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चुनाव के अलावा बलूचिस्तान के और भी ग़म हैं
- Author, रियाज़ सोहेल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, मस्तूंग
पाकिस्तान के सूबे बलूचिस्तान का इलाक़ा क़लात, सेब के लिए मशहूर है. यहां के बाग़ों में ये सेब अगले 20 दिनों में तैयार हो जाएंगे, लेकिन पानी की कमी ने सेबों की बढ़ोत्तरी को प्रभावित किया है.
बिजली की भारी क़िल्लत की वजह से जनरेटर चंद घंटे ही चल पाए हैं और नतीजे में सेबों का साइज़ कम हो गया है, इस सूरतेहाल ने बाग़ के मालिक मोहम्मद इक़बाल को परेशान कर रखा है.
राजनीतिक गहमा गहमी से दूर इस इलाक़े में वो अपने सेबों के लिए ज़्यादा फ़िक्रमंद हैं. उन्हें इस बात की परेशानी नहीं है कि किसको वोट दें. इस रवैये की एक वजह शायद उम्मीदवारों का यहां न आना भी है.
मोहम्मद इक़बाल का कहना है कि ये उम्मीदवार जो बड़े लोग हैं, उन्हीं के पास जाते हैं. जो ग़रीब हैं, उसको ऐसे ही मैदान में छोड़ देते हैं.
क़ौमी असेंबली का ये निर्वाचन क्षेत्र-267 तक़रीबन 500 किलोमीटर में फैला हुआ है. इसके एक तरफ़ ज़िला क्वेटा तो दूसरी तरफ़ ये ख़िज़दार ज़िला से मिला हुआ है. इसमें मस्तूंग, क़लात और सिकंदराबाद जैसे ज़िले शामिल हैं. जिसने इसे रक़बे के ऐतबार से पाकिस्तान का सबसे बड़ा क्षेत्र बना रखा है.
क़लात से तक़रीबन 120 किलोमीटर दूर मस्तूंग के एक क़स्बे में बलूचिस्तान नेशनल पार्टी के क़ौमी असेंबली के उम्मीदवार मंज़ूर बलोच अपनी मुहिम में व्यस्त हैं. मुल्क के दूसरे इलाक़ों के विपरीत इन्हें कम वक़्त और कम खर्चों में पांच सौ किलोमीटर अपनी मुहिम चलानी है क्योंकि ख़र्च की तय सीमा सिर्फ़ 40 लाख रूपये है.
उनका कहना है कि उनकी कोशिश है कि चुनाव आयोग के जो आचार संहिता है उसकी पैरवी करें, लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि इन तीन ज़िलों में अगर चुनाव आयोग के ज़रिए तय रक़म से तीन गुना ज़्यादा खर्च करें तो भी वोटर तक नहीं पहुंच सकते.
इसीलिए बलूचिस्तान में वोटों का टर्न आउट कम होता है, क्योंकि लोग खुद नहीं आते, इसके लिए उम्मीदवार को जाना पड़ता है. ऐसे में यहां के उम्मीदवार के लिए ज़्यादा चैलेंज है.
बलूचिस्तान में बिजली की आपूर्ति बड़े शहरों तक महदूद है, जिसकी वजह से टीवी चैनल और अख़बारों समेत मीडिया के स्त्रोत भी सीमित हैं. साक्षरता दर भी दूसरे सूबों के मुक़ाबले यहां कम है. इसकी एक बड़ी वजह शैक्षणिक संस्थानों की कमी है.
बलूचिस्तान की पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह इसका व्यापक रक़बा भी है. जीतने वाले उम्मीदवारों के फंड्स और विकास परियोजनाएं ख़ास इलाक़ों तक महदूद रहते हैं, जिसकी वजह से एक आबादी विकास से महरूम रह जाती है.
नेशनल पार्टी के उम्मीदवार सरदार कमाल बनगलज़ई क़ौमी असेंबली के मेम्बर रह चुके हैं. इस बार वो सूबाई असेंबली के उम्मीदवार हैं. उनका कहना है कि पिछले चुनाव में वो सूराब नहीं जा सके थे, सिर्फ़ टेलीफोन पर ही राब्ता रहा.
ऐसा भी होता है कि जब हम लोगों के पास वोट के लिए जाते हैं तो वो कहते हैं कि आप पांच साल कहां थे? अब सोचने की बात ये हैं कि ये जितना बड़ा इलाक़ा है, उतना फंड नहीं है. तो ऐसे में कोई काम कैसे करे. लोगों को स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र और अन्य सुविधाएं कहां से उपलब्ध कराए.
सरदार कमाल बनगलज़ई का कहना है कि जितने भी ज़िले हैं, हर ज़िले में क़ौमी असेंबली की एक सीट हो तब जाकर कुछ न कुछ कर पाएंगे.
बलूचिस्तान के इतने बड़े क्षेत्र में चुनाव आयोग की तरफ़ से तय की गई चुनावी खर्च की सीमा काल्पनिक सी लगती है, लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि एक आम शहरी या मध्य वर्ग को चुनावी प्रक्रिया में शरीक रखने के लिए सीमाएं तय करना भी लाज़िमी है.
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