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'जेल से छूटा पर मां के मुंह से बेटा नहीं सुन पाया'
मोहम्मद आमिर ख़ान को 1998 में दिल्ली पुलिस ने सीरियल बम ब्लास्ट मामलों में अभियुक्त बनाया था. 2012 में कोर्ट ने उन्हें सभी मामलों से बरी कर दिया. उसके 4 साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश पर दिल्ली पुलिस को उन्हें 5 लाख का मुआवज़ा देना पड़ा.
बीबीसी संवाददाता सर्वप्रिया सांगवान से बातचीत में आमिर ने बताया कि उन्हें क्या-क्या झेलना पड़ा.
पढ़िए आमिर की ज़ुबानी
मैं फरवरी 1998 की वो रात नहीं भूल सकता जिसने मेरी और मेरे परिवार की ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी.
मेरे घर के पास ही एक सुनसान रोड पर एक जिप्सी रुकी और कुछ लोग मेरे हाथ-पैर बांध कर, आंखों पर पट्टी बांध कर गाड़ी में डाल कर ले गए.
सब लोग सिविल ड्रेस में थे. मुझे लगा कि मुझे अगवा किया गया है.
मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि ये पुलिस वाले हो सकते हैं. मुझे एक कमरे में ले जाकर खड़ा कर दिया, मेरे सारे कपड़े उतार दिए गए और टॉर्चर का सिलसिला शुरू हुआ.
7 दिन तक मुझे गैर-क़ानूनी तरीके से हिरासत में रखा. उसके बाद मेरे पास 100-150 पेपर लेकर आए और ज़बरन दस्तख़्त कराने की कोशिश की.
इतने दिन के टॉर्चर के बाद भी मैंने विरोध किया. लेकिन नतीजा ये हुआ कि मेरे हाथ-पैर के नाखून तक निकाल लिए गए और मजबूरन मुझे साइन करना पड़ा.
1996-97 में दिल्ली-एनसीआर में जो ब्लास्ट हुए थे, उन सबमें मुझे दोषी बनाया गया था. तब मैं सिर्फ़ 18 साल का था.
ये गिरफ़्तारी नहीं, अपहरण था
मैं कभी नहीं कहता कि मेरी गिरफ़्तारी हुई थी. गिरफ़्तारी उसको कहते हैं जब क़ानून के तहत किसी को पकड़ा जाए, किसी राह चलते को उठा लेना गिरफ्तारी नहीं होती.
इस 'अपहरण' से पहले मैं पुरानी दिल्ली के एक हंसते-खेलते परिवार का लड़का था. पायलट बनने के ख़्वाब देखता था.
14 साल जेल काटने के बाद घर लौटा तो पिता जी नहीं थे. इस दौरान उनकी मौत हो गई थी. उनको आखिरी बार देखने के लिए पेरोल या ज़मानत तक नहीं मिली थी.
कब्रिस्तान जाता हूं तो मुझे ये भी नहीं पता कि उनको दफ़नाया कहां गया है. बस एक कोने में खड़ा होकर उनके लिए दुआ मांगता हूं.
मेरी मां पेरालिसिस का शिकार हो चुकी थी. इस हालत में थीं कि मुझे देखकर 'बेटा' तक नहीं बोल पाईं.
परिवार को सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ा. आखिर एक 'देशद्रोही' के परिवार से कौन संबंध रखना चाहेगा. कोई भी ऐसे घर जाने से बचेगा जिससे उसे थाने का दरवाज़ा देखना पड़े.
मेरी उम्र से ज़्यादा मुझ पर मुकदमे थे
मलाल रहेगा कि मां के मुंह से बेटा नहीं सुन पाया. उनके साथ बैठकर उनके हाथ का खाना नहीं खा पाया.
जेल से बाहर आकर कई रातों तक छत पर जाता रहा क्योंकि मैं ऐसी दुनिया से लौटा था जहां चांद-सितारे देखने को नहीं मिलते थे. कई रातों तक उन्हें देखकर ये महसूस करने की कोशिश की कि हां अब मैं आज़ाद हूं.
बाहर निकला तो ज़िंदगी एक ख़ाली मैदान की तरह थी. कोई सहारा नहीं था किसी तरह का. मेरे ऊपर ज़िम्मेदारियां बहुत थीं. कर्ज़ भी था. मां का इलाज भी करवाना था.
अक्सर ये देखा गया है कि जब कोई आतंकवाद के मुकदमे में गिरफ्तार होता है तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई दिन तक वो सुर्खियों में रहता है. उसके परिवार को भी इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ता है.
जितनी मेरी उम्र थी, उससे ज़्यादा मुझ पर मुकदमे दायर किए गए थे. मुझे पता नहीं था कि कब बाहर निकल सकूंगा लेकिन उम्मीद थी कि एक दिन निर्दोष साबित हो जाउंगा.
मेरी जब रिहाई हुई तो मीडिया के माध्यम से ही सिविल सोसाइटी को मेरे बारे में पता चला और उन्होंने मेरी मदद की.
लेकिन जो मदद मेरे या मेरे जैसे निर्दोष लोगों की सरकार को करनी चाहिए थी मुआवज़े और पुनर्वास को लेकर, वो नहीं होती है. लेकिन इस कमी को किसी तरह सिविल सोसाइटी ने भरा. आज एक गैर-सरकारी संस्थान में मैं काम कर रहा हूं.
निर्दोष के लिए क्या करती है सरकार?
लेकिन मैं एक सवाल उठाना चाहता हूं. देश में एक नीति है चरमपंथियों के आत्मसमर्पण के लिए.
अगर वो आत्मसमर्पण करते हैं तो उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सरकार उनकी मदद करती है . ये अच्छी नीति है, मैं इसका पक्षधर हूं.
लेकिन जिन भारतीय नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से उठाया जाता है, फर्ज़ी केस बनाए जाते हैं उनके खिलाफ़ और जो लंबे वक्त तक बेवजह जेल की चारदीवारी भोगते हैं, उनकी ज़िंदगी दोबारा शुरू करवाने के लिए क्या करती है सरकार? ऐसे निर्दोष लोगों के लिए तो कोई कानून या नीति नहीं है.
जेल में जाने के बाद मेरे पास दो ही रास्ते थे. एक तो ये कि मैं ये सब देखकर रोऊं या दूसरा ये कि इन कठिन हालातों से निकलने के लिए आगे बढूं. मैंने दूसरा रास्ता चुना. मेरे मां-बाप मेरे साथ थे. मेरी बेगुनाही मुझे पता थी. मैं खुद को 5 साल का मानता हूं क्योंकि रिहा हुए 5 साल हुए हैं. इतने वक्त में दुनिया की तकनीक भी बदल गई है. मोबाइल फ़ोन आ गए, इंटरनेट आ गया, मेट्रो आ गई.
हमारे भारत का कानून और संविधान बहुत अच्छा है. कमी है उसको ठीक से लागू करने में. छोटे कीट-पतंगे मकड़ी के जाल में फंस जाते हैं लेकिन बड़ी मक्खियां जाल तोड़ कर निकल जाती हैं. हमारे कानूनी सिस्टम में गरीब, असहाय, अशिक्षित लोग फंस जाते हैं लेकिन पैसे और प्रभाव वाले निकल जाते हैं.
नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन का शुक्रिया करना चाहूंगा कि उनके इस कदम से मुझे मुआवज़ा मिलना संभव हो पाया. 5 लाख, 50 लाख या 5 करोड़, इन 14 साल की भरपाई नहीं कर सकते हैं लेकिन ज़ख्मों पर मरहम का काम कर सकते हैं.
ये तो पहला कदम है और मेरे जैसे दूसरे आमिर भी हैं जिनके ज़ख्मों को मरहम की ज़रूरत है. उन्हें दोबारा ज़िंदगी दिए जाने की ज़रूरत है.
(बीबीसी संवाददाता सर्वप्रिया सांगवान से बातचीत पर आधारित)
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