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जालियांवाला नरसंहार पर टेरीज़ा मे ने 'अफ़सोस' जताया, लेकिन माफ़ी नहीं मांगी
ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने 1919 में हुए जालियांवाला बाग़ नरसंहार के लिए संसद में 'अफ़सोस' जताया है. टेरीज़ा मे ने बुधवार को ब्रितानी संसद में कहा कि पंजाब के अमृतसर में हुआ जालियांवाला नरसंहार ब्रिटेन के इतिहास में एक 'शर्मनाक' दाग़ की तरह है.
मे ने ब्रितानी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ़ कॉमन्स' में प्रधानमंत्री के साप्ताहिक प्रश्नों के जवाब की शुरुआत करते हुए कहा, "1919 में हुई जालियांवाला बाग़ त्रासदी ब्रितानी-भारतीय इतिहास पर एक शर्मनाक धब्बा के समान है. जैसा कि महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने साल 1997 में जालियांवाला बाग़ के दौरे के पहले कहा था कि ये भारत के साथ हमारे अतीत का एक दर्दनाक उदाहरण है."
मे ने अपने बयान में कहा,"उस वक़्त जो कुछ भी हुआ और त्रासदी की वजह बना, हमें उसका बहुत पछतावा है. मुझे ये ऐलान करते हुए ख़ुशी है कि आज भारत और ब्रिटेन के रिश्ते आपसी सहयोग, सुरक्षा, समृद्धि और दोस्ती पर आधारित हैं."
टेरीज़ा मे के इस बयान के बाद विपक्षी लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन ने कहा कि इस नरसंहार में जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाईं वो जो कुछ हुआ उसके लिए स्पष्ट और बिना शर्त माफ़ी मांगे जाने के हक़दार हैं.
हालांकि मे ने इसके लिए औपचारिक तौर पर माफ़ी नहीं मांगी और बार-बार दुहराया कि ब्रितानी सरकार इस बारे में पहले ही 'खेद' जता चुकी है.
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ब्रितानी संसद में हुई थी माफ़ी की मांग
इससे एक दिन पहले संसद के वेस्टमिंस्टर हॉल में ब्रितानी सांसदों ने जालियांवाला बाग़ हत्याकांड के लिए औपचारिक माफ़ी के मुद्दे पर बहस की थी.
साल 2017 में भारत दौरे पर आए लंदन शहर के मेयर सादिक ख़ान ने कहा था कि ब्रितानी सरकार को जालियांवाला नरसंहार के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए.
भारतीय मूल के और लेबर पार्टी से ताल्लुक रखने वाले ब्रितानी सांसद वीरेंद्र शर्मा ने कहा था कि ये सही मौका है जब प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे को सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगनी चाहिए.
भारतीय मूल की ब्रितानी सांसद प्रीत कौर गिल ने कहा था, "चूंकि हम 1919 में हुए जालियांवाला बाग़ नरसंहार की 100वीं बरसी के करीब हैं, ये साफ़ है कि ब्रितानी सरकार को इसके लिए औपचारिक रूप से माफ़ी मांगने की ज़रूरत है. ब्रितानी सरकार को इस नरसंहार में अपनी भूमिका को स्वीकार करना चाहिए."
इस बहस की अध्यक्षता कंज़र्वेटिव पार्टी के सांसद बॉब ब्लैकमैन ने की और बहस के आख़िर में उन्होंने कहा कि ब्रितानी स्कूलों में बच्चों को जालियांवाला बाग़ त्रासदी के बारे में पढ़ाया जाए.
उनका कहना था कि लोगों को ये पता चलना चाहिए कि ब्रिटेन के नाम पर क्या-क्या हुआ है. ब्लैकमैन ने कहा कि इस नरसंहार के लिए माफ़ी मांगना ही सही फ़ैसला है.
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क्या हुआ था जालियांवाला बाग़ में?
पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन हज़ारों लोग अंग्रेज़ों के लाए 'रॉलेट ऐक्ट' के ख़िलाफ़ एक शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे जब अंग्रेज़ अधिकारी जनरल डायर ने अचानक वहां आकर बाग़ के दरवाज़ बंद करने और फिर अपनी टुकड़ी को गोलियां चलाने का आदेश दे दिया.
गोलियां लगातार 10 मिनट तक चलती रहीं जिसके बाद ये सिलसिता तब बंद हुआ जब गोलियां ख़त्म हो गईं.
ब्रितानी सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार इस अंधाधुंध गोलीबारी में कम से कम 379 लोग मारे गए जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे. हालांकि सूत्रों का कहना है कि इसमें तक़रीबन 1000 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं थीं.
इसके अलावा कम से कम 1200 लोग फ़ायरिंग में घायल हुए थे. आगामी 13 अप्रैल को इस नृशंस हत्याकांड के 100वीं बरसी होगी.
इस नरसंहार में मारे जाने वालों में वो लोग भी थे जो बाग़ में सिर्फ़ बैसाखी का जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे.
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'खेद' ज़ाहिर करने का सिलसिला
- ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और कूटनीतिज्ञ विंस्टन चर्चिल ने हत्याकांड के एक साल बाद 1920 में इसे 'राक्षसी' बताया था.
- ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने 1997 में जालियांवाला बाग़ के दौरे के पहले कहा था कि ये भारत के साथ हमारे अतीत का एक दर्दनाक उदाहरण है.
- साल 2013 में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने भारत दौरे पर जालियांवाला बाग़ जाकर वहां जान गंवाने वालों को श्रद्धांजलि दी थी. कैमरन पद पर रहते हुए ऐसा करने वाले पहले प्रधानमंत्री थे.
हालांकि उन्होंने इसके लिए औपचारिक तौर पर माफ़ी नहीं मांगी थी और यह कहकर अपना बचाव किया था कि ब्रितानी सरकार ने उस वक़्त इस घटना की 'उचित ढंग से निंदा' की थी.
कैमरन ने कहा था, "मुझे नहीं लगता कि हमें अतीत के कोनों को खंगालकर उन चीज़ों को ढूंढना चाहिए जिसके लिए हमें माफ़ी मांगनी हो. मुझे लगता है कि जो कुछ हुआ उसे स्वीकार करना, समझना और सम्मान ज़ाहिर करना सही तरीका है."
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