कौन है रोहिंग्या की रक्षा करने वाली सेना?

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म्यांमार में जारी हिंसा की वजह से रोहिंग्या समुदाय के 1 लाख से अधिक लोग अपना घर छोड़ चुके हैं. इस बीच रोहिंग्या विद्रोहियों और म्यांमार की सेना के बीच भी संघर्ष जारी है.

रोहिंग्या मुसलमानों की रक्षा का दावा करने वाली आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना आखिर तैयार कैसे हुई और कौन हैं इसमें शामिल लोग.

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अराकान रोहिंग्या रक्षा सेना

अराकान रोहिंग्या रक्षा सेना (एआरएसए) उत्तरी म्यांमार के रखाइन प्रांत से संचालित होती है. रखाइन प्रांत रोहिंग्या मुसलमान बहुल इलाका है जहां सबसे ज़्यादा हिंसा हुई है. यहां रह रहे लोगों को म्यांमार सरकार ने नागरिकता देने से इंकार कर दिया है और इन्हें बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासी घोषित किया है.

लंबे समय से म्यांमार में जातीय हिंसा हो रही है. पिछले साल एक सशस्त्र रोहिंग्या विद्रोह शुरू हो गया. एआरएसए पहले दूसरे नामों से जाना जाता था जिसमें से एक था हराकाह अल-यकीन, इस संगठन ने 20 से ज्यादा पुलिसकर्मियों की हत्या की है.

हाल ही में इस विद्रोही सेना ने 25 अगस्त को रख़ाइन प्रांत में पुलिस पोस्ट पर बड़ा हमला कर 12 लोगों की हत्या कर दी थी.

म्यांमार सरकार का कहना है कि यह एक चरमपंथी संगठन है जिसके नेता विदेश से प्रशिक्षण लेते हैं. अंतरराष्ट्रीय संकट समूह (आईसीजी) ने 2016 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में भी यह दावा किया कि रोहिंग्या विद्रोही सेना के लोग सऊदी अरब में रह रहे हैं. आईसीजी के अनुसार एआरएसए का नेता अता उल्लाह का जन्म पाकिस्तान में हुआ और वह सऊदी अरब में पले बढ़े.

वहीं दूसरी तरफ एआरएसए के एक प्रवक्ता ने एशिया टाइम्स को दिए अपने बयान में इन आरोपों को नकारा है. उनका कहना है कि उनकी सेना का संबंध जिहादी समूहों से नहीं है, वे सिर्फ़ रोहिंग्या लोगों के अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं.

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कैसे हथियार हैं इनके पास ?

25 अगस्त को पुलिसकर्मियों पर हुए हमले के बाद सरकार ने कहा कि इन हमलावरों के पास चाकू और घर में बनाए बम थे. विद्रोहियों के पास अधिकांश हथियार घर में बने हैं.

लेकिन आईसीजी की रिपोर्ट बताती है कि एआरएसए में शामिल लोग पूरी तरह से अनुभवहीन नहीं हैं. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस विद्रोही सेना के लोग दूसरे संघर्ष में शामिल लोगों से भी मदद ले रहे हैं जिसमें अफ़ग़ानिस्तान के लोग भी शामिल हैं.

कब शुरू हुआ एआरएसए ?

एआरएसए के प्रवक्ता के मुताबिक इस विद्रोही सेना ने साल 2013 से प्रशिक्षण शुरू कर दिया था. लेकिन इस सेना ने पहला हमला अक्टूबर 2016 में किया, जिसमें 9 पुलिसकर्मी मारे गए थे.

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मकसद

एआरएसए के मुताबिक इनका मकसद म्यांमार में रह रहे रोहिंग्या समुदाय के लोगो की रक्षा करना है. उनका कहना है कि वे रोहिंग्या लोगों को सरकारी दमन से बचाना चाहते हैं. एआरएसए अपने ऊपर लगने वाले आतंकी संगठन के दावे को यह कहकर नकारता है कि उसने कभी भी आम नागरिकों पर हमला नहीं किया.

आईसीजी की रिपोर्ट बताती है एआरएसए में शामिल अधिकतर युवा रोहिंग्या पुरुष हैं. ये सभी साल 2012 में हुए दंगों के बाद सरकार की हिंसक प्रतिक्रिया से नाराज़ हैं. रोहिंग्या के ये युवक नावों के जरिए अपना इलाका छोड़कर मलेशिया की तरफ जाने का प्रयास करते थे, लेकिन साल 2015 में मलेशियाई सेना ने इनके रास्तों को रोक दिया जिसकी वजह से हज़ारों लोग समुद्र के बीच में फंस गए.

इसके बाद सेना और विद्रोहियों के बीच हिंसा का दौर शुरू हो गया. सुरक्षा बलों ने काफी कड़े तरीके से इस हिंसा से निपटने का प्रयास किया. फरवरी में आई यूएन की रिपोर्ट में सेना की कार्रवाई को क्रूरतम करार दिया गया.

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विद्रोह का नतीजा

एआएसए द्वारा पुलिसकर्मियों पर किए गए हमलों की वजह से सेना ने इनके ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की है. सेना के अनुसार वे आम नागरिकों पर हमला करने वाले उग्रवादियों के ख़िलाफ़ लड़ रही है.

रोहिंग्या लोग रखाइन प्रांत से भागकर बांग्लादेश की तरफ जा रहे हैं. लेकिन वहां बने शरणार्थी शिविर भी लगभग भर चुके हैं. रखाइन के हिंसाग्रस्त इलाकों में मीडिया के जाने पर कड़े प्रतिबंध हैं.

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