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'सेना की आलोचना करना बंद करें पाकिस्तानी'
पाकिस्तान सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ तनाव कम करने की कोशिश में देश की सरकार ने नागरिकों को चेतावनी दी है कि वो सोशल मीडिया पर सेना की आलोचना ना करें.
देश के गृह मंत्रालय ने कहा है कि कोई भी व्यक्ति ऐसा पोस्ट ना करे जिससे 'सेना की प्रतिष्ठा और उसके सम्मान का अपमान हो.'
इस चेतावनी के दो दिन पहले टीवी चैनलों को इस संबंध में आदेश जारी कर दिए गए थे.
एक प्रेस लीक के संबंध में प्रधानमंत्री कार्यालय की जांच रिपोर्ट को सेना ने ख़ारिज कर दिया था जिसके बाद सेना पर गणतंत्र का अपमान करने का आरोप लगया गया था.
मामला बीते साल अक्तूबर में हुए कथित "डॉन लीक" से जुड़ा है जब डॉन अखबार ने सरकार और सैन्य अधिकारियों के बीच तनाव के बारे में लिखा था.
क्या कहते हैं लोग?
हाल के दिनों में पाकिस्तान में कई लोगों ने सोशल मीडिया के ज़रिए सेना के आला अधिकारियों पर हमले किए हैं. इनमें से कइयों के निशाने पर नए सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा रहे हैं.
एक व्यक्ति ने पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ़ का चित्र ट्वीट किया और लिखा, "हम आपको मिस कर रहे हैं."
एक अन्य ट्वीट में लिखा था, "मैं सेना के साथ खड़ा होना चाहता हूं, लेकिन कोई मुझे बताए कि सेना कहां पर खड़ी है."
कई लोगों ने सेना की तरफ बदलते रवैए की बात की थी.
सैयद तलत हुसैन ने एक ट्वीट में लिखा "29 अप्रैल को रवैया था- बढ़िया काम किया जनरल बाजवा, आप हमारे आदमी है. 10 मई को रवैया था- आपने ये क्या कर दिया, आप हमारे आदमी नहीं हैं."
इस तरह की टिप्पणियों के बाद गृह मंत्रालय के चौधरी निसार अली ख़ान ने पाकिस्तान के कुछ लोगों पर "बिना कारण सोशल मीडिया पर सेना का अपमान करने और उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया."
उन्होंने चेतावनी दी है कि ये एक गंभीर अपराध है और ऐसा करने वालों के साथ "बेहद सख़्ती से पेश आया जाएगा."
उन्होंने कहा है कि "अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर" सेना या सेना के अधिकारियों का अपमान करना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
सेना को इससे कितना नुक़सान होगा?
इस्लामाबाद से बीबीसी संवाददाता एम इलियास ख़ान बताते हैं कि जिस दिन से डॉन ने सेना और सरकार के बीच तनाव की ख़बर दी, उस दिन के कई तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली. कई लोगों ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया तो कई ने कहा कि डॉन ने वही बताया जो दशकों से जनता की नज़र में था.
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि 1947 में आजादी के बाद से लगभग हमेशा ही देश में बड़े फ़ैसले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेना के अधीन ही रहे हैं.
राजनीतिक समूहों समेत समाज के एक वर्ग इस आधार पर इसकी पैरवी करते रहे हैं कि पाकिस्तान पर शासन करने वाली कई पार्टियों के नेता भ्रष्ट हैं और "राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा" हैं.
पिछले तीन सालों में सेना के जनसंपर्क शाखा, इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस यानी आईएसपीआर ने व्यापक तौर पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ़ को "एक रक्षक" के रूप में पेश करने की कोशिश की.
लेकिन 10 मई के बाद, आईएसपीआर के 29 अप्रैल के किए गए विवादास्पद ट्वीट वापस लेने के बाद, सेना के कई समर्थकों ने इसे सेना का आत्मसमर्पण कहा.
आईएसपीआर ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री कार्यालय के जारी आदेशों को "ख़ारिज" कर दिया था.
किसे मिलेगा इससे फ़ायदा?
पाकिस्तान में माना जाता है कि सेना सोशल मीडिया पर आलोचना को ले कर संवेदनशील है. सेना पर जनवरी में कई ऐसे उदारवादी ब्लॉगर्स को "अगवा करने" का आरोप है जिनके विचार सेना से मिलते नहीं थे.
इस मुद्दे पर सेना का कथित समर्थन करने वालों और न्यापालिका ने कुछ हलकों ने कुछ सोशल मीडिया पोस्ट को 'ईशनिंदा' से संबंधित मान कर सरकार पर इसे ब्लॉ़क करने के लिए दवाब बनाया.
इसकी तुलना में 'डॉन लीक' के विरोध में उठ रही आवाज़ें सीधे तौर पर सेना के विरोध करती नज़र आ रही हैं और किसी तरह के पोस्ट को ईशनिंदा बताते हुए ब्लॉक नहीं किया जा सकता.
मामले पर नज़र रखने वालों का मानना है कि 2007 में सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ द्वारा चीफ़ जस्टिस को बर्ख़ास्त किए जाने और साल 2011 में ऐबटाबाद में अमरीकी सेना द्वारा ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है.
हालांकि आलोचकों का कहना है कि वैध नागरिक सरकार का सेना सम्मान नहीं करती.
माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर सेना के "अपने कदम पीछे हटाने" का सीधा फ़ायदा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ की सरकार को पहुंचेगा. देश में अगले साल आम चुनाव हैं.
लेकिन मज़बूत सैन्य शासन वाले इस देश में इस तरह की आलोचना को जारी रहने देना सेना को पसंद नहीं आएगा.
मामले पर नज़र रखने वालों का मानना है कि हालांकि सेना ने 29 अप्रैल को किए ट्वीट "वापिस ले लिए" लेकिन ये अभी भी उसके मुख्य मीडिया अकाउंट पर मौजूद हैं.
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