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डोनल्ड ट्रंप के जीतने की 5 वजह
- Author, एंथनी ज़र्कर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल भर पहले राष्ट्रपति चुनावों का अभियान शुरू करने से लेकर आज जीत से साथ अमरीकी इतिहास बदलने तक, डोनल्ड ट्रंप ने हर बार उम्मीदों और संभावनाओं को ग़लत साबित किया है.
कम ही लोग मान रहे थे कि वो इस दौड़ में शामिल हो पाएंगे, वो हुए. कम ही लोग मान रहे थे कि वो प्राइमरी जीतेंगे, वो जीते.
कम ही लोग मान रहे थे कि वो रिपब्लिकन नॉमिनेशन तक पहुंचेंगे, वो पहुंचें और कम ही लोग मान रहे थे कि वो अंतिम मुक़ाबला जीत पाएंगे, लेकिन वो जीते और दुनिया को हैरान कर दिया.
ट्रंप की जीत को हालिया अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर माना जा रहा है. उन्होंने ये उलटफेर कैसे किया, ये रहीं पांच वजह:
सफ़ेद क्रांति
ओहायो, फ़्लोरिडा और नॉर्थ कैरोलाइना, एक के बाद एक, सारे अहम राज्य डोनल्ड ट्रंप के खाते में गए. इस वजह से हिलेरी क्लिंटन के क़िले की दीवार ढहती चली गई.
डेमोक्रेट्स मिडवेस्ट में मज़बूती की उम्मीद कर रहे थे. ये वो राज्य हैं, जो दशकों से उन्हें वोट दे रहे हैं. और समर्थन मिल रहा था कामकाजी गोरे लोगों से. लेकिन इस बार उन्होंने पार्टी का साथ छोड़ दिया.
ग्रामीण मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट डाले, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि अमरीकी प्रशासन उस तबक़े को नज़रअंदाज़ कर रहा है.
हिलेरी भले कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क और यूटा में बढ़िया प्रदर्शन के बूते पॉपुलर वोट जीतने में कामयाब रहें, लेकिन ट्रंप ने वहां जीत दर्ज की, जहां सबसे ज़्यादा ज़रूरी था.
बुलेटप्रूफ डोनल्ड
ट्रंप ने वॉर वेटरन जॉन मैक्केन का अपमान किया. फॉक्स न्यूज़ और उसके प्रेज़ेंटर मेगिन केली से लड़े. महिलाओं के बारे में विवादित टिप्पणी करने पर जब बवाल मचा, तो उन्होंने आधी-अधूरी सी माफ़ी मांगी.
प्रेसिडेंशियल डिबेट में गड़बड़ भी की. लेकिन किसी से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. उन पर हमले होते रहे और वो मज़बूत होते गए.
शायद विवाद इतने जल्दी-जल्दी सामने आए कि किसी एक का भी असर नहीं हुआ. उनकी शख़्सियत इतनी ताक़तवर साबित हुई कि हर स्कैंडल का नुक़सान होने के बजाय उन्हें फ़ायदा ही हुआ. वजह जो भी हो, वो बुलेटप्रूफ़ पहने दिखे.
बाहरी का तमग़ा
वो डेमोक्रेट के ख़िलाफ़ लड़े. अपनी ही पार्टी के भीतर की ताक़तों से भिड़े. और उन सभी को हराकर भी दिखाया.
मार्को रुबियो, टेड क्रूज़, क्रिस क्रिस्टी और बेन कार्सन ने उनके सामने घुटने टेक दिए. बर्नी सैंडर्स और टेड क्रूज़ भी पीछे छूट गए. कोई नाम कितना भी बड़ा या असरदार हो, लेकिन आख़िरकार ट्रंप ने सभी को पीछे छोड़ दिया.
ट्रंप को इनमें से किसी की मदद की ज़रूरत नहीं पड़ी. बल्कि, वो शायद इसलिए जीते क्योंकि इन दिग्गजों के ख़िलाफ़ वो खड़े हुए.
वो सियासत के इन गलियारों में बाहर से आए थे, लेकिन अपने फ़ॉर्मूले से उन सभी को दिग्गजों को पछाड़ने में कामयाब रहे.
कोमी का मामला
एफ़बीआई के निदेशक जेम्स कोमी का नाम भी बार-बार इन चुनावों में ख़ूब सुनाई दिया. हिलेरी क्लिंटन के निजी ईमेल सर्वर के इस्तेमाल से जुड़े मामले में जांच फिर खोलने से जुड़ा उनके बयान ने शायद काफ़ी अंतर पैदा कर दिया.
इस बार अमरीका में भी पोल बेहद ग़लत साबित हुए. हालांकि, अभियान के अंतिम दिनों में हक़ीक़त ये थी कि पोल भी ट्रंप की जीत का अंदाज़ा लगाने लगे थे.
हिलेरी क्लिंटन के निजी ईमेल सर्वर के इस्तेमाल से जुड़े मामले में जांच फिर खोलने से जुड़े कोमी के बयान से पहले तस्वीर इतनी साफ़ नहीं थी. ये सच है कि पोल में मुक़ाबला कड़ा होता जा रहा था, लेकिन ट्रंप की उम्मीदों में सबसे बड़ा उछाल कोमी के पहली और दूसरी चिट्ठी जारी होने के बीच आया.
ऐसा लगता है कि इसी अवधि में ट्रंप ने अपने आधार को मज़बूती दी. अगर हिलेरी ने सरकारी मेल के लिए सरकारी सर्वर इस्तेमाल किया होता, तो कोमी के पत्र का कोई असर नहीं पड़ता. सो, ये ज़िम्मा हिलेरी का ही था.
ख़ास अंदाज़
ट्रंप ने अब तक का सबसे अनोखा और अलग तरह का अभियान चलाया. वो पूरी तरह अलग था, लेकिन कामयाब रहा. डोनल्ड ट्रंप ने अब तक का सबसे नायाब सियासी अभियान चलाया, लेकिन वो सभी जानकारों की राय से बेहतर साबित हुआ. उन्होंने पोल के ज़्यादातर विशेषज्ञों से बेहतर रणनीति अपनाई.
घर-घर जाने के बजाय उन्होंने विशाल रैलियों पर दांव लगाया. हिलेरी क्लिंटन की तुलना में उन्होंने ख़र्च भी कम किया. जीत के पारंपरिक तरीक़ों से ज़्यादा ध्यान उन्होंने जीत पर लगाया.
ट्रंप और उनके क़रीबियों की रणनीति कामयाब साबित हुई और इस जीत के इनाम में उन्हें व्हाइट हाउस मिलेगा.