डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ और डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस सेना प्रमुख के सबसे क़रीब होते हैं.
विश्लेषक यह भी कहते हैं कि प्रधानमंत्री सेना प्रमुख के क़रीबी अफ़सरों में से एक को आईएसआई के मुखिया पद पर तैनात करते हैं.
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