पाकिस्तान: बालाकोट हमले के बाद मदरसे का पहला आंखों देखा हाल

पाकिस्तान की सेना ने बुधवार को अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के कुछ पत्रकारों को बालाकोट में उस जगह का दौरा करवाया जहाँ भारत ने 26 फ़रवरी को हवाई हमला करने का दावा किया था.

बीबीसी संवाददाता उस्मान ज़ाहिद भी पत्रकारों के इस दल में मौजूद थे.

इस हमले को लेकर काफ़ी विवाद रहा है. भारत दावा करता रहा है कि उसने 26 फ़रवरी को तड़के हमला कर पाकिस्तान के ख़ैबर-पख़्तूनख्वा में बालाकोट नाम की जगह पर चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के ठिकाने को तबाह कर दिया था.

मगर पाकिस्तान का कहना था कि इस हवाई हमले में किसी की जान नहीं गई और जिस परिसर पर हमला करने का दावा भारत कर रहा है, वह मदरसा है और उसे कोई नुक़सान नहीं पहुंचा है. पाकिस्तान का कहना था कि भारतीय वायुसेना के हमलों में सिर्फ़ पेड़ गिरे हैं और एक जगह पर घर के क़रीब बम गिरने से एक व्यक्ति घायल हुआ है.

पाकिस्तान सरकार ने तब बीबीसी समेत पूरे मीडिया को आश्वस्त किया था कि अगले ही दिन उन्हें घटनास्थल पर ले जाया जाएगा. मगर बाद में सरकार अपने वादे से पीछे हट गई थी.

10 अप्रैल, 2019 को यानी हमले के 43 दिन बाद पाकिस्तान सरकार ने इस्लामाबाद में मौजूद विदेशी मीडिया और कुछ विदेशी राजनयिकों को घटनास्थल का दौरा करवाया.

हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए बीबीसी को बताया, "आधिकारिक प्रवक्ता ने नौ मार्च को ही कह दिया था कि 26 फ़रवरी को की गई असैन्य आतंकवाद विरोधी स्ट्राइक अपने लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रही थी. यह कार्रवाई सीमा पार आतंकवाद के ख़िलाफ निर्णायक क़दम उठाने के लिए हमारे संकल्प को दर्शाती है."

वैसे विदेश मंत्रालय के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि घटना के डेढ़ महीने बाद ख़ुद मीडिया को घटनास्थल पर ले जाने से ही समझा जा सकता है कि सच क्या है.

पढ़िए बीबीसी संवाददाता उस्मान ज़ाहिद ने वहाँ क्या देखा?

पाकिस्तान की सेना के माध्यम से विदेशी मीडिया के लोग इस्लामाबाद आए हुए थे. उन्हें उस जगह का दौरा करवाया गया जहां पर भारतीय वायुसेना ने एयरस्ट्राइक का दावा किया था.

इसके साथ ही उस मदरसे का भी दौरा करवाया गया जिसके बारे में भारतीय मीडिया ने कहा था कि जिसे तबाह कर दिया गया.

इस्लामाबाद से हमने हेलिकॉप्टर से उड़ान भरी और मानसेरा से थोड़ा आगे एक कॉलेज है, वहां पर लैंड किया. हेलिकॉप्टर से जाने के बाद डेढ़ घंटे कठिन रास्ते से मुश्किल पहाड़ी रास्ते से सफ़र करना पड़ा.

जब हम मदरसे की ओर जा रहे थे तो बीच में हमें तीन अलग-अलग जगहों पर ले जाया गया जहां सिवाये गड्ढों के कुछ नहीं था. यहां पेड़ टूटे हुए थे. हमें बताया कि इंडियन एयरफोर्स ने यहां पर पेलोड गिराए थे.

ये गड्ढे आबादी से काफ़ी दूर थे. इस इलाके में घर काफ़ी दूर-दूर हैं, आबादी काफ़ी बिखरी हुई है. एक गड्ढा एक कच्चे से घर के बाहर था. हमें बताया गया कि एक आदमी यहां ज़ख़्मी हुआ है. बाक़ी जगहें घाटी में पेड़ों के बीच थीं जहां पर गिरे हुए पेड़ अब भी वहीं मौजूद हैं.

फिर हमें ऊपर पहाड़ी की चोटी पर मौजूद मदरसे पर ले जाया गया. यहां पर किसी भी मीडिया को पहली बार लाया गया.

हमने जो बिल्डिंग देखी वो शिक्षण संस्थानों जैसी थी. जैसे कि छत पर चादरें वगैरह डाली जाती हैं, उसी तरह की बिल्डिंग है.

उसमें किसी तरह के ऐसे निशान नहीं मिले कि इन्हें नया बनाया गया है या यहां कोई नुक़सान हुआ है या कोई अटैक हुआ है.

पूरी इमारत अपनी हालत में खड़ी थी. हमने अलग-अलग जगह जाकर देखा. सारा स्ट्रक्चर पुराना है. कुछ हिस्से तो काफ़ी पुराने लग रहे थे. सामने ठीकठाक आकार का प्लेग्राउंड है जिसके साथ मस्जिद का हॉल है. यहां 150-200 के क़रीब बच्चे पढ़ रहे थे.

नहीं मिले कुछ सवालों के जवाब

जब हमने अधिकारियों से पूछा कि यह दौरा इतनी देरी से क्यों करवाया जा रहा है तो उन्होंने कहा कि हालात इतने अस्थिर थे कि लोगों को यहां लाना बहुत मुश्किल था.

अधिकारियों ने कहा कि अब जाकर उन्हें लगा कि यह मीडिया को यहां लाने का उपयुक्त समय है.

हालांकि, जब यह कहा गया कि यह बात सभी को मालूम है कि इससे पहले प्रशासन ने स्थानीय पत्रकारों और समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक टीम को मौक़े पर जाने से रोक दिया था इस बात से इनकार कर दिया गया.

जब पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग में प्रवक्ता आसिफ़ गफ़ूर से पूछा गया कि कुछ समय पहले मदरसे के बोर्ड पर पत्रकारों ने मौलाना यूसुफ़ अज़हर का नाम देखा था, ऐसे में इसे कौन चला रहा है. उन्होंने इसका सीधा जवाब नहीं दिया और कहा कि हम मदरसों की फ़ंडिंग और उसके कोर्स पर ध्यान देने की कोशिश कर रहे हैं.

मदरसे के अंदर एक बोर्ड पर लिखा था कि मदरसा 27 फ़रवरी से लेकर 14 मार्च तक बंद था.

जब मैंने एक अध्यापक और एक छात्र से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि हमले के बाद आपातकालीन क़दम उठाते हुए इसे बंद किया गया था और यह अब भी बंद है.

फिर उनसे पूछा कि अगर ऐसा है तो इतने सारे छात्र यहां पर क्यो हैं? इस पर उन्होंने कहा कि मदरसे में तो छुट्टियां हैं, यहां जो छात्र मौजूद हैं वो स्थानीय हैं.

हमें वहां पर कुछ लोगों से बातचीत करने की इजाज़त दी गई थी मगर जब हमने ऐसा करने की कोशिश की तो कहा गया- जल्दी करो और बहुत देर तक बात मत करो.

यह काफ़ी स्पष्ट था कि हमारे पर बंदिशें डाली जा रही थीं और हमें सभी से बात नहीं करने दी जा रही थी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)