श्रीलंका: बौद्धों और मुसलमानों के बीच फिर फ़साद क्यों?

श्रीलंका के गॉल में साप्रंदायिक तनाव की स्थिति बनी हुई है. एक तरफ़ बौद्ध हैं तो दूसरी तरफ़ मुस्लिम समुदाय.
ख़राब हालात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पुलिस को गॉल में दो बार कर्फ्यू लगाना पड़ा.
पुलिस को गॉल में 19 लोगों की गिरफ़्तारी की है और दावा किया है कि हालात पर क़ाबू कर लिया गया है.
सांप्रदायिक तनाव की शुरुआत उस समय से हुई जब एक मोटरसाइकिल सवार बौद्ध ने एक मुस्लिम महिला को सड़क पर ठोकर मार दी.
पुलिस ने अफ़वाह फैलाने के आरोप में एक महिला को गिरफ़्तार भी किया है जो कथित तौर पर ये कह रही थी कि मुसलमान एक बौद्ध मठ पर हमला करने वाले हैं.

सांप्रदायिक तनाव का इतिहास
इस साल दोनों समुदाय के बीच तनाव की स्थिति बढ़ती हुई लग रही है.
कुछ कट्टरपंथी बौद्ध समूहों ने मुसलमानों पर जबरन धर्म परिवर्तन कराने और बौद्ध मठों को नुक़सान पहुंचाने का आरोप लगाया.
पिछले दो महीने के भीतर गॉल में मुसलमानों की मिल्कियत वाली कंपनियों और मस्जिदों पर हमले की 20 से ज़्यादा घटनाएं हो चुकी हैं.
साल 2014 में कट्टरपंथी बौद्ध गुटों ने तीन मुसलमानों की हत्या कर दी थी जिसके बाद गॉल में दंगे भड़क गए.
साल 2013 में कोलंबो में बौद्ध गुरुओं के नेतृत्व में एक भीड़ ने कपड़े के एक स्टोर पर हमला कर दिया था.
कपड़े की ये दुकान एक मुस्लिम की थी और हमले में कम से कम सात लोग घायल हो गए थे.
श्रीलंका की आबादी दो करोड़ दस लाख के क़रीब है और इसमें 70 फ़ीसदी बौद्ध हैं और 9 फ़ीसदी मुसलमान.
साल 2009 में सेना के हाथों तमिल विद्रोहियों की हार के बाद से श्रीलंका का मुस्लिम समुदाय एक तरह से सियासी फ़लक से दूर रहा है.
लेकिन हाल के सालों में मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ धर्म के नाम पर हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं. इस हिंसा के लिए बौद्ध गुरुओं को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.

लेकिन बौद्धों के निशाने पर मुसलमान क्यों?
बौद्ध धर्म को दुनिया में शांति और अहिंसा के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है. अहिंसा के प्रति बौद्ध मान्यताएं उसे अन्य धर्मों से अलग बनाती है.
फिर सवाल उठता है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ बौद्ध हिंसा का सहारा क्यों ले रहे हैं. ऐसा ही स्थिति हिंद महासागर से अलग होने वाले दो देशों में हो रहा है.
पहला तो श्रीलंका है और दूसरा म्यांमार या बर्मा.
ये बात भी किसी पहेली से कम नहीं है कि दोनों देशों को इस्लामी चरमपंथियों से कोई ख़तरा नहीं है और दोनों ही देशों में मुसलमान एक छोटे सा अल्पसंख्यक समुदाय है.
श्रीलंका में मुसलमानों का मुस्लिम परंपरा के तहत मांसाहार या पालतू पशुओं को मारना बौद्ध समुदाय के लिए एक विवाद का मुद्दा रहा है.

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बोडु बला सेना
श्रीलंका में कट्टरपंथी बौद्धों ने एक बोडु बला सेना भी बना रखी है जो सिंहली बौद्धों का राष्ट्रवादी संगठन है. ये संगठन मुसलमानों के ख़िलाफ़ मार्च निकालता है.
उनके ख़िलाफ़ सीधी कार्रवाई की बात करता है और मुसलमानों द्वारा चलाए जा रहे कारोबार के बहिष्कार का वकालत करता है.
इस संगठन को मुसलमानों की बढ़ती आबादी से भी शिकायत है.
बर्मा में हालात ज़्यादा गंभीर हैं. वहां कट्टरपंथी बौद्धों की अगुवाई अशीन विराथु कर रहे हैं.
धार्मिक तनाव बढ़ाने के आरोप में उन्हें 2003 में जेल भेजा गया लेकिन 2010 में वे रिहा कर दिए गए.
जब उनसे ये पूछा गया कि क्या वे 'बर्मा के बिन लादेन' हैं, उन्होंने कहा कि वे इससे इनकार नहीं करेंगे.

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राष्ट्रीय पहचान
ये समझना अपने आप में महत्वपूर्ण है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की शुरुआत अक्सर उनके दुकानों से होती है.
श्रीलंका और बर्मा दोनों में ही ऐसा लगता है कि बहुसंख्यक समुदाय के आर्थिक असंतोष और टूटती उम्मीदों का शिकार अल्पसंख्यक समाज को बनना पड़ता है.
मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को लेकर दी जाने वाली तमाम दलीलें बौद्ध धर्म के संदेशों से मेल नहीं खाती हैं.
बर्मा और श्रीलंका दोनों में ही ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय आंदोलनों में बौद्ध धर्म की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
दोनों ही देशों में बहुत से लोग ऐसा मानते हैं कि बौद्ध धर्म उनकी राष्ट्रीय पहचान का एक हिस्सा है और दोनों ही देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं.

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साल 1983 में श्रीलंका में सिंहलियों और तमिलों के बीच नस्लीय तनाव की वजह से गृह युद्ध भड़क गया.
इस गृह युद्ध में भी मुसलमान तमिल विद्रोहियों का निशाना बनते रहे.
और तमिल विद्रोहियों की सेना के हाथों हार के बाद अब ऐसा लगता है कि बहुसंख्यकों को एक नया टारगेट मिल गया है.
बर्मा और श्रीलंका में बौद्ध चरमपंथियों और सत्तारूढ़ पार्टियों के बीच के संबंध को लेकर तस्वीर बहुत ज़्यादा साफ़ नहीं है.
श्रीलंका के पूर्व रक्षामंत्री जुटापाया राजपक्षे बौद्ध गुरुओं को 'राष्ट्र, धर्म और नस्ल का संरक्षक' क़रार देते हैं.
दोनों ही देशों में बौद्ध समुदाय का एक तबका देश के एकीकरण की बात तो करता है लेकिन साथ ही उन्हें ये भी लगता है कि उनका धर्म ख़तरे में है.
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