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क्या डोनल्ड ट्रंप को समझने में चूक गए पुतिन?
- Author, जोनाथन मार्कस
- पदनाम, राजनयिक संवाददाता
रूसी सरकार ने हाल ही में अमरीकी राजनयिकों की संख्या घटाने का आदेश दिया है.
इस कदम ने दोनों देशों के बीच द्वपक्षीय रिश्तों में एक नई शुरुआत होने की आशा को खत्म कर दिया है. इसकी जगह अब दोनों देशों में एक अनिश्चित काल की प्रतिद्वंदिता शुरू हो सकती है.
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की जीत के मौके पर एक नये तरह के संबंधों की संभावना जाहिर की थी.
क्या पुतिन ट्रंप को समझने में चूके?
ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति पुतिन ने इसे समझने में चूक की. ट्रंप के चुनाव अभियान से रूस-अमरीका रिश्तों की नई शुरुआत की संभावना और ऐसी इच्छा जताने वाले संकेत मिले.
इनके आधार पर रूस ने अमरीकी चुनाव में इस हद तक घुसपैठ की जो अमरीकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक अभूतपूर्व था.
(फिलहाल इस विषय पर जांच जारी है कि रूस ने किस स्तर तक अमरीकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ट्रंप को मदद दी. ये बात दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के खराब होने को एक पृष्ठभूमि देती है.)
रूस ने इस मामले में किसी तरह की भूमिका से इनकार किया है. लेकिन ये साफ है कि रूस अमरीका में खुले विचारों के नए राजनीतिक नेतृत्व से काफी उम्मीदें लगाए था.
रूस की आशाओं पर फिरा पानी
रूस ने आशा की थी कि माहौल बदलेगा. इसमें क्रीमिया पर रूसी कब्जे के बाद सामने आए पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को हटाया जाना शामिल था.
इससे भी ज्यादा रूस दोनों देशों के बीच एक नए समझौते की उम्मीद कर रहा था जिसके तहत अमरीका सीरिया समेत कथित संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ संघर्ष में रूस को भागीदार के रूप में स्वीकार करे.
लेकिन अब तक ये आशाएं हक़ीकत में बदलती नजर नहीं आ रही हैं.
ऐसा लगता है कि रूस ने राष्ट्रपति ट्रंप की संभावित उपलब्धियों को लेकर ऐसी उम्मीदें रखी हुईं थीं जो हक़ीकत की ज़मीन से कोसों दूर थीं.
क्या पुतिन ने ट्रंप को एक सशक्त और मिलते-जुलते विचारों वाला नेता समझा था या उन्हें एक राजनितिक और राजनयिक रूप से सहज व्यक्ति माना था जिसे प्रभाव में लेने के साथ ही हावी हुआ जा सकता है?
दोनों ही तरह से रूस के अमरीकी चुनाव में हस्तक्षेप और उसके बाद जारी जांच के चलते किसी भी तरह की नई शुरुआत को रोक दिया है.
रूस ने शायद अमरीकी संसद में अपने कदमों को लेकर विरोध को समझने में गलती की और ट्रंप के करीबियों की असावधानी को कैपिटल हिल में ट्रंप का प्रबल समर्थन समझा.
ऐसे में ये दोनों देशों के बीच की स्थिति को कहां पहुंचाती है?
रूस और अमरीका के बीच रिश्ते ठीक नहीं हैं और राजनयिकों की बर्खास्तगी रिश्तों में दूरियां बढ़ा सकती है.
रूसी-अमरीकी रिश्तों में खराबी के असर
इससे साफ तौर पर यूक्रेन के मुद्दे समेत सीरिया संघर्ष पर प्रभाव दिखेगा.
इसका मतलब ये है कि अब रूस अपने पश्चिमी देशों के खिलाफ़ इनफॉर्मेशन कैंपेन और सायबर एक्टिविटीज़ जारी रखेगा, विशेषत: उन छोटे देशों के खिलाफ जिनके राजनीतिक तंत्र को कमजोर माना जा रहा है.
रूस लगातार अपने रणनीतिक परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण में लगा रहेगा. लेकिन अमरीका के भी अपने महत्वाकांक्षी इरादे हैं.
लेकिन ये असली शीत युद्ध की शुरुआत नहीं है. रूस सोवियत संघ जैसी विश्व शक्ति नहीं है. इसके बावजूद चिंता की वजहें मौजूद हैं.
रूस का सत्तावादी राष्ट्रीय पूंजीवाद कुछ नेटो देशों के राजनेताओं को भी लुभावना लग रहा है.
लेकिन रूस की अपनी भी कुछ सीमाएं हैं.
रूस ने खोले हुए हैं ट्रंप प्रशासन के लिए दरवाजे
एक बात ये है कि बिगड़ैल होने के भी फायदे भी सीमित ही हैं. क्योंकि राजनयिक प्रभुत्व के लिए भागीदारी भी जरूरी है. इसी वजह से रूस ने ओबामा प्रशासन से खराब रिश्ते होने के बावजूद ईरान परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभाई.
वहीं, रूस का अमरीकी राजनयिकों की संख्या में कमी करना तुलनात्मक रूप से नरम कार्रवाई है. रूस ने शायद ट्रंप प्रशासन के लिए दरवाजे खुले रखे हैं.
दूसरी बात ये है कि रूस का ट्रंप प्रशासन की क्षमताओं का गलत आकलन उसके लिए एक सबक है. एक कमजोर विदेश मंत्रालय और गैर-अनुभवी ट्रंप समर्थकों से भरे व्हाइट हाउस वाला अमरीका रूस के लिए अप्रत्याशित नजर आ रहा है.
और, जैसा कि पहले शीत युद्ध ने दिखाया था, ये अच्छी बात नहीं है.
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