विवेचना: आम की पेटियों में धमाके से हुई ज़िया उल हक़ की मौत?

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
17 अगस्त, 1988. पाकिस्तान का बहावलपुर एयरबेस. समय दोपहर तीन बज कर छयालीस मिनट. अमरीका में बने 'हरकुलीस सी-130' विमान ने टेक ऑफ़ के लिए रनवे पर दौड़ना शुरू किया.
विमान में जनरल ज़िया उल हक़ के साथ बैठे थे पाकिस्तानी ज्वॉएंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ के प्रमुख जनरल अख़्तर अब्दुल रहमान, पाकिस्तान में अमरीका के राजदूत आर्नल्ड रफ़ेल, पाकिस्तान में अमरीकी एड मिशन के प्रमुख जनरल हरबर्ट वासम और पाकिस्तानी सेना के दूसरे वरिष्ठ अधिकारी.
जनरल ज़िया बहावलपुर गए थे नए अमरीकी टैंक 'एम आई अब्राम्स' का परीक्षण देखने. शुरू में वो वहां नहीं जाना चाहते थे, लेकिन उनकी फ़ौज के ही कुछ अधिकारियों ने उन पर ज़ोर डाला कि वो वहां ज़रूर जाएं.
जनरल ज़िया उल हक़ के बेटे एजाज़ुल हक़ ने बीबीसी को बताया, "उन दिनों उनकी ट्रैवलिंग पर मुमानियत थी एक किस्म की. उन्हें आगाह किया गया था वज़ीरे- दाख़िला की जानिब से. जिस दौरे पर वो गए थे, उस पर जाने की उनकी इतनी ख़्वाहिश भी नहीं थी. बाद में मुझे मालूम चला कि उनके कुछ साथियों ने उन्हें मजबूर किया था वहां जाने के लिए, क्योंकि वहां बहुत बड़ा प्लान बनाया गया था सबोटाज के लिए. उन्होंने अपने नज़दीकी लोगों से कहा भी था कि ये लोग पता नहीं क्यों मुझे रोज़ फ़ोन कर इसरार कर रहे हैं कि इस परीक्षण में मेरा पहुंचना ज़रूरी है जब कि वहां डीजी मिलिट्री ऑपरेशन या डीजी टेक्निकल ट्रेनिंग या वाइस चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ भी जा सकते थे."

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पाक का सबसे महत्वपूर्ण विमान लापता
पाक-1 के कॉकपिट की कमान संभाली हुई थी विंग कमांडर माशूद हसन ने, जिनको इस ज़िम्मेदारी के लिए खुद जनरल ज़िया उल हक़ ने ही चुना था. जैसे ही विमान पूरी तरह से हवा में आया, बहावलपुर के कंट्रोल टावर ने विंग कमांडर माशूद हसन से एक रुटीन सवाल पूछा, 'अपनी पोज़ीशन बताइए.'
माशूद ने जवाब दिया, 'पाक-1 स्टैंड बाई.' इस के बाद माशूद चुप हो गए. कंट्रोल टावर उनसे संपर्क करने की कोशिश करने लगा... लेकिन सब बेकार साबित हुआ. टेक ऑफ़ करने के कुछ मिनटों के अंदर पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण विमान पाक-1 लापता था.

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जनरल बेग ने ऊपर से मुआएना किया
लेकिन इस बीच एयरबेस से करीब 18 किलोमीटर दूर कुछ गांव वालों ने आसमान में देखा कि पाक-1 रोलर कोस्टर अंदाज़ में हवा में कभी ऊपर तो कभी नीचे जा रहा था. तीसरे लूप के बाद वो सीधे नाक के बल रेगिस्तान में गिरा और चारों तरफ़ आग का एक गोला फैल गया.
समय था तीन बज कर इक्यावन मिनट. लगभग इसी समय पाकिस्तानी सेना के उप-प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल मिर्ज़ा असलम बेग ने बहावलपुर हवाई बेस से अपने छोटे टर्बो जेट से उड़ान भरी. मिनटों में वो उस स्थान के ऊपर थे जहां जनरल ज़िया के विमान का मलबा जल रहा था. उन्होंने उस जगह का ऊपर से ही चक्कर लगाया और अपने विमान चालक को आदेश दिया कि इस्लामाबाद चलो.
जनरल असलम बेग याद करते हैं, "जनरल ज़िया के टेक ऑफ़ करने के करीब पांच-सात मिनट बाद मेरा जहाज़ उड़ा है. कुछ ही मिनटों में मुझे ख़बर मिली कि जनरल ज़िया का जहाज़ क्रैश हो गया है. जब मैं ऊपर से गुज़रा तो मैंने देखा कि नदी के किनारे जहाज़ दुर्घटनाग्रस्त हो चुका है. हमारे कुछ लोग वहां पहुंच गए थे. मैंने उनसे संपर्क किया विवरण जानने के लिए. उन्होंने कहा सब कुछ ख़त्म हो गया है."
"कोई भी ज़िदा नहीं बचा है. फिर हम सोचते रहे कि अगर हम बहावलपुर वापस जाते हैं... आना जाना... वहां से फिर हैलिकॉप्टर बुलवाएंगे... और फिर शाम को वहां से टेक ऑफ़ करने की सुविधा भी नहीं थी. जब मैंने सोचा कि हमें तुरंत इस्लामाबाद जाना चाहिए. हमारे जहाज़ में उस वक्त ब्रिगेडियर जहांगीर करामत भी थे. हमने उनसे पूछा भी कि क्या करें? उन्होंने भी कहा कि बेहतर यही है कि हम वापस चलें पिंडी, क्योंकि हमें कुछ नहीं मालूम था कि क्या होने वाला है."

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महत्वपूर्ण व्यक्ति की मौत
उधर इस्लामाबाद में इस तरह की अफवाहें फैलने लगी थीं कि किसी बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति की मौत हो गई है. उस समय टीसीए रंगाचारी इस्लामाबाद में भारत के उप-उच्चायुक्त थे.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "ये क्रैश हुआ है दोपहर को. इसके तुरंत बाद ही मुझे ख़बर मिली कि ऐसा हो गया है. उस दिन इंडोनेशिया के राष्ट्रीय दिवस का 'रिसेप्शन' था. इंडोनेशियन एंबेसी में हम लोगों ने देखा कि अमरीकी एंबेसी से कोई नहीं आया था. पाकिस्तान की तरफ़ से भी काफ़ी निचले स्तर के अधिकारी आए थे. ये बात सरकारी तौर पर कन्फ़र्म हुई रात नौ बजे जब पाकिस्तान टेलिविजन पर इसकी घोषणा हुई."

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सीआईए पर शक
ज़िया के जाने के बाद पाकिस्तान में चुनाव हुए और बेनज़ीर भुट्टो सत्ता में आईं. लेकिन इससे उन सवालों का अंत नहीं हुआ कि आख़िर पाक-1 के साथ ऐसा क्या हादसा हुआ कि वो ज़मीन पर आ गिरा? स्वयं बेनज़ीर ने अपनी आत्मकथा 'द डॉटर ऑफ़ द ईस्ट' में लिखा कि ज़िया की मौत ईश्वर का कारनामा थी.
अमरीका ने इस दुर्घटना की जांच के लिए अमरीकी वायु सेना के अधिकारियों का एक दल पाकिस्तान भेजा. अमरीकी जांचकर्ताओं ने रफ़ेल की पत्नी ऐली रफ़ेल और ब्रिगेडियर जनरल वासम की पत्नी जूडी को बताया कि दुर्घटना का कारण तकनीकी था. दूसरी तरफ़ पाकिस्तानी जांच में पाया गया कि ये दुर्घटना षड्यंत्र की वजह से हुई थी और विमान के 'एलेवेटर बूस्टर पैकेज' से छेड़खानी के सबूत पाए गए. मैंने तत्कालीन आईएसआई प्रमुख हमीद गुल से उनकी मौत से पहले पूछा था कि आपकी नज़र में इस दुर्घटना के पीछे कौन हो सकता था.

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उनका जवाब था, "इसमें कोई शक नहीं कि उनकी हत्या की गई थी. वो एक हादसा नहीं था. जो जांच की गई उसमें भी यही बात बताई गई. मैं अपने तमाम विश्लेषणों में ये बात कहता रहा हूं कि मेरी उंगली तो अमरीका की तरफ़ उठती है, बिला शुबहा, क्योंकि इससे उन्हीं को फ़ायदा हुआ. पाकिस्तान को उन्होंने 'डी एस्टेबलाइज़' कर दिया और उस वक्त से लेकर अब तक हमारी हालत ज़वाल पर नज़र आ रही है. जहां तक आईएसआई का ताल्लुक है, इसमें कोई शुबहा नहीं कि ये उनकी नाकामयाबी थी."
"लेकिन आईएसआई बाक़ायदा अपने ख़ुतूत के ज़रिए प्रेसिडेंट ऑफ़िस को बता रही थी कि राष्ट्रपति की 'मूवमेंट' नहीं होनी चाहिए और उनकी ज़िदगी को ख़तरा है. हमें कुछ इस तरह के इशारे मिल रहे थे कि बहुत सी कुव्वतें उनसे नाराज़ हैं. मिस्टर जुनेजो की हुकूमत जब उन्होंने हटाई, उसके बाद उन्होंने शरियत के नफ़ाज़ की बात करनी शुरू कर दी थी और इसकी वजह से मग़रिब काफ़ी चौंका हुआ था और हमें ख़्याल था कि ग़ालिबन कहीं न कहीं कोई 'बॉडी ब्लो' या कुछ इस तरह की वारदात करने की कोशिश होगी."
अमरीका के राजदूत भी विमान पर सवार थे
लेकिन उस समय भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख आनंद कुमार वर्मा का मानना था कि सीआईए के पास ज़िया को हटाने के पर्याप्त कारण नहीं थे और फिर ये भी नहीं भूलना चाहिए कि उस विमान में पाकिस्तान में अमरीका के राजदूत भी सवार थे.

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वर्मा ने बीबीसी को बताया था, "सीआईए की कोई दिलचस्पी नहीं थी ज़िया उल हक़ को रास्ते से हटाने में, बल्कि सीआईए को तो उनसे मदद मिल रही थी अफ़गानिस्तान में. कड़ा कदम उठाने की उन्हें कोई ज़रूरत नहीं थी और सीआईए इस तरह की हरकत अब नहीं करता क्योंकि उनको राष्ट्रपति की मंज़ूरी चाहिए इस तरह के काम के लिए."
ज़िया के साथी जनरलों पर शक
कुछ लोगों का ये भी मानना है कि इसके पीछे जनरल ज़िया से असंतुष्ट जनरल भी हो सकते थे और जिस तरह से जनरल मिर्ज़ा असलम बेग एक अलग विमान से बहावलपुर से उड़े और दुर्घटना का पता चलते ही वापस बहावलपुर जाने के बजाए इस्लामाबाद चले गए, उस पर भी कई उंगलियां उठीं.
जनरल ज़िया उल हक़ के पुत्र एजाज़ उल हक़ ने बीबीसी के बताया, "इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी आप टेक ऑफ़ कर रहे हैं और उस इलाके के ऊपर जाकर अपने तैयारे के ज़रिए उसका जाएज़ा ले रहे हैं. ये एक 'नॉर्म्स' के अंदर आता है कि आपके सदरे- पाकिस्तान, आप के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ का इतना बड़ा हादसा होता है और आपके 29 के करीब साथी उसमें मर जाते हैं और आपने इतनी भी तकलीफ़ गवारा नहीं की कि आप वहां उतरते और ख़ुद जाएज़ा लेते. आपने फ़ौरी कोशिश की कि मैं इस्लामाबाद पहुंचूं और वहां पहुंचकर उनका इरादा था टेक ओवर करने का. लेकिन उस वक्त के सदर ग़ुलाम इसहाक ख़ां और उनके साथ के एयर चीफ़ ने कहा कि जमहूरी या आएनी तरीका ही चलेगा."

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ज़िया द्वारा नियमों का उल्लंघन
जब मैंने ये तथ्य जनरल असलम बेग के सामने रखे तो उन्होंने उसका ज़ोरदार खंडन किया. उनका कहना था कि जनरल ज़िया खुद उन्हें विमान में बैठाना चाह रहे थे, लेकिन फिर उन्होंने ही कहा कि आप तो अपना जहाज़ लाए हैं... आप उसी में आइए.
जनरल बेग ने कहा, "तरीका ये होता है कि जब 'चीफ़' आ रहा होता है तो मुझे उन्हें रिसीव करना होता है. अगर मैं उसी जहाज़ पर जाउंगा, तो उन्हें रिसीव कैसे करूंगा? इसलिए मैं पहले गया, उन्हें रिसीव किया, टैंकों का 'डिमॉन्सट्रेशन' देखा, उनके साथ रहा. हमारा एक उसूल होता था कि 'वी डिड नॉट वांट टु पुट ऑल अवर एग्स इन वन बास्केट' यानि हम सारे सीनियर अफ़सर, एक जहाज़ या एक हैलिकॉप्टर में साथ साथ नहीं चलेंगे. लेकिन जनरल ज़िया इस उसूल को ख़ुद 'वॉयलेट' करते थे. उनकी आदत थी कि जिसे वो पसंद करते थे, उससे कहते थे कि आओ बैठ जाओ. कोई छह या सात अफ़सर थे जिनको उन्होंने अपने जहाज़ में बैठा लिया. उनका 'मानीफ़ैस्ट' में नाम भी नहीं था."

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सियाचिन पर भारत पाकिस्तान के बीच ख़ुफ़िया बातचीत
दूसरी तरफ़ 1988 में भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के प्रमुख रहे आनंद कुमार वर्मा ने बीबीसी से रहस्योद्घाटन किया था कि बहुत कम लोगों को पता है कि जिस समय ज़िया की मौत हुई, उस समय भारत और पाकिस्तान सियाचिन का समाधान ढ़ूढने के बहुत नज़दीक थे. ज़िया को इस लिए हटाया गया कि कुछ लोग नहीं चाहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई समझौता हो.
वर्मा का कहना था, "ज़िया की मृत्यु तब हुई जब भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत अहम बातचीत चल रही थी और वो बहुत आगे बढ़ चुकी थी. पाकिस्तान की पहल पर सियाचिन मुद्दे के हल के लिए बातचीत की जा रही थी. इस बारे में भारत में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके एक दो सलाहकारों को ही इस बारे में पता था. बातचीत अपने अंतिम चरण में थी और ज़िया ने उसको मंज़ूरी दे दी थी. लेकिन उन्हें अपने कोर कमांडर्स से भी इसकी सहमति लेनी थी. मुझे लगता है कि बाद में जिन लोगों ने उसे हरी झंडी दिखाई थी, उन्हें लगा कि शायद ग़लत काम हो गया है. उसको किसी तरह रोकना है और वो उसे रोकने में सफल भी हो गए. कुछ लोगों का तो ये भी मानना है कि अगर बात आगे बढ़ती तो जनरल ज़िया उल हक़ और राजीव गांधी दोनों को नोबेल प्राइज़ मिल सकता था."

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केजीबी और रॉ पर भी शक
कुछ हल्कों में ये भी चर्चा थी कि इसके पीछे केजीबी या भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ का भी हाथ हो सकता था. मैंने जब ये सवाल आईएसआई के तत्कालीन प्रमुख हमीद गुल के सामने रखा, तो उनका कहना था, "रॉ तो ख़ैर रॉ यानि कच्चा संगठन था उस समय. उनके पास इस तरह की सलाहियत ही नहीं थी, इस तरह की वारदात करने की. हां केजीबी के बारे में सोचा जा सकता है. लेकिन उन्हें ये करना होता तो वो उस स्टेज में क्यों करते? केजीबी जब फंसी हुई थी, जब रूस को फ़ैसला करना था कि अफ़गानिस्तान में रहना है या जाना है, उससे पहले वो ये फ़ैसला करते."
जांच में कई झोल
जनरल ज़िया उल हक़ के पुत्र एजाज़ उल हक़ इस बात से कतई मुतमईन नहीं हैं, जिस तरह से इस पूरे मामले की जांच की गई. बकौल उनके जांच के बजाए मामले को दबाने की कोशिश की गई.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "इस हादसे की जस्टिस शफ़ीउर रहमान से 'ज्यूडीशियल इंक्वायरी' करवाई गई. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि ये एक 'सबोटाज' था, लेकिन जब तक इस मामले की क्रिमनल जांच नहीं होगी, हम मामले की तह में नहीं जा सकते. एक वाकया उन्होंने पेश किया कि जो जहाज़ का मलबा था, उसे एयरफ़ोर्स के एक हैंगर में रखा गया था. मुल्तान में किसी अफ़सर ने उन्हें बताया कि शायद किसी ने ज़िया के विमान में नीचे से मिसाइल मारी हो क्योंकि उसका जो छेद था, वो अंदर की तरफ़ था, जैसा कि बाहर से 'इंपैक्ट' की वजह से होता है. उन्होंने जब ये देखने के लिए एयरपोर्ट से राबता किया तो उन्हें ये बताया गया कि एटरपोर्ट के हैंगर में उस जहाज़ की 'टेल' पड़ी हुई है. लेकिन जब वो 40 घंटे के बाद जांच के लिए वहां पहुंचे, तो उसको वहां से हटा लिया गया था और बाद में फ़ौरी तौर पर उस मलबे को स्क्रैप में बेच दिया गया था."

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आम की पेटियों में नर्व गैस
एक और थ्योरी है कि ज़िया के विमान में आम की पेटियों के साथ वी एक्स नर्व गैस रख दी गई थी, जिससे पायलट बेहोश हो गया और विमान से उसका नियंत्रण जाता रहा.
जनरल असलम बेग कहते हैं, "जिस 'एक्सप्लोडिंग मैंगोज़' की बात की जाती है वो तो उन्हीं के पर्सनल सेक्रेट्री रहे जनरल महमूद दुर्रानी ने रखवाए थे. फिर आपको जानकर ताज्जुब होगा कि जिस दिन मैं इस्लामाबाद पहुंचा हूं, उसी दिन से मैंने सुनना शुरू कर दिया कि इसके लिए जनरल असलम बेग ज़िम्मेदार हैं. इस तरह की अफवाहें तभी फैलती हैं जब पहले से तय कर लिया गया कि उन्हें फैलाना है. आपको मालूम है कि इस जंग के दौरान सीआईए का सबसा बड़ा नेटवर्क पाकिस्तान में था. इस तरह की अफ़वाह फैला देना उन्हीं का काम था. कोई और इदारा और तंज़ीम ये काम कर ही नहीं सकती थी. 'दे वांन्टेड अ डिकॉय' कि कैसे किसी पर इल्ज़ाम डाल दिया जे और उनके सिरों पर इल्ज़ाम न आए."
अभी तक किसी जांचकर्ता ने सभी संदिग्धों को एक जगह इकट्ठा कर रहस्य पर से पर्दा हटाने की कोशिश नहीं की है, क्योंकि शायद सच कुछ लोगों के लिए बहुत कड़वा साबित होता और रहस्य का पर्दाफ़ाश, पहले से ही संवेदनशील इस इलाके के लिए समस्याएं खड़ी कर देता.
(ये लेख मूलत: साल 2017 में प्रकाशित हुआ था. आज जनरल ज़िया की 33वीं बरसी पर इसे फिर प्रकाशित किया जा रहा है)
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