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संयुक्त अरब अमीरात के लिए भारत इतना ख़ास क्यों है
- Author, टीम बीबीसी हिंदी
- पदनाम, नई दिल्ली
अबू धाबी में हिन्दी भाषा अदालतों में इस्तेमाल होने वाली तीसरी आधिकारिक भाषा बन गई है.
इससे पहले अरबी और अंग्रेज़ी थीं लेकिन अब इसमें हिन्दी भी जुड़ गई है. ऐसा न्याय को पाने में किसी भी तरह की कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़े इसलिए किया गया है.
अबू धाबी न्यायिक विभाग का कहना है कि हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने से लेबर मुक़दमों में न्याय सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी.
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में हिन्दी भाषियों की बढ़ती तादाद के कारण यह फ़ैसला लिया गया है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ यूएई की कुल आबादी 90 लाख है और इसमें दो तिहाई प्रवासी हैं. इन प्रवासियों में 26 लाख भारतीय हैं. यह कुल आबादी का 30 फ़ीसदी है और यह प्रवासियों का सबसे बड़ा हिस्सा है.
अबू धाबी न्यायिक विभाग के अवर सचिव योसेफ़ सईद अल अब्री ने कहा है कि ऐसा न्यायिक विभाग में पारदर्शिता के लिए किया गया है. अल अब्री ने ख़लीज टाइम्स से कहा, ''हिन्दी को अदालती भाषा के तौर पर इसलिए जोड़ा गया है क्योंकि लोगों को न्याय प्रक्रिया में किसी भी तरह की जटिलता का सामना नहीं करना पड़े.''
संयुक्त अरब अमीरात में भारतीयों का प्रभाव कितना है इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत की प्रमुख पार्टियों के नेता इनसे मिलने जाते हैं और अपना चुनावी एजेंडा बताते हैं.
अभी हाल ही में कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी यूएई में थे और उन्होंने भारतीयों को संबोधित किया था. नरेंद्र मोदी पीएम बनने से पहले और पीएम बनने के बाद भी ऐसा कर चुके हैं.
पिछले महीने ही केंद्रीय वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने घोषणा की थी कि यूएई और सऊदी अरब ने खाद्य सुरक्षा को देखते हुए भारत में अपने लिए फसल उगाने का फ़ैसला किया है.
सुरेश प्रभु ने कहा था कि यह स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन की तरह होगा लेकिन यूएई के मार्केट को ध्यान में रखते हुए फसल उगाई जाएगी. दोनों देश खाद्य सामग्री के लिए विदेशों पर निर्भर हैं. भारत दोनों देशों से अपनी ऊर्जा ज़रूरतें पूरी करता है.
सुरेश प्रभु ने दोनों देशों के प्रतिनिधियों से बातचीत के बाद कहा था, ''हमलोग निर्यात के लिए तैयार हैं. यूएई फूड प्रोसेसिंग और ऑर्गेनिक खेती में निवेश के लिए दिलचस्पी दिखा रहा है. इससे हमारे किसानों को भी फ़ायदा होगा.'' संयुक्त अरब अमीरात भारत की अर्थव्यवस्था के लिए काफ़ी अहम देश है.
भारत दुनिया के उन देशों में शीर्ष पर है जहां के विदेश में रहने वाले नागरिक अपने देश में सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा भेजते हैं.
विश्व बैंक के अनुसार दुनिया भर के भारतीय प्रवासी जितनी विदेशी मुद्रा अपने देश में भेजते हैं, उतनी किसी भी देश के प्रवासी नहीं भेजते हैं.
2017 में भारतवंशियों ने 69 अरब डॉलर भेजे जो पाकिस्तान की अभी की कुल विदेशी मुद्रा भंडार से सात गुना से भी ज़्यादा है. इसके साथ ही यह भारत के 2018-19 के रक्षा बजट से डेढ़ गुना ज़्यादा है.
1991 की तुलना में भारतीय प्रवासियों से देश में आने वाली विदेशी मुद्रा में 22 गुना बढ़ोतरी हुई है. 1991 में यह राशि महज़ तीन अरब डॉलर थी.
हालांकि पिछले 6 सालों में भारत की जीडीपी में इस राशि के हिस्से में 1.2 फ़ीसदी की गिरावट आई है. पहले यह हिस्सा 2.8 फ़ीसदी था. विश्व बैंक की हालिया माइग्रेशन रिपोर्ट के अनुसार भारत के बाद इस मामले में चीन, फ़िलीपींस, मेक्सिको, नाइजीरिया और मिस्र हैं.
संयुक्त अरब अमीरात में सबसे ज़्यादा केरल के लोग हैं. इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतवंशियों की तरफ़ से देश में भेजे जाने वाली कुल विदेशी मुद्रा में केरल का सबसे बड़ा योगदान होता है.
इसमें केरल का 40 फ़ीसदी हिस्सा होता है, जबकि पंजाब 12.7 फ़ीसदी के साथ दूसरे नंबर पर, तमिलनाडु (12.4 फ़ीसदी) तीसरे नंबर पर, आंध्र प्रदेश (7.7 फ़ीसदी) चौथे नंबर पर और 5.4 फ़ीसदी के साथ उत्तर प्रदेश चौथे नंबर पर है.
केरल की कुल तीन करोड़ आबादी है और इसके 10 फ़ीसदी लोग अपने प्रदेश में नहीं रहते हैं. सेंटर फ़ॉर डिवेलपमेंट स्टडीज का कहना है कि केरल से खाड़ी के देशों में पलायन कोई नया नहीं है.
सीडीएस के अनुसार, ''केरल भारत का एकलौता राज्य है जहां से खाड़ी के देशों में पिछले 50 सालों से पलायन जारी है. केरल के लोगों का खाड़ी के देशों में एक मजबूत नेटवर्क है. यहां हर किसी का कोई न कोई चाचा या मामा रहता ही है.''
केरल में शहरीकरण की जो तेज़ रफ़्तार है उसके पीछे केरल के उन लोगों की कड़ी मेहनत है जो परिवार से दूर खाड़ी के देशों में रहकर अपने देश में पैसे भेजते हैं.
सीडीएस का कहना है कि केरल में 2001 से 2011 के बीच 360 नए शहर बने हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय के 2015 के आंकड़ों के अनुसार इस साल 7 लाख 81 हज़ार लोग काम के लिए विदेश गए, जिनमें से 96 फ़ीसदी लोग सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत, क़तर और ओमान गए.
यूएई दुनिया का दूसरा देश है जहां भारत का सबसे ज़्यादा निर्यात है. 2017 में जब यूएई के क्राउन प्रिंस भारत के 68वें गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनकर आए थे तो दोनों देशों ने अगले पांच सालों में द्विपक्षीय व्यापार में 60 फ़ीसदी बढ़ोतरी करने का फ़ैसला किया था.
गल्फ़ न्यूज़ के अनुसार भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच हर हफ़्ते 1,076 फ़्लाइट्स की आवाजाही है. दोनों देशों के बीच पर्यटन भी लगातार बढ़ रहा है.
यूएई ने भारतीयों के लिए वीज़ा के नियमों में भी कई तरह की छूट दे रखी है. भारत ने भी 2015 से यूएई के नागरिकों के लिए ई-वीज़ा की व्यवस्था की है.
दुबई को कुछ लोग भारत हॉन्ग कॉन्ग भी कहते हैं. दुबई भारत के लिए ट्रेड, ट्रैवेल और लॉजिस्टिक का हब है. दुबई का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा सबसे महत्वपूर्ण एयर हब है.
हर साल लाखों लोग यहां से आवाजाही करते हैं. हाल के आंकड़ों के मुताबिक़ दुबई जाने वाले पर्यटकों में सबसे ज़्यादा भारतीय हैं. दुबई स्थित कंपनी डीपी वर्ल्ड और एमार का भारत में बड़ा निवेश है तो दूसरी तरफ़ भारतीय कंपनियों ने भी दुबई को अपना केंद्र बना रखा है.
संयुक्त अरब अमीरात के विकास में भारतीय प्रवासियों की अहम भूमिका रही है. यहां कंस्ट्रक्शन वर्कर से लेकर सर्विस स्टाफ़ और टेक्नोक्रेट्स सबसे ज़्यादा भारतीय हैं.
2014 में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद यूएई और सऊदी से संबंधों में और गर्माहट आई है. मोदी भारत के एकलौते नेता हैं जिन्हें सऊदी ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया है.
संयुक्त अरब अमीरात के विदेशी व्यापार और उद्योग के अवर सचिव अब्दुल्ला अल सालेह ने पिछले साल अगस्त में कहा था, ''भारत और यूएई के बीच 2020 में व्यापार 100 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. 2017 में भारत और यूएई के बीच 53 अरब डॉलर का व्यापार था जिनमें से 35 अरब डॉलर का कारोबार ग़ैर-पेट्रोलियम का था.''
चीन और अमरीका के बाद भारत यूएई का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है.
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