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पाकिस्तान के मीडिया से पश्तून आंदोलन ग़ायब, कश्मीर पर हो रही बात
पाकिस्तान में कुछ प्रदर्शन अख़बारों की सुर्खियों में जगह पाते हैं और कुछ नहीं, ऐसा क्यों होता है?
बीबीसी संवाददाता एम इलियास ख़ान ने मानवाधिकारों के हनन से जुड़ी एक कहानी की पड़ताल की, जिसे मीडिया बताना नहीं चाहता और अधिकारी उस पर कुछ भी कहने से बच रहे हैं.
पाकिस्तान का मीडिया अब सरकारी नीतियों के मौलिक विरोधाभास को रिपोर्ट करने के लिए संघर्ष कर रहा है.
इस बार इस्लामाबाद के राष्ट्रीय प्रेस क्लब के बाहर यह ज़्यादा देखने को मिला. यहां सैकड़ों की संख्या में प्रतिबंधित चरमपंथी समूह से जुड़े धार्मिक मदरसों के छात्र प्रदर्शन कर रहे थे.
क्लब के बाहर एक बड़ा सा मैदान है, जहां अक्सर प्रदर्शनकारी जुटते हैं और अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं.
छात्र यहां कश्मीर दिवस के मौके पर इकट्ठा हुए थे. भारत प्रशासित कश्मीर में सैन्य बलों द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के हनन को चिह्नित करने के लिए हर साल पाकिस्तान में कश्मीर दिवस मनाया जाता है. इस दिन यहां सरकारी छुट्टी होती है.
लेकिन कश्मीर रैली के दौरान पाकिस्तान की पुलिस उन युवाओं को चिह्नित और गिरफ़्तार करने में व्यस्त थी, जो उसी जगह पर आयोजित होने वाली दूसरी रैलियों के लिए आए थे.
इन युवाओं का संबंध किसी चरमपंथी संगठन से नहीं था. ये दक्षिणपंथी अभियान से जुड़े थे, जो अफ़ग़ानिस्तान सीमा से सटे पश्तून इलाक़ों में पाकिस्तान सेना द्वारा किए जा रहे मानवाधिकारों के हनन के ख़िलाफ़ हल्ला बोलने आए थे.
बीते मंगलवार की शाम तक पुलिस ने पश्तून तहफ़्फ़ुज़ आंदोलन से जुड़े 30 से ज़्यादा कार्यकर्ताओं गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें एक ट्रक में भर कर थाने ले गई.
वहां मौजूद मीडिया ने हर एक गिरफ़्तारी को अपने कैमरे में क़ैद किया लेकिन ये तस्वीरें न तो टीवी पर ब्रेक हुईं और न ही अगले दिन अख़बारों की सुर्खियां बनीं.
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ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई
पाकिस्तान के छह क़बायली ज़िले अब अफ़ग़ानिस्तान से भागे तालिबानी लड़ाकों का आसरा गृह बन गए हैं. ये लड़ाके 9/11 के हमले के बाद अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीकी आक्रमण के बाद वहां से भागे थे.
कई लोगों का कहना है कि इन ज़िलों के तालिबानीकरण की अनुमति पाकिस्तान सरकार की एक नीति के तहत दी गई थी, जिससे अफ़ग़ानिस्तान को भारत का मज़बूत सहयोगी बनने से रोका जाए.
बाद में तालिबान की गुटबंदी ने पाकिस्तानी सेना को क़बायली प्रतिद्वंदियों में बदल दिया, जिसके बाद सेना और उनके बीच संघर्ष की स्थिति बन गई.
इनके बीच हुए संघर्षों में मानवाधिकारों के उल्लंघन के कई मामले सामने आए. हज़ारों नागरिक मारे गए. 30 लाख से ज़्यादा लोग एक से ज़्यादा बार विस्थापित होने को मजबूर हुए.
यह कई सालों तक चलता रहा. पिछले साल पश्तून तहफ़्फ़ुज़ आंदोलन ने ऐसे मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों को सूचीबद्ध किया, जिसे सेना और तालिबान ने अंज़ाम दिया था.
ऐसे मामलों को मीडिया में कवरेज भी मिला, लेकिन पिछले साल जून के बाद मीडिया पर कथित रूप से सेना ने दबाव डालना शुरू किया और पश्तून तहफ़्फ़ुज़ आंदोलन को कवरेज देने से मना किया जाने लगा.
धीरे-धीरे मामलों के विश्लेषण और कवरेज मीडिया से गायब होने लगे, न सिर्फ छोटे अख़बार या टीवी से बल्कि बड़े मीडियाघरानों ने भी इस पर चुप्पी साध ली.
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कई कहते हैं पश्तून तहफ़्फ़ुज़ आंदोलन मीडिया स्क्रीन से पूरी तरह ग़ायब हो गया है.
सरकार यहीं नहीं रुकी, वो आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर भी कार्रवाई करने लगी. उन्हें गिरफ़्तार किया जाने लगा और वो इस बात से आश्वस्त हैं कि इसका कोई भी कवरेज मीडिया में नहीं आएगा.
बीते सप्ताह बलूचिस्तान में पश्तून आंदोलन पर कार्रवाई के दौरान एक बड़े कार्यकर्ता की मौत हो गई थी.
इसी के ख़िलाफ़ मंगलवार को प्रेस क्लब के बाहर पश्तून तहफ़्फ़ुज आंदोलन के मुखिया मंज़ूर पस्तीन ने विरोध प्रदर्शन किया था.
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