'ट्रंप के भक्तों' के अच्छे दिन आए

    • Author, ब्रजेश उपाध्याय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन

अमरीकी चुनाव प्रचार के दौरान जब डोनल्ड ट्रंप के सितारे बिल्कुल गर्दिश में नज़र आ रहे थे, तो भारतीय मूल के एक उद्योगपति शलभ "शल्ली" कुमार ने उन्हें लगभग दस लाख डॉलर का चंदा देने का एलान करके सनसनी फैला दी थी.

कुछ उनका मज़ाक उड़ा रहे थे, कुछ इसे पैसे को पानी में डालने जैसा बता रहे थे और ट्रंप की जीत के उनके दावों को शायद ही कोई गंभीरता से ले रहा था.

आज शलभ कुमार वाशिंगटन डीसी और न्यूयॉर्क में बहुतों के चहेते बने हुए हैं और ट्रंप प्रशासन में नौकरी की ख़्वाहिश रखनेवाले कई उनके पीछे बायोडेटा लेकर भाग रहे हैं. ख़बर ये भी है कि भारतीय दूतावास भी ट्रंप टीम के साथ संपर्क बढ़ाने के लिए उनकी मदद ले रही है.

भारतीय टीवी चैनल एनडीटीवी ने अपने शो पर उनका परिचय कुछ इन शब्दों में करवाया: "वो शख़्स जिनके तार सीधे ट्रंप से जुड़े हैं." भारतीय प्रवासियों के बारे में लिखनेवाली अमरीका स्थित वेबसाइट दी अमेरिकन बाज़ार ने उन्हें वाशिंगटन का "सबसे प्रभावशाली भारतीय-अमरीकी पावर-ब्रोकर" क़रार दिया.

और शलभ कुमार को भी ये नया सेलिब्रिटी स्टेटस काफ़ी रास आ रहा है.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं दोनों ही पक्षों के बीच पुल का काम करना चाहूंगा और मैंने भारतीय अधिकारियों की ट्रंप टीम के कुछ बड़े नामों के साथ दो मुलाक़ातें करवाई हैं."

दक्षिण एशियाई मूल के ज़्यादातर लोग पारंपरिक रूप से डेमोक्रेट्स का साथ देते रहे हैं और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ट्रंप के बयानों की वजह वो उनसे और दूर ही नज़र आ रहे थे.

लेकिन शलभ कुमार ने अपनी ट्विटर टाइमलाइन पर सबसे ऊपर रखे ट्वीट में दावा किया है कि उन्होंने 65 प्रतिशत हिंदुओं को ट्रंप को वोट देने के लिए राज़ी किया.

कुछ और भी हैं जिनके सितारे ट्रंप की जीत के बाद बुलंदी पर हैं.

पाकिस्तानी मूल के अमरीकी साजिद तरार और उनके दोस्त जसदीप सिंह (जो भारतीय मूल के सिख-अमरीकी हैं) ने ट्रंप का साथ देने का तब एलान किया था जब वो मुसलमानों के ख़िलाफ़ आग उगल रहे थे.

यहां के मुसलमान और सिख समुदाय ने इन दोनों को काफ़ी कोसा था. आज इन दोनों की ख़ासी पूछ हो रही है. वो भी तब जबकि अंदाज़ा है कि 90 प्रतिशत मुसलमानों ने हिलेरी क्लिंटन को वोट दिया है.

साजिद तरार को फ़ेसबुक मैसेंजर्स पर "पाकिस्तान और इस्लाम के नाम पर धब्बा" क़रार दिया जा रहा था.

लेकिन ट्रंप की जीत की सुबह उनके फ़ोन और मैसेंजर पर ट्रंप की जीत पर 80 से ज़्यादा बधाई संदेश थे जिनमें लोग ये भी कह रहे थे कि तरार के पाकिस्तानी होने पर "उन्हें नाज़ है".

उनका कहना है कि वाशिंगटन स्थित पाकिस्तानी दूतावास ने उन्हें फ़ोन करके प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की डोनल्ड ट्रंप से बातचीत करवाने में मदद मांगी.

साजिद तरार कहते हैं, "मैंने कुछ लोगों को ईमेल्स भेजे और ट्रंप और नवाज़ शरीफ़ की बातचीत हो गई. बाद में एम्बैसडर ने मेरा शुक्रिया अदा करने के लिए फ़ोन भी किया."

जसदीप सिंह कहते हैं कि ट्रंप का साथ देने की वजह से उन्हें बहुतों ने "ग़द्दार" कहा, गुरूद्वारों में भी उनपर निजी हमले किए गए.

वो कहते हैं, "मुझे पक्का यक़ीन था कि ट्रंप की जीत होगी. और मुझे ये भी एहसास था कि जब वो जीतेंगे तो सिख क़ौम उनके रडार पर कहीं नहीं होगी. इसलिए सबकुछ के बावजूद मैं डटा रहा."

तरार और सिंह दोनों ही को ट्रंप के उद्घाटन समारोह के दौरान नेशनल कैथेड्रल में होनेवाली प्रार्थना सभा में बोलने को कहा गया है जो यहां एक बड़े सम्मान के तौर पर देखा जाता है.

वहीं शलभ कुमार उद्घाटन समारोह से ठीक एक दिन पहले नेशनल मॉल पर बॉलीवुड का शो करवा रहे हैं.

ट्रंप का चुनावी अभियान एक तरह से सिर्फ़ गोरे अमरीकी वोटरों पर निर्भर था और बहुत लोगों का मानना है कि शलभ कुमार, साजिद तरार और जसदीप सिंह जैसे समर्थकों की भूमिका ये दिखाने भर की थी कि ट्रंप सिर्फ़ गोरों के बीच नहीं बल्कि हरेक क़ौम के बीच लोकप्रिय हैं.

तो क्या आनेवाले दिनों में भी ट्रंप के अमरीका में इनकी भूमिका होगी?

शलभ कुमार कहते हैं कि वो भारत और अमरीका के बीच व्यापार को सौ अरब डॉलर से बढ़ाकर तीन सौ अरब डॉलर तक ले जाने के लिए काम कर रहे हैं.

उनका कहना था, "हम एक ऐसी योजना पर भी काम कर रहे हैं जिससे अमरीका में दस लाख और भारत में सत्तर से अस्सी लाख नौकरियां पैदा होंगी."

ट्रंप की जीत के बाद से वो भारत के तीन दौरे कर चुके हैं.

सबसे हाल के दौरे के बाद उन्होंने ट्विटर पर बाबा रामदेव के साथ एक तस्वीर डाली जिसमें अमरीका में योग से जुड़ी एक लाख नौकरियां पैदा करने की संभावनाओं का ज़िक्र है. उस ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप को भी टैग किया गया है.

रिपब्लिकन हिंदू कोलिशन का गठन करनेवाले कुमार कहते रहे हैं कि वो "नीति निर्धारण में हिंदू-अमरीकियों का पक्ष रखने के लिए" काम कर रहे हैं.

तो क्या वो प्रशासन में भी कोई भूमिका चाहेंगे?

उनका कहना है, "पिछले 44 सालों में मैंने किसी बॉस के लिए काम नहीं किया है. लेकिन अगर मैं कुछ मदद कर सका तो मुझे खुशी होगी."

उनका कहना था कि किस पद में उनकी रुचि है फ़िलहाल ये कहना जल्दबाज़ी होगी लेकिन थोड़ा ज़ोर डालने पर भारत में अमरीका के दूत या फिर वाणिज्य मंत्रालय में किसी अहम ओहदे की तरफ़ झुकाव से उन्होंने इनकार नहीं किया.

साजिद तरार की ख़्वाहिश है कि वो विदेश विभाग में मुसलमान कौ़म के दूत या फिर ओआईसी (Organisation of Islamic Cooperation) के विशेष दूत के तौर पर काम कर सकें.

लेकिन साथ ही ये भी कहते हैं, "मेरा बिज़नेस मुझे इतना व्यस्त रखता है कि अगर ये पोस्ट नहीं भी मिला तो आसमान नहीं फटने जा रहा."

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