आख़िर कौन है दलितों का ख़ैरख़्वाह?

- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चुनावी गहमागहमी में दलित भी अपने मुद्दे तलाश रहे हैं. साथ ही वो दो बड़ी पार्टियों के नेताओं को भी परख रहे हैं.
नागपुर यूनिवर्सिटी के अंबेडकर विचारधारा विभाग में पढ़ने वाले कुशल आवड़े कहते हैं कि बाक़ी युवाओं की तरह दलितों के लिए भी सबसे बड़ा मुद्दा बेरोज़गारी है, पर भेदभाव की वजह से दलितों के लिए यह समस्या कहीं बड़ी हो जाती है.
वे कहते हैं, “मैंने 2012 में एमबीए किया. मेरी क्लास में सामान्य वर्ग के लगभग 50 फ़ीसदी छात्रों को नौकरी मिल चुकी है, जबकि दलित छात्रों में यह तादाद एक से दो फ़ीसदी है. शिक्षा सबको एक जैसी मिली, मगर नौकरी नहीं.”
वहीं इस विभाग में पढ़ने वाली नलिनी भोये रामटेके कहती हैं कि निजीकरण के आने से दलितों की समस्याएं और बढ़ी हैं. वो इसे ‘सॉफ़िस्टिकेटेड’ यानी परिष्कृत भेदभाव का नाम देती हैं.
वो कहती हैं कि सरकारी विभागों में तो दलितों के प्रतिनिधित्व को आरक्षण के ज़रिए सुनिश्चित किया जाता है लेकिन निजी क्षेत्र में ऐसी कोई मजबूरी नहीं है.
कई दलितों का कहना है कि शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निजीकरण की दलितों पर सीधी मार पड़ रही है.
निजीकरण की बहस
रिटायर्ड अध्यापक भीमसेन देठे कहते हैं, “दलितों की शैक्षिक समस्याएं बड़ी तेज़ी से उभरकर सामने आ रही है. अच्छी शिक्षा के लिए आज बड़ी रक़म ख़र्च करनी पड़ती है और दलितों के पास इतना पैसा है नहीं. अब जिसके पास होगा, उसी के बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलेगी.”
भारत में दलित उत्थान में आरक्षण की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन वामपंथी कार्यकर्ता सुभाष थोरा कहते हैं कि इसका फ़ायदा अभी कुछ ही दलितों को मिल पाया है, जबकि ज़्यादातर लोग तो अब भी खेतों में मज़दूरी कर पेट पालने को मजबूर हैं.
वो कहते हैं, “आरक्षण के सवाल पर दलितों में आज क्रीमी लेयर के मुद्दे को बड़े ही ज़ोर-शोर से उठाया जाता है, लेकिन ये मुद्दा तो सिर्फ पांच प्रतिशत दलितों से ही सरोकार रखता है. देश के 95 फ़ीसदी दलित आज भी भेदभाव का शिकार है, उन्हें अवसर नहीं मिल रहे हैं.”
हालांकि दलित विचारक चंद्रभान प्रसाद निजीकरण का समर्थन करते हैं. उनका कहना है, “आज़ादी के बाद जितने दलितों को फैक्ट्रियों ने ऊंची जातियों के चंगुल से आज़ाद कराया है, उतना किसी सरकारी योजना ने नहीं कराया.”
वो कहते हैं, “जब हम आज शॉपिंग मॉल में जाते हैं तो क्या किसी दुकानदार से यह पूछते हैं कि वो किस जाति का या फिर चाऊमिन बनाकर देने वाले की जाति से आपको कोई मतलब है.”
वो कहते हैं कि आज दलितों में भी करोड़पति पैदा हो रहे हैं, इसलिए पूंजीवाद जाति आधारित पेशों को ख़त्म कर देगा और इससे जातिगत भेदभाव कमज़ोर होगा.
हीरोइज़्म
जाति के आधार पर होने वाला भेदभाव अब भी एक बड़ी समस्या है. पिछले साल हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एक छात्र ने यह कहते हुए आत्महत्या कर ली कि उसके साथ भेदभाव हो रहा था.
डॉ. शंकर खोबरागड़े नागपुर में एक बड़ा अस्पताल चलाते हैं. वो कहते हैं, “मेडिकल कॉलेज में जब हम जाते हैं, तो रैगिंग के दौरान ही दलित छात्रों को और अधिक अपमानित होना पड़ता है और यह सिलसिला चलता रहता है. इतना ही नहीं, विदेश में जाने पर कई लोग वहां के लोगों को ऊंची नीची जाति का भेदभाव समझाने लगते हैं,”
चुनावों के सवाल पर कई दलित अच्छा नेता न मिलने की शिकायत करते हैं. दलितों में ऐसी आवाज़ें कम ही सुनने को मिलती हैं, जो भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का खुलकर समर्थन करें.
कई दलित युवाओं को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आकर्षित करते हैं लेकिन नागपुर में स्थानीय पत्रकार मिंलिंद कीर्ति राहुल बनाम मोदी की बहस को लोकतंत्र के लिए ख़तरा मानते हैं.
वो कहते हैं, “सवाल राहुल या मोदी का नहीं है, बल्कि सवाल लोकतंत्र में हीरोइज़्म को मिल रहे बढ़ावे का है. संसदीय लोकतंत्र में हीरोइज़्म का कोई महत्व नहीं है. जब हीरोइज़्म की बात उठती है तो उसमें तानाशाही की तरफ़ जाने का ख़तरा रहता है. अगर हीरोइज़्म को बढावा दिया गया, तो जो आज पाकिस्तान में हो रहा है, वही कल भारत में देखने को मिल सकता है.”
वहीं सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी रामेश्वर मेश्राम कहते हैं कि कांग्रेस और भाजपा के अलावा तेज़ी से उभर रही आम आदमी पार्टी अगर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ कार्रवाई करती है, तो उसे समर्थन दिया जा सकता है.
'कोई फ़र्क नहीं'

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वहीं दलित सामाजिक कार्यकर्ता भैया जी खैरकर राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को एक ही सिक्के के दो पहलू मानते हैं. वो कहते हैं, “कांग्रेस को हम बहुत समय तक इसलिए जिताते रहे कि हमें ब्राह्मणवादियों को हराना है. लेकिन दलितों का इन दोनों में से किसी ने भला नहीं किया. अगर ये हमें अपना समझते, तो हमारे समुदाय की आज यह हालत नहीं होती.”
वे पूछते हैं, “बीजेपी और कांग्रेस में अंतर क्या है. क्या मोदी शिक्षा नीति में बदलाव करें, आरक्षण नीति में बदलाव करेंगे या विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव करेंगे. तो कुल मिलाकर मोदी और राहुल गांधी एक ही रंगमंच के किरदार हैं. अभी कांग्रेस अपना किरदार निभा रही है, उसके बाद मोदी आ जाएंगे.”
उत्तर प्रदेश में मायावती तो बिहार में रामविलास पासवान जैसे दलित नेता राष्ट्रीय फलक पर हैं, लेकिन दलितों का कहना है कि उन्हें कोई ऐसा नेता नहीं दिखता जिसकी राष्ट्रव्यापी अपील हो.
नागपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली नलिनी भोये रामटेके इसके लिए मौजूदा चुनावी तंत्र को ज़िम्मेदार ठहराती हैं.
वो कहती हैं, “चुनावी व्यवस्था में सब पार्टियों की प्राथमिकता सिर्फ़ सत्ता हासिल करना है. जनता की समस्याओं से उन्हें कोई सरोकार नहीं है. इसलिए हम तो बहुत दुविधा में फंसे है कि किसे वोट दें और किसे नहीं.”
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