नज़रिया- क्या फ़्रांस की दक्षिणपंथी मरी ल पेन को होगा फ़ायदा?

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- Author, रणवीर नैयर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पेरिस से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
रविवार को फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के पहले चरण की पूरी तैयारी हो चुकी है. इस चुनाव में देश में डर और अनिश्चितता का माहौल बड़ी भूमिका निभा सकता है.
ऐसे हालात में धुर दक्षिणपंथी उम्मीदवार मरी ल पेन को फ़ायदा होने की भी पूरी संभावना दिख रही है. फ्रांस में 11 उम्मीदवार इस वक्त राष्ट्रपति पद की दौड़ में हैं.
गुरुवार को इस्लामिक स्टेट के संदिग्ध चरमपंथी की ओर से एक पुलिस अधिकारी की हत्या ने एक बार फिर से चरमपंथ और असुरक्षा के मुद्दे को केंद्र में ला दिया.
हालांकि कोई उम्मीदवार खुलकर इस घटना पर राजनीतिक रोटी सेंकने की कोशिश में नहीं लगा हुआ है.
हां, यह जरूर है कि फ्रांस के लोगों के ज़ेहन से यह मुद्दा पूरी तरह से गायब नहीं हुआ है फिर चाहे वो मतदाता हों, चुने गए प्रतिनिधि हों या फिर सरकारी महकमा.

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इस्लामिक स्टेट
पिछले दो सालों में फ्रांस में कई चरमपंथी घटनाएं हुई हैं. इसकी शुरुआत दो साल पहले फ्रेंच अख़बार 'शार्ली एब्दो' के दफ़्तर पर हुए हमले के साथ हुई थी. इस हमले में 17 लोग मारे गए थे.
तब से लेकर कुल 21 चरमपंथी हमले फ्रांस में हो चुके हैं. ये सभी हमले या तो इस्लामिक स्टेट से जुड़े रहे हैं या फिर उनकी ओर से इन हमलों को अंज़ाम देने का दावा किया जाता रहा है.
इसमें नवंबर 2015 में बाटाक्लान के एक थियेटर में हुआ हमला भी शामिल है. इस हमले में 137 लोगों की जान गई थी. मारे गए लोगों में सात चरमपंथी भी थे.
इसके अलावा 14 जुलाई 2016 को 'बास्तील डे' के दिन नीस में हुआ हमला भी इस सूची में शामिल है जब एक ट्रक ने पैदल यात्रियों को कुचल डाला था. इस हमले में 87 लोगों की जान गई थी.
फ्रांसीसी क्रांति के दौरान राजशाही के दमन का प्रतीक रहे बास्तील की जेल से इसी दिन राजनीतिक बंदियों को रिहा कराया गया था.

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दक्षिणपंथी दल
सुरक्षा को लेकर अनिश्चिता की स्थिति धुर दक्षिणपंथियों को फ़ायदा पहुंचाने वाली हो सकती है. सुरक्षा के मुद्दे पर बड़े पैमाने पर उन्हें वोटरों का समर्थन मिल सकता है.
धुर दक्षिणपंथी पार्टी 'नेशनल फ़्रंट' की नेता मरी ल पेन अपने चुनाव अभियान में चार मुद्दे उठा रही हैं. ये मुद्दे फ्रांस के अलावा दूसरे यूरोपीय देशों को लगातार परेशान किए हुए हैं.
चरमपंथ के अलावा अप्रवासियों की बड़े पैमाने पर आवाजाही का मुद्दा उनके एजेंडा में सबसे ऊपर है. आप्रवासियों के मुद्दों ने साल 2015 से यूरोपीय संघ के कई देशों में तहलका मचा दिया था.
और यह बहुत स्पष्ट है कि इससे मतदाताओं की सोच पर असर पड़ेगा. मरी ल पेन अनियंत्रित आप्रवासियों की संख्या बढ़ने और उसकी वजह से नीतियों पर पड़ने वाले असर और इससे यूरोपीय संघ के निर्णय प्रभावित होने का मुद्दा प्रमुखता से उठाती हैं.
वो 'फ्रांस को सारी मुसीबतों से बाहर निकालने' का दावा करती हैं. वो कहती हैं कि वो फ्रांस को 12 सदस्यीय यूरोज़ोन से बाहर निकालने का रास्ता बनाएंगी और फिर से फ्रेंच फ्रैंक बहाल करेंगी.

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फ़्रांस का फ़ायदा
मरी ल पेन ने अपने बयान में कहा है कि यूरोपीय संघ बहुत केंद्रीकृत हो चुका है और देश अपनी स्वायत्ता खो चुके हैं.
उनके इस बयान को मतदाताओं के बीच सराहा जा रहा है, खासकर उन इलाकों में जहां अप्रवासी आबादी अधिक है.
वो फ्रांस की एकमात्र प्रमुख राजनेता थीं जिन्होंने 'ब्रेक्सिट' का स्वागत किया था और 'ब्रेक्सिट' के तर्ज पर 'फ्रेक्सिट' का प्रस्ताव दिया था.
करीब 37 फ़ीसदी फ्रांसीसी ये मानते हैं कि यूरोपीय संघ ज़रूरत से ज़्यादा मज़बूत बन चुका है और यह फ्रांस के लिए ताकत से अधिक मुसीबत बन चुका है जबकि 31 फ़ीसदी फ्रांस के लोग यूरोपीय संघ को फ्रांस के लिए फ़ायदेमंद समझते हैं.
हालांकि फ्रांस के कई लोग मरी ल पेन के चुनाव अभियान को दहशत भरा बताते हैं. उनकी पार्टी नेशनल फ्रंट ने पूरे देश में 22-23 फ़ीसदी मतदाताओं के बीच अच्छी पैठ बना रखी है और वो इस जनाधार का इस्तेमाल ख़ुद को चुनाव में सबसे आगे रखने में करना चाह रही हैं.

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ओपिनियन पोल
उनके और एन मार्श के उम्मीदवार इमैनुएल मैक्रों के बीच कांटे की टक्कर है. आख़िरी ओपिनियन पोल में जहां इमैनुएल मैक्रों को 23 फ़ीसदी तो वहीं ल पेन को 22 फ़ीसदी लोगों ने पसंद किया है.
इमैनुएल मैक्रों कभी सांसद नहीं रहे हैं और ना ही कभी किसी चुनाव में खड़े हुए हैं. 2014 में वित्त मंत्री बनने से पहले वो राष्ट्रपति ओलांद के आर्थिक सलाहकार रहे हैं.
मरी ल पेन के मजबूत होने की एक वजह यह भी है कि अभी दोनों मुख्य विपक्षी दलों सोशलिस्ट पार्टी और दि रिपब्लिकन्स के उम्मीदवार कमजोर हैं.
दि रिपब्लिकन्स के उम्मीदवार फ्रांस्वा फ़ियो फ़्रांसुआं ओलांद से पहले राष्ट्रपति रहे निकोला सारकोज़ी के समय में फ्रांस के प्रधानमंत्री थे.
लेकिन तीन महीने पहले उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. इसके पहले तक वो काफी मजबूत उम्मीदवार माने जा रहे थे.

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राजनीतिक अस्तित्व
हालांकि फ्रांस्वा फ़ियो एक तरह से अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है. मैक्रों को ओपिनियन पोल में उनसे छह फ़ीसदी अधिक मत मिले हैं. इसका मतलब यह भी है कि फ्रांस्वा फ़ियो रविवार को होने वाले चुनाव में पहले ही राउंड में बाहर हो सकते हैं.
अगर ऐसा हुआ तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहली बार होगा जब फ्रांस के दोनों ही प्रमुख दल दूसरे राउंड के चुनाव में भी नहीं पहुंच पाएंगे.
हालांकि ओपिनियन पोल यह भी बताता है कि मरी ल पेन दूसरे दौर में हार सकती हैं. मरी ल पेन के आक्रमक चुनाव अभियान ने कुछ हद तक फ्रांस्वा फ़ियो और दूसरे उम्मीदवारों को अप्रवास और सुरक्षा के मुद्दे पर अधिक अतिवादी रुख अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है.
फ्रांस की राजनीति में जो एक बड़ा बदलाव दिख रहा है वो है धुर दक्षिणपंथी दल नेशनल फ्रंट का कई बड़े शहरों और औद्योगिक केंद्रों में सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरना है.
बेशक यह फ्रांस की संसद में उसे एक बहुत ही मजबूत स्थिति में ला सकता है.
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