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दुनिया के लिए ख़तरा हैं ट्रंप और किम जोंग-उन?
- Author, जोनाथन मार्कस
- पदनाम, राजनयिक संवाददाता
1964 में बनी फ़िल्म 'डॉ स्ट्रेन्ज लव ऑर: हाउ आई लर्न्ड टू स्टॉप वॉरिइंग एंड लव द बम' अब भी एक कॉमेडी क्लासिक है.
इस फ़िल्म में पीटर सेलर्स कई भूमिकाओं में एक साथ हैं. फ़िल्म को स्टैनली कुर्बिक ने निर्देशित किया है. इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह अमरीका और फिर बाद में सोवियत यूनियन शायद अनजाने में ही परमाणु युद्ध में शरीक होते गए.
जब पहली बार यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो यह वाकई बहुत सटीक कॉमेडी थी. तब लोग भी परमाणु हथियारों की होड़ और शीत युद्ध की छाया में रह रहे थे. उन ख़तरों को भूलना आसान नहीं है.
उन वर्षों में दोनों महाशक्तियों अमरीका और सोवियत यूनियन के बीच हथियारों पर नियंत्रण और अपनी परमाणु प्रतिद्वंद्विता को काबू में रखने के लिए कई समझौते हुए थे.
शीत युद्ध ख़त्म होने के बाद परमाणु हथियारों में कमी आई थी. ऐसा लग रहा था कि अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की तस्वीर बदल गई है. दोनों महाशक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता लंबे वक़्त तक नहीं रही लेकिन स्थानीय युद्ध देशों के बीच होता रहा.
आतंकवादी समूह अनियंत्रित इलाक़ों में अपनी मौजूदगी मजबूत करने में जुट गए ताकि वे अपने अभियानों को जारी रख सकें.
लेकिन अब जो परमाणु युद्ध के ख़तरे से आशंकित हैं वह फिर से सच होता दिख रहा है. अमरीका के ग़ैर-सरकारी संगठन ग्लोबल ज़ीरो को बिल्कुल ऐसा ही लगता है.
इस संगठन के साथ पूर्व प्रतिष्ठित ऑफिसर और मिलिटरी के लोग जुड़े हैं. ये दुनिया भर से परमाणु हथियारों को नष्ट करने के लिए अभियान चला रहे हैं.
शुक्रवार को विएना में इसे लेकर एक नए अभियान की शुरुआत हुई. इस अभियान को न्यूक्लियर क्राइसिस ग्रुप नाम दिया गया है. यह ग्रुप परमाणु हथियारों को लेकर प्रतिद्वंद्विता को कम करने की कोशिश करेगा.
ग्लोबल ज़ीरो के कार्यकारी निदेशक डेरेक जॉनसन ने मुझसे कहा, ''यूक्रेन और कोरियाई प्रायद्वीप से लेकर दक्षिण एशिया, दक्षिण चीन सागर और ताइवान तक सभी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं. ये आपस में उलझे हुए हैं और इनके बीच परमाणु युद्ध किसी भी क्षण हो सकता है.''
उन्होंने कहा, ''इन देशों के बीच लंबे समय से संकट गहरा रहा है लेकिन अब बिल्कुल शबाब पर है. अब तक दुनिया में इतने परमाणु हथियारों से लैस युद्ध की आशंका कभी नहीं रही.''
अमरीका और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ते तनाव पर भी ग्लोबल ज़ीरो की नज़र है. जॉनसन ने कहा, ''डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद मामला बिल्कुल नए स्तर पहुंच गया है. मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी अस्थिरता और ख़तरा को थोपा जा रहा है.''
ग्लोबल ज़ीरो का संदेश साफ़ है कि दुनिया को अस्थिरता और संकट में मत डालो. न्यू न्यूक्लियर क्राइसिस ग्रुप परमाणु ख़तरों की निगरानी करेगा. यह इस मामले में रिपोर्ट प्रकाशित करेगा ताकि लोगों की आंखें खुल सकें. इसके साथ ही यह ग्रुप, डिप्लोमेसी का भी सहारा लेगा ताकि अहम ताक़तों पर असर डाल सके.
एनसीजी के उपाध्यक्ष अमरीका के सम्मानित डिप्लोमेट और राजदूत रिचर्ड बर्ट के साथ थॉमस पिकरिंग हैं. इसमें पूर्व जनरल जेम्स ई कार्रटराइट भी हैं.
इस ग्रुप का कहना है कि इसके काडर कई अहम देशों के अनुभवी राजनयिक, राजनीतिक और सैन्य नेताओं के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ हैं. इन देशों में चीन, भारत, जापान, पाकिस्तान, पोलैंड, रूस, दक्षिण कोरिया और अमरीका शामिल हैं.
परमाणु हथियारों की होड़?
एनसीजी और ग्लोबल ज़ीरो परमाणु निरस्त्रीकरण लॉबी का ही हिस्सा हैं. हालांकि इस लॉबी का अब बहुत प्रभाव नहीं रह गया है. अभी एक नए शीत युद्ध की बात करना ग़लत होगा.
रूस और अमरीका के बीच संबंध बिल्कुल निचले स्तर पर है, लेकिन दोनों की स्थिति और क्षमता में काफ़ी बदलाव आया है. सीरिया में रूस के सैन्य साहस के बावजूद वह एक सोवियत संघ की छाया की तरह है.
फिर भी सीरिया में रूसी हस्तक्षेप से पता चलता है कि उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. दोनों देशों के बीच जब तनाव बढ़ता है तो इन्हें लगता है कि परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण की ज़रूरत है.
दरअसल रूस के सैन्य सिद्धांत में परमाणु हथियार का महत्व बढ़ रहा है. यह कम से कम पारंपरिक ताक़तों के बीच और पश्चिम में असंतुलन के कारण नहीं है.
परमाणु हथियारों को लेकर डोनल्ड ट्रंप का दृष्टिकोण भी साफ़ नहीं है. उन्होंने अपने परमाणु हथियार बढ़ाने को लेकर मजबूत बयान दिया है और इसके साथ ही शीत युद्ध के दौरान हथियारों में कटौती पर हुए समझौतों पर आशंका बनी हुई है.
हालांकि हथियारों पर नियंत्रण हमेशा से मुश्किल काम रहा है. पश्चिम में रूस को इंटरमीडिएट न्यूक्लियर फोर्सेज (आईएनएफ़) ट्रीटी तोड़ने के लिए जाना जाता है. इस समझौते ने पहली बार सभी श्रेणियों के परमाणु हथियारों को नष्ट किया था.
न्यू कन्वेंशनल लॉन्ग-रेंज स्ट्राइक सिस्टम के कारण शक्ति का संतुलन जटिल हो गया है. इराक़ से सद्दाम हुसैन और लीबिया से कर्नल गद्दाफी का ख़त्म होना उत्तर कोरियाई नेतृत्व के लिए एक कड़ा संदेश है कि आप सामूहिक विनाश के हथियारों को त्याग दें.
ईरान के साथ परमाणु समझौते पर ट्रंप प्रशासन के अविश्वास से भी तनाव बना हुआ है.
ऐस में ग्लोबल ज़ीरो का मानना है कि परमाणु निरस्त्रीकरण का एजेंडा फिर से प्रभाव में आना चाहिए. उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम में प्रगति से इस बात को और बल मिल रहा है.
ज़ाहिर है ट्रंप और किम जोंग-उन प्रशासन में कोई बराबरी नहीं है, लेकिन उत्तर कोरिया के अस्थिर और अप्रत्याशित नेतृत्व के साथ एक अनुभवहीन राष्ट्रपति जो मिलिटरी से मंत्रमुग्ध रहता है, हम सबके लिए ख़तरनाक है.
दो परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के बीच संघर्ष की आशंका अचानक से अब हक़ीक़त लगने लगी है. शायद 'डॉ स्ट्रेन्ज लव' फ़िल्म को फिर से देखना हमारे हक़ में होगा.
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