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क्या मिस्र ने इसराइल से खुद पर हवाई हमले करवाए?
- Author, जोनाथन मार्कस
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
बीते सप्ताहांत अमरीकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक सनसनीखेज़ ख़बर छापी.
रिपोर्ट की हेडलाइन थी, 'खुफ़िया गठबंधन: इसराइल का मिस्र में हवाई हमला, काहिरा की रज़ामंदी'.
इसके संवाददाता डेविड कर्कपैट्रिक ने दोनों देशों के खुफ़िया सैन्य रिश्तों का बारीकी से ब्योरा दिया है.
उन्होंने लिखा है, "दो साल से भी ज़्यादा समय से इसराइली ड्रोन, जेट विमान गुपचुप तरीके से हवाई अभियान छेड़े हुए हैं. मिस्र के भीतर 100 से भी ज़्यादा हवाई हमलों को अंजाम दिया गया है. कभी-कभी तो हफ़्ते में एक से ज़्यादा हमले किए गए और यह सब कुछ राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी की हामी से हुआ है."
मिस्र का इसराइल के साथ 1979 से ही शांति समझौता है.
दोनों देशों के रिश्ते इतने ठंडे हैं कि बामुश्किल ही कोई मौक़ा आया होगा जब दोनों देशों ने किसी सहयोग को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया हो. ऐसे में हवाई हमले की मंज़ूरी देने की बात मानना तो और भी मुश्किल है.
क्या मिस्र ने इसराइली सेना से मदद मांगी?
डेविड कर्कपैट्रिक की स्टोरी का निचोड़ ये था कि लंबे समय से सिनाई में मुस्लिम चरमपंथियों से संघर्ष कर रही मिस्र की फ़ौज ने आख़िरकार इससे निपटने के लिए इसराइल की मदद ली.
ऐसा करने में दोनों देशों का फ़ायदा है.
डेविड के मुताबिक़, इसराइल के दखल से मिस्र की सेना को उन इलाक़ों में दोबारा पकड़ बनाने का मौक़ा मिला जहां वो पिछले पांच साल से चरमपंथियों से संघर्ष कर रही थी.
वहीं इसराइल ने ऐसा करके अपनी सीमाओं को और सुरक्षित बनाया, साथ ही पड़ोसी देश में तनाव कम करके, स्थिरता बढ़ाई.
मिस्र ने ख़बर का खंडन किया
हालांकि डेविड कर्कपैट्रिक की स्टोरी पहली नज़र में इसराइली और पश्चिमी सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित लगती है.
जब ये ख़बर छपी तो मिस्र के मीडिया ने इसकी आलोचना की और इसे 'फ़र्ज़ी ख़बर' और 'ग़ैरपेशेवराना पत्रकारिता' करार दिया.
मिस्र की सेना ने भी ज़ोर देकर कहा कि सिर्फ़ उसी के सुरक्षा बल चरमपंथियों से लड़ रहे हैं.
इसराइल और मिस्र के बीच अगर कोई ऐसी सैन्य साझेदारी पनप रही है तो ये वहां की सरकार के लिए बड़ा संवेदनशील मसला है.
नियमित रूप से आने वाली हवाई हमलों की ख़बर के बीच सभी जानना चाहते हैं कि ये हवाई हमले कौन कर रहा है.
इस क्षेत्र में चीज़ें बदल रही हैं और इसी की तस्वीर पेश करती यह ख़बर कुछ हद तक सही लगती है लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है या इसके नतीजे क्या होंगे, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता.
ईरान विरोधी गठबंधन
खाड़ी क्षेत्र से लेकर भूमध्य सागर तक ईरान के बढ़ते दबदबे और उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं ने सऊदी अरब, मिस्र और जॉर्डन की नींद उड़ा दी है.
जिसके चलते कुछ सुन्नी बहुल मुल्कों का झुकाव इसराइल की तरफ़ बढ़ा है.
उनकी चिंता समान है - ईरान की परमाणु ताक़त और उसका सामना करने से बच रहा अमरीका.
इसराइल और मिस्र के बीच पनप रही साझेदारी के भी ज़ाहिर और छिपे हुए संकेत मिलते रहे हैं.
कूटनीतिक स्तर पर भी कुछ चीज़ें ऐसी हो रही हैं जो इस ओर इशारा करती हैं.
हाल ही में सऊदी में बने मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव डॉक्टर मोहम्मद अल इसा ने वॉशिंगटन में मौजूद होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम के निदेशक को एक खुला ख़त लिखा.
उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों पर हुई ज़्यादतियों को झेलने वाले लोगों के लिए सहानुभूति ज़ाहिर की. साथ ही उन लोगों को आलोचना की जो कहते हैं कि होलोकास्ट कभी हुआ ही नहीं था.
इस्लाम के एक बड़े धार्मिक नेता का ऐसा बयान बेहद अहम है क्योंकि यह वही क्षेत्र है जो आज तक होलोकास्ट के होने पर ही सवाल खड़े करता रहा है.
क्या इसराइल दोनों हाथ में लड्डू रख सकता है?
इसी तरह की ख़बरें हैं जो बताती हैं कि अरब देशों में अंदरखाने क्या चल रहा है.
इसराइल सुन्नी देशों के साथ अपने संबंधों पर ज़्यादा मुखरता से बोलता रहा है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू ने नवंबर में लंदन के थिंक टैंक चैटहम हाउस में भी इसका ज़िक्र किया.
क्षेत्र में चल रही गतिविधियों पर उन्होंने कहा कि यह दुख की बात है कि मध्यकालीन और आधुनिक सोच के बीच चल रही जंग में, मध्यकालीन सोच वाले देश ईरान की मदद से आगे बढ़ते नज़र आ रहे हैं.
लेकिन अच्छी ख़बर ये है कि बाक़ी देश एकजुट होकर इसराइल के उतने क़रीब आ रहे हैं जितने वे पहले कभी नहीं रहे. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अपने जीते जी ऐसा होते देख पाऊंगा. इसराइल पूरी कोशिश कर रहा है कि वह नरम सुन्नी देशों के साथ मिलकर ईरान को जवाब दे सके और उसे पीछे खदेड़ सके.
नेतान्याहू के मुताबिक़ इसराइल की लोकप्रियता बढ़ रही है और "अगर आप खाड़ी क्षेत्र की ओर जाएं तो पाएंगे कि इसराइल को लेकर देशों की सोच काफ़ी बदल गई है."
फ़लस्तीन से रिश्ते सुधारने का दबाव
पड़ोस में मौजूद फ़लस्तीनी क्षेत्र के बारे में बोलते हुए नेतान्याहू ने कहा कि वे अभी भी बहुत कठोर हैं लेकिन बाक़ियों का मन पिघल रहा है.
इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है क्योंकि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने जब इसराइल में मौजूद अमरीकी दूतावास को यरूशलम ले जाने की बात कही तो सुन्नी देशों ने इस पर ज़्यादा कडी प्रतिक्रिया नहीं दी.
हालांकि जानकार और इसराइल के इस दावे से सहमत नहीं दिखते.
इसी बीच कुछ लोग इसे इसराइल-फ़लस्तीनी क्षेत्र के बीच संबंध सुधारने का मौक़ा मानते हैं.
उनको लगता है कि अगर वाक़ई इसराइल के दावे में दम है तो इसराइल के नए दोस्तों को उस पर पड़ोसी क्षेत्र के साथ रिश्ते सुधारने का दबाव बनाना चाहिए.
लेकिन इसराइली प्रधानमंत्री ने फ़लस्तीनी क्षेत्र के साथ संबंध सुधारने का कोई संकेत नहीं दिया.
फ़लस्तीनी मांग को दरकिनार करके, दूसरे मुल्कों के साथ दोस्ती बढ़ाने का दावा करने वाले नेतान्याहू को शायद लगता है कि वे दोनों हाथ में लड्डू लेकर चल सकते हैं.
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