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क्या अमरीका की बादशाहत ख़त्म कर देंगे पुतिन?
- Author, टिम ह्वील
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
रूस के साथ रिश्ते सुधारने की राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की तत्परता अमरीकी विदेश नीति में बुनियादी बदलाव का संकेत है.
रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से ट्रंप के खुलेपन से वॉशिंगटन में विदेश नीति से जुड़े अधिकांश प्रतिष्ठान निराश हैं.
अब इसी तरह की बात यूरोप के कुछ नेता भी करने लगे हैं. फ्रांस, इटली, हंगरी, चेक गणराज्य के नेता घोर दक्षिणपंथी नहीं हैं.
ये सभी क्रेमलिन के एजेंट भी नहीं हैं. ऐसे में सवाल यह है कि पश्चिम में पुतिन के प्रति इस आकर्षण का कारण क्या है.
दो नेता, एक अमरीकी और एक रूसी, शराब के गिलास को टेबल पर रखकर पंजा लड़ाते हैं.
यह कोई वास्तविक प्रतियोगिता नहीं है. मुक़ाबला कुछ सेकंड में ही ख़त्म हो जाता है. इसके विजेता हैं सेंट पीट्सबर्ग के डिप्टी मेयर.
इस व्यक्ति ने सालों-साल जूडो का प्रशिक्षण लेकर अपनी ताक़त बढ़ाई है. रूस के बाहर उन्हें कुछ लोग ही जानते हैं, लेकिन इस घटना के पांच साल बाद यह व्यक्ति रूस के राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठता है.
ब्लादिमीर पुतिन के साथ 1995 में हुए इस मुक़ाबले को याद कर अमरीकी कांग्रेस के नेता डेना रोअरबाकर हंस पड़ते हैं.
उस समय पुतिन एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ आए थे. उसके बाद से रोअरबाकर की पुतिन से मुलाक़ात नहीं हुई है.
लेकिन वे सालों से कैपिटॉल हिल में रूस के साथ रिश्ते सुधारने के पैरोकार बने हुए हैं.
वे कहते हैं, '' मैं पुतिन को एक अच्छा व्यक्ति नहीं मानता हूं. मैं उन्हें एक बुरे व्यक्ति के रूप में देखता हूं, लेकिन दुनिया का हर बुरा आदमी हमारा दुश्मन नहीं है. हमें इन आड़े-तिरछे रास्तों की पहचान कर उन्हें मिटाना चाहिए.''
वे कहते हैं कि यहां कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां हम अगर साथ-साथ काम करें तो एक बेहतर दुनिया बन सकती है.
रोअरबाकर मानते हैं कि रूस पश्चिम के दोहरे मानदण्ड का शिकार है.
ऐसे ही विचार कुछ पश्चिमी विशेषज्ञों के भी हैं. ब्रिटेन के केंट विश्वविद्यालय में रूसी और यूरोपियन राजनीति के प्रोफ़ेसर रिचर्ड साकवा अल्पमत वाले खेमे में हैं.
वो कहते हैं, ''हम ऐसे इको चैंबर में रह रहे हैं जो कि केवल अपनी ही आवाज़ सुनता है. जब हमारे राष्ट्रीय हित में हो तो अच्छी बात है, लेकिन जब रूस अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की कोशिश करता है तो वह अवैध हो जाता है, उसे आक्रामक माना जाता है.''
रूस ने 2014 में क्रीमिया को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था और यूक्रेन के अलगाववादियों को सैन्य सहायता दी थी.
दुनिया ने इसे रूस की सीमाओं का विस्तार करने की पुतिन की कोशिश के रूप में देखा था.
लेकिन प्रोफ़ेसर साकवा यूक्रेन संकट को शीतयुद्ध के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की नाकामी के रूप में देखते हैं. इस तंत्र में रूस को शामिल किया जाना चाहिए.
प्रोफ़ेसर स्टीफ़न कोहेन न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के रूसी अध्ययन केंद्र से रिटायर हुए हैं.
वे कहते हैं, ''पश्चिम की दुनिया में राष्ट्रपति पुतिन के तिरस्कार की वजह दरअसल उनके पूर्ववर्ती बोरिस येल्तसिन के सुधारों से पुतिन के मुंह मोड़ लेने की वजह से पैदा हुई निराशा है. कुछ रूसी उस समय की ख़राब क़ानून व्यवस्था और गिरते जीवनस्तर का श्रेय इन सुधारों को देते हैं.''
कोहेन कहते हैं, ''पुतिन एक यूरोपीय व्यक्ति हैं. वो एक ऐसे देश पर शासन की कोशिश कर रहे हैं जो कि आंशिक रूप से ही यूरोपीय है.''
रूस से संबंध सुधारने की मांग करने वाले प्रोफ़ेसर कोहेन गिने-चुने उदार लोगों में से एक हैं, लेकिन रूस के साथ संबंध सुधारना चाहने वाले अधिकांश अमरीकी राजनीतिक रूप से सही हैं.
सोवियत संघ का हिस्सा रहे पूर्वी यूरोप के अधिकांश देश शीत युद्ध के बाद नेटो और यूरोपीय यूनियन में शामिल हो गए.
इन देशों के कुछ पूर्व और वर्तमान नेताओं ने ट्रंप को चेताया है कि पुतिन के साथ किसी बड़े समझौते की कोशिश क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा होगी.
लेकिन मध्य यूरोप के देश हंगरी की सरकार ने अलग नज़रिया अपनाया है. उसके विदेश मंत्री पीटर शिआटो कहते हैं, ''हम रूस को हंगरी के लिए ख़तरे के रूप में नहीं देखते हैं.''
वे कहते हैं, ''वैश्विक मामलों पर अगर रूस और अमरीका मिलकर काम नहीं करते हैं तो वो पूर्वी यूरोप में सुरक्षा को कमज़ोर करेंगे.''
हंगरी चाहता है कि क्रीमिया पर कब़्जे के बाद रूस पर लगाए गई पश्चिमी पाबंदियां हटाई जाएं.
लोकतांत्रिक मूल्यों पर कुछ पाबंदिया लगाने और रूस के साथ संबंधों की वजह से हंगरी की सरकार की आलोचना हो रही है.
हंगरी के प्रधानमंत्री ने कहा है कि यूरोप को मुस्लिम देशों से होने वाले आप्रवासन के मामले में अपने ईसाई मूल्यों को बनाए रखना चाहिए.
रूस ने भी अपनी राष्ट्रीय पहचान और ईसाई मूल्यों को बनाए रखने के लिए काफी कुछ किया है. पश्चिम में बढ़ते राष्ट्रवाद को रूस के एक सहयोगी के रूप में देखा जा रहा है.
बहुत से दक्षिणपंथियों का मानना है कि बड़े पैमाने पर हो रहा आप्रवासन और आतंकवाद रूस से बड़ा ख़तरा है.
रोअरबाकर कहते हैं, ''ऐसे समय जब कट्टरपंथी इस्लाम से रूस को भी ख़तरा है, उसे दुश्मन कहना ग़लत रास्ता है.''