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डोनल्ड ट्रंप: लगता है कि अदालतें भी सियासी हो गई हैं
अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपने उस विवादास्पद आदेश का बचाव किया है जिसमें उन्होंने मुस्लिम बहुल सात देशों के निवासियों के अमरीका आने पर पाबंदी लगाई है.
अमरीका की एक अदालत ने इस प्रतिबंध पर रोक लगा दी है.
अदालत के फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए संघीय अपील अदालत में सुनवाई हो रही है जहां न्यायाधीशों ने सवाल किया है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाया गया यात्रा प्रतिबंध केवल मुसलमानों के ख़िलाफ़ है?
पुलिस प्रमुखों की एक बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने संघीय अपील अदालत में इस यात्रा प्रतिबंध पर पुनर्विचार की सुनवाई को शर्मनाक करार दिया और कहा कि ऐसा राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि लगता है कि अदालतें भी सियासी हो गई हैं और बेहतर होता कि वो बयानों को पढ़ते और वो करते जो सही है.
उनका कहना था कि विदेशियों के अमरीका आने पर प्रतिबंध लगाने का उन्हें जो क़ानूनी अधिकार है और वह इतना स्पष्ट है कि एक हाई स्कूल के छात्र को भी यह समझना मुश्किल नहीं होगा.
इस बीच, अमरीकी अपील कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के विवादित यात्रा प्रतिबंध का बचाव करने वाले और उसे चुनौती देने वालों से कड़े सवाल पूछे हैं.
जजों के तीखे सवाल
तीन जजों के एक पैनल ने राष्ट्रपति की ताक़त को सीमित करने और सात देशों को आतकंवाद से जोड़ने पर सबूतों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं. कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या इस फ़ैसले को मुस्लिम-विरोधी नहीं देखा जाना चाहिए. उम्मीद की जा रही है कि इस हफ़्ते सैन फ्रांसिस्को के नौवें अमरीकी सर्किट कोर्ट तरफ से किसी भी दिन इस पर कोई फ़ैसला आएगा.
निर्णय चाहे जो भी हो पर ऐसा लग रहा है कि इस केस का निपटारा शायद सुप्रीम कोर्ट में ही होगा. मंगलवार को दोनों तरफ से इस मसले पर एक घंटे तक बहस हुई. इस केस में अमरीकी न्याय मंत्रालय भी शामिल है और उसने जजों से ट्रंप के प्रतिबंध आदेश को फिर से बहाल करने की अपील की है.
वक़ील ऑगस्ट फ्लेत्जे ने कहा कि देश में कौन आए और कौन नहीं आए इस पर नियंत्रण रखने के लिए कांग्रेस ने राष्ट्रपति को अधिकार दिया है.
उनसे उन सात देशों- इराक, ईरान लीबिया, सोमालिया, सूडान, सीरिया और यमन को लेकर पूछा गया कि ये देश फिलहाल अमरीका के लिए कैसे ख़तरा हैं. इस पर उन्होंने कहा कि अमरीका में कई सोमालियों के संबंध अल-शबाब ग्रुप से है.
इसके बाद वॉशिंगटन प्रांत के एक वक़ील ने कोर्ट से कहा कि ट्रंप के कार्यकारी आदेश पर रोक से अमरीकी सरकार को कोई नुक़सान नहीं होगा. सॉलिसिटर जनरल नोआह पर्सेल ने कहा कि प्रतिबंध से उनके प्रांत के हज़ारो निवासी प्रभावित होंगे. जो छात्र वॉशिंगटन आने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें भी बेमतलब की देरी का सामना करना होगा. इसके साथ ही अन्य लोग अपने परिवारों से मिलने अमरीका छोड़कर जाने से बचेंगे.
क्या यह मुस्लिम पर प्रतिबंध है या नहीं?
सुनवाई के आख़िरी मिनटों में इस बात पर बहस हुई कि अगर यह प्रतिबंध मुस्लिमों को रोकने के लिए है तो यह असंवैधानिक होगा. जज रिचर्ड क्लिफ्टन ने दोनों पक्षों से इस मुद्दे पर पूछा कि इससे दुनिया के केवल 15 प्रतिशत मुसलमान प्रभावित होंगे.
सोमवार की रात अमरीकी जस्टिस डिपार्टमेंट की तरफ से जारी 15 पन्नों के एक दस्तावेज़ में बताया गया है कि ट्रंप का यह कार्यकारी आदेश बिल्कुल निष्पक्ष है और इसका किसी ख़ास धर्म से कोर्ई संबंध नहीं है.
हालांकि मंगलवार को कोर्ट में पर्सेल ने ट्रंप के चुनावी कैंपेन के दौरान के बयानों का हवाला दिया. तब ट्रंप ने ग़ैरअमरीकी मुस्लिमों पर अस्थायी रूप से प्रतिबंध लगाने की बात कही थी.
पर्सेल ने राष्ट्रपति के सलाहकार रुडी जुलियानी के बयान का भी उल्लेख किया. जुलियानी ने कहा था कि उन्होंने मुस्लिमों को अमरीका में काम करने पर क़ानूनन प्रतिबंध के लिए कहा है.
क्लिफ्टन ने भी कहा कि जिन सात देशों पर प्रतिबंध लगाया गया है उनकी शिनाख्त पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन और कांग्रेस ने भी आतंक के डर के कारण वीज़ा पाबंदी के लिए की थी. उन्होंन कहा, ''क्या आप यह भी मानते हैं कि पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन और कांग्रेस के फ़ैसले भी धार्मिक पूर्वाग्रह से प्रेरित थे?
इस पर पर्सेल ने कहा, ''नहीं, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने पूर्ण प्रतिबंध की बात कही थी. हालांकि यह पूर्ण प्रतिबंध नहीं है और यह भेदभावपूर्ण है.''
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