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बुर्के और नक़ाब ने आईएस से बचाया
कथित इस्लामिक स्टेट ने जब मूसल शहर के नजदीकी इलाकों को कब्ज़े में लिया और वहां पुलिस अधिकारियों को मारना शुरू किया तो बचने के लिए पुलिस वाले बुर्क़ा पहन कर भागे.
करीब ढाई साल से ज़्यादा वक्त तक पुलिस अधिकारी अबू अलावी ने खुद को बचाने के लिए नक़ाब का सहारा लिया. उनके कई साथी इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों की गोलियों या चाकुओं का शिकार बन गये.
साल 2014 के मध्य में उनके गृहनगर हम्मान अल अलील में जब चरमपंथी आए तो उन्होंने सबसे पहला काम ये किया कि पुलिस और सेना के अधिकारियों को मारना शुरू किया.
चरमपंथियों ने बड़े अधिकारियों को तो तुरंत मार दिया लेकिन बाकियों को छोड़ दिया. शर्त ये रखी कि वो इराक़ी सरकार के प्रति निष्ठा छोड़ें और इस्लामिक स्टेट के शासन में रहने की शपथ लें.
अबू अलावी छिपे रहे. पहले तो अपने घर या फिर बगीचे में बनी एक बंकर में. बाद में जब इस्लामिक स्टेट की तलाशी तेज हुई तो उन्हें लगा कि यहां रुकना ठीक नहीं.
बाहर जान का खतरा था तो उन्होंने नक़ाब पहनने की सोची. काले रंग की नक़ाब पहनना आईएस के लड़ाके अपने अधीन इलाक़ों में सभी महिलाओं के लिए जरूरी बना देते हैं. तब से वो लगातार इसी नक़ाब के जरिए खुद को आईएस की नज़रों मे आने से बचाते रहे. उनका एक दोस्त उन्हें तलाशी अभियानों की जानकारी दे देता और वो अपनी नक़ाब में अपना चेहरा छिपा कर एक महिला के रूप में किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाते.
आईएस को धोखा देना थोड़ा रोमांचित करने वाला जरूर था लेकिन महिला बन कर चरमपंथियों के बगल से जब गुजरना होता तो सिहरन होने लगती. उनके कुछ साथी बदकिस्मत भी रहे जो छिपने की कोशिश में नाकाम रहे और या तो मारे गए या फिर गिरफ़्तार कर लिए गए.
अबू अलावी कहते हैं, "कई बार वो मेरे बिल्कुल करीब आ गए और मैं बहुत डर गया मेरी धड़कन तेज़ हो गई. हर वक्त मैं यहीं सोचता रहा कि मेरी भी तलाशी होगी और मैं पकड़ा जाऊँगा."
हम्माम-अल-अलील एक पुराना शहर है जो अपने हम्मामों के लिए विख्यात रहा है. गर्म झरनों और स्नान से उपचार वाले हम्माम के लिए यहां बड़ी संख्या में सैलानी आते थे लेकिन इन दिनों तो कोई नहीं आता. अबू अलावी से मेरी मुलाक़ात यहीं हुई. वो एक समाजसेवी संस्था के जरिए बांटे जाने वाले कंबल और सोलर हीटर का इंतज़ार कर रहे थे.
मुझे बताया गया कि आईएस के आने के बाद उन्होंने शहर के मुख्य चौराहे पर पूर्व अधिकारियों को जमा किया, उनकी आंखों पर पट्टी बांध कर उन्हें ट्रक में लादा और शहर से बाहर ले जा कर या तो गोली मार दी या फिर सिर काट लिया.
पुलिस मुझे एक सामूहिक कब्र पर ले गई जो कभी पुलिस की एक पुरानी शूटिंग रेंज थी. वहां से आ रही तेज बदबू से पहले ही पता चल गया कि यहां क्या कुछ हुआ होगा.
उसके बाद मक्खियों का हुजूम, इन्हीं सब के बीच बच्चों के खिलौने, खाना पैक करने वाली थैलियां, और एक सड़ा गला शव नज़र आया जिसके हांथ और पांव बंधे थे और जिस्म जुल्मों के निशान से भरे थे.
हमारे साथ गए सुरक्षाकर्मी ने हाथों के इशारे से बताया, इसके नीचे सारे शव पड़े हैं. उसके मुताबिक कम से कम 350 लोगों को यहां दफ़न किया गया है.
मदद पाने वालों की कतार में अबू अली नाम का एक और पुलिस अधिकारी नजर आया जो अबू अलावी की तुलना में युवा, लंबा और पतला-दुबला था. उसने पुलिस का पुराना पहचान पत्र भी दिखाया. जब आईएस के लोग यहां थे तब वो अपने बगीचे की बंकर में छिपा रहा. नरसंहार से बचने के लिए उसने भी नक़ाब का सहारा लिया.
अबू अली ने बताया, "मैंने सब किसी तरह खुद को छिपाये रखा और इस तरह के नक़ाब पहनता रहा."
अली का भाई भी पुलिस अधिकारी था लेकिन वो खुद को नहीं बचा सका. आईएस के लड़ाके जब हम्माम अल अली से गए तो अबू अली के पिता को मानव कवच के रूप में इस्तेमाल करने के लिए अपने साथ ले गए.
यह कोई अनोखी कहानी नहीं है. शहर में जिससे भी मेरी बात हुई उन सबने या तो पूरे परिवार या फिर किसी ना किसी सदस्य को खोया है. एक युवा लड़ाके ने बताया कि आईएस ने उसके मां बाप को मार दिया और सात भाइयों की या तो हत्या कर दी या फिर उन्हें क़ैद कर लिया.
हालांकि अब यहां धीरे धीरे ज़िंदगी सामान्य होने लगी है. तिगरिस नदी के पास एक हम्माम में कुछ बच्चे और सैनिक गर्म पानी में खेल रहे हैं. शायद ये ज़ख़्मों के भरने की शुरूआत है लेकिन आईएस के क़ब्ज़े ने जो निशान छोड़े हैं उनके धुंधले होने में वक्त लगेगा.
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