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कार्बन डाई ऑक्साइड में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, आते विनाश का संकेत!
दुनिया भर में मौसमी बदलावों का अध्ययन करने वाली वैश्विक संस्था डब्ल्यूएमओ ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि साल 2016 में धरती में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गई है.
बीते साल हुई CO2 की वृद्धि बीते 10 सालों में हुई औसत वृद्धि से 50% ज़्यादा थी.
शोधार्थियों के मुताबिक़, इंसानी गतिविधियों और अल-नीनो की वजह से हुई इस वृद्धि ने बीते आठ लाख सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है.
इसकी वजह से दुनिया भर में तापमान के निर्धारित किए गए लक्ष्य को पाना मुश्किल होगा.
वर्ल्ड मीटियरोलॉजिकल ऑर्गनाइज़ेशन ने ग्रीन हाउस गैस बुलेटिन जारी की है जो 51 देशों में लिए गए आंकड़ों पर आधारित है.
इन देशों में स्थित शोध केंद्र तापमान बढ़ाने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसों का आकलन करते हैं.
डब्ल्यू एम ओ से जुड़ी डॉ. ओक्साना तारासोवा ने बीबीसी न्यूज़ को बताया, "जब से हमारा नेटवर्क काम कर रहा है, उन तीस सालों में ये सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है."
साल 2015 में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा औसत 400ppm थी, लेकिन 2016 में ये पहुंचकर औसत 403.3ppm हो गई है.
वे कहती हैं, "इससे पहले सबसे ज़्यादा बढ़त 1997-1998 में अल-नीनो के दौरान हुई थी. तब ये 2.7ppm था जो अब 3.3ppm हो चुका है. ये भी बीते 10 सालों के औसत से 50 प्रतिशत ज़्यादा था."
अल-नीनो वातावरण में कार्बन की मात्रा पर असर डालता है क्योंकि अल-नीनो के चलते सूखा पड़ने से पेड़ों की कार्बन सोखने की क्षमता प्रभावित होती है.
डॉक्टर तारासोवा बताती हैं कि बीते कुछ सालों में इंसानी गतिविधियों से पैदा होने वाले कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन वातावरण में कुल CO2 की मात्रा का ही महत्व होता है.
रिपोर्ट बताती है कि बीते 70 सालों में वातावरण में हुई कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि शीत युग के अंत से 100 गुना ज़्यादा है.
ग्रीनहाउस गैसों पर असर
स्टडी बताती है कि साल 1990 से विकिरण में कुल 40% की वृद्धि हुई जिससे हमारे वातावरण की सभी ग्रीनहाउस गैसों पर असर पड़ा है.
तारासोवा बताती हैं, "भू-वैज्ञानिक रूप से ये वृद्धि हमारे वातावरण में भारी मात्रा में गर्मी बढ़ने जैसी है क्योंकि ये परिवर्तन सामने आने में पहले की तरह दस हज़ार साल नहीं लगेंगे. ये परिवर्तन ज़ल्दी दिखाई देंगे. हमें नहीं पता कि स्थिति क्या है? इस वजह से ये स्थिति थोड़ी चिंताजनक है."
विशेषज्ञों के मुताबिक़, इससे पहले ऐसी ही स्थिति पचास लाख साल पहले सामने आई थी. तब दुनिया का तापमान दो से 3 सेल्सियस गर्म था और समुद्र का जल स्तर ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिक के ग्लेशियर पिघलने की वजह से 10 से 20 मीटर ज़्यादा था.
वातावरण पर शोध करने वाले अन्य विशेषज्ञों ने भी इस रिपोर्ट को चिंताज़नक बताया है.
रॉयल होलोवे यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन के प्रोफेसर यूआन निस्बत ने कहा है, "साल 2015 और 2016 में कार्बन में 3ppm की बढ़त बहुत ज़्यादा है जो 1990-2000 दशक से दोगुनी है."
"हमें तत्काल प्रभाव से पेरिस समझौते पर काम करना चाहिए. हमें जीवाश्म ईधन से दूरी बनानी चाहिए. स्थिति बिगड़ने के संकेत नज़र आ रहे हैं, लेकिन अब तक हवा में इसके संकेत नज़र नहीं आए हैं."
संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण से जुड़ी संस्था के प्रमुख एरिक सोलहेम कहते हैं, "आंकड़े झूठ नहीं बोलते. हम अभी भी काफ़ी ज़्यादा मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन कर रहे हैं जिसे कम किए जाने की ज़रूरत है."
"हमारे पास इस चुनौती से निपटने के कई समाधान हैं. बस वैश्विक राजनेताओं को दृढ़ इच्छाशक्ति और इसे महत्व दिए जाने की ज़रूरत है."
ये रिपोर्ट बॉन में जलवायु के मुद्दे पर होने जा रही सयुंक्त राष्ट्र की बैठक से एक हफ़्ते पहले जारी की गई है.
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