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'न्याय की देवी' हटाई गई बांग्लादेश में
- Author, अमृता शर्मा
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के बाहर लगाई गई न्याय की देवी की प्रतीकात्मक मूर्ति महीनों के विरोध के बाद हटा ली गई है.
इस्लामी संगठन इस मूर्ति को 'गैर-इस्लामी' कह कर इसका विरोध कर रहे थे.
कई कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों ने इसका विरोध किया था. इसमें सबसे मुखर विरोध हिफाज़त-ए-इस्लाम संगठन की ओर से किया जा रहा था.
इसके अलावा जो दूसरे संगठन थे उनमें अवामी उलामा लीग, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश और जमात-शिविर शामिल थे.
यह मूर्ति पिछले साल दिसंबर के महीने में लगाई गई थी.
इसे बांग्लादेश के मशहूर कलाकार मृणाल हक़ ने तैयार किया था.
इसके बाद ढाका की सड़कों पर इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने इसका जोरदार विरोध किया था और मूर्ति हटाने की मांग कर रहे थे.
हिफाजत-ए-इस्लाम ने तो प्रधानमंत्री शेख हसीना और मुख्य न्यायधीश को इस बारे में याचिका भी दी थी.
उन्होंने इसमें मूर्ति को 'इस्लामी-विरोधी' बताया था.
यह पहली बार नहीं है जब बांग्लादेश में किसी मूर्ति को हटाना पड़ा है. साल 2008 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने सूफ़ी कवि लालोन शाह की मूर्ति भी ढाका एयरपोर्ट के सामने से गिरा दी थी.
इसी साल उन्होंने राष्ट्रीय एयरलाइन बालाका की प्रतिकात्मक मूर्ति के साथ भी तोड़-फोड़ की थी.
पिछले कुछ महीनों में देश में इस मसले पर तीखी बहस हो रही थी. दक्षिणपंथी और वामपंथी रुझानों वाले लोग साफ़ तौर पर बंटे हुए थे.
कट्टरपंथी संगठन हिफाजत-ए-इस्लाम देश में शरिया क़ानून लाने की वकालत करता है.
इस संगठन के ज्वाइंट सेक्रेटरी जुनैद अल हबीब ने अपना रूख रखते हुए कहा, "बांग्लादेश में 92 फ़ीसदी मुसलमान रहते हैं. इसलिए यहां देश की सबसे बड़ी अदालत में किसी मूर्ति का लगना बिल्कुल मंजूर करने लायक नहीं है."
इस्लामी पार्टी इस्लामी ओकया जोते के नेताओं का कहना है कि सार्वजनिक जगहों पर मूर्ति लगाना बांग्लादेश में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
उनका कहना है, "सिर्फ़ कुरान ही न्याय का प्रतीक है ना कि कोई दूसरी मूर्ति."
दूसरी ओर सिविल सोसायटी के कई सदस्यों और अधिकारियों ने मूर्ति गिराने की मांग का विरोध किया था.
एटॉर्नी जनरल महबूब आलम ने कहा, "इस्लामी दलों की यह मांग तर्कहीन और आधारहीन है."
पूर्व क़ानून मंत्री शफीक़ अहमद ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा है, "मज़हब के ख़िलाफ़ होने का यह तर्क आधारहीन है."
हालांकि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्लामवादियों का समर्थन किया है और कहा है, "सच बोलू तो मुझे भी यह पसंद नहीं है. यह एक ग्रीक मूर्ति है और एक ग्रीक मूर्ति का यहां क्या काम? इसके अलावा ग्रीक मूर्ति को साड़ी भी पहना दी गई. यह तो और भी हास्यपद है."
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