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हाफ़िज़ सईद का चुनावी ताल ठोंकना ख़तरे की घंटी!
- Author, हारून रशीद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान उलेमा काउंसिल ने आगामी आम चुनावों में हिस्सेदारी लेने की घोषणा की है. इससे पहले इसने कोई चुनाव नहीं लड़ा है.
ये कोई बहुत बड़ा दल नहीं है और ना ही कोई बड़ा जनाधार इसके पास है, लेकिन धार्मिक दल होने के नाते चुनाव में ये सियासी पार्टियों के जनाधार में कुछ सेंध लगा सकती है.
पाकिस्तान के धार्मिक गुटों के बीच तालमेल स्थापित करने के उद्देश्य से क़रीब ढाई दशक पहले पाकिस्तान उलेमा काउंसिल अस्तित्व में आया था.
धर्म आधारित कई ऐसे छोटे-छोटे संगठन पाकिस्तान में हैं. इनमें टूट फ़ूट होती रही है और नए-नए गुट सामने आते रहे हैं.
लेकिन लाहौर उपचुनाव के नतीज़ों ने इन धार्मिक संगठनों को लेकर एक क़िस्म की चिंता पैदा की है.
यहां चुनाव तो पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) की उम्मीदवार और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पत्नी कुलसुम नवाज़ जीत गईं, लेकिन जमात उद दावा के मुखिया हाफ़िज सईद के मिल्ली मुस्लिम लीग (एमएमएल) के समर्थन वाले निर्दलीय उम्मीदवार ने प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को चौथे नंबर पर धकेल कर सबको चौंका दिया.
ख़तरे की घंटी
ये छोटे-छोटे धार्मिक संगठन सियासत में उतरते हैं तो मुख्य धारा की सियासी पार्टियों को इसका नुक़सान होना लाज़िमी है.
लाहौर उपचुनाव में ही 40 से अधिक उम्मीदवार मैदान में थे. यहां जमात-ए-इस्लामी का उम्मीदवार भी मैदान में था, जिसे क़रीब दो लाख की आबादी में 592 वोट मिले.
'तहरीक लबैक या रसूल अल्लाह' के उम्मीदवार को क़रीब सात हज़ार वोट मिले जबकि पीपीपी के फ़ैसल मीर को कुल 1,414 वोट मिले.
इतने अधिक उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से ये सवाल उठने लगे थे कि क्या प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों के वोट में सेंध लगाने के लिए ऐसा जानबूझ कर किया गया था?
सबसे बड़े ख़तरे का संकेत ये हैं कि यहां चरमपंथ से सहानुभूति रखने वाले कट्टर दक्षिणपंथी संगठनों ने चुनाव प्रचार में ये कहकर लोगों से वोट मांगा कि क्या आप मुमताज़ क़ादरी को फांसी पर लटकाने वालों को वोट देंगे.
चुनावी पोस्टरों में हाफ़िज सईद
मुमताज़ क़ादरी को पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने के अपराध में फांसी दे दी गई थी. मिल्ली मुस्लिम लीग के निर्दलीय उम्मीदवार और अन्य कट्टर दक्षिणपंथी उम्मीदवारों के समर्थन में हाफ़िज़ सईद और क़ादरी के पोस्टर इस चुनाव में दिखे.
हालांकि पाकिस्तान के धार्मिक संगठनों के बीच बहुत सारे मतभेद हैं और आने वाले समय में इनके एक मंच पर आने की उम्मीद काफ़ी कम है.
जमात उद दावा का मामला थोड़ा अलग है. इसने राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग बनाई. इसकी सत्ता से क़रीबियों के चर्चे होते रहे हैं, अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों के मैदान में आना कोई अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है.
चुनावी राजनीति में धार्मिक संगठनों के बढ़ते प्रभाव से इस बात की चिंता बढ़ गई है कि चरमपंथी संगठनों से जुड़ी सियासी पार्टियां मुख्यधारा की राजनीति में खुद को स्वीकार्य बनाने की कोशिश में लगी हैं.
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