'मुशर्रफ़ की बीमारी और मुज़फ़्फ़रनगर का दर्द'

मुज़फ़्फ़रनगर
इमेज कैप्शन, दंगा पीड़ितों को सरकार राहत कैंपों से हटा रही है. ज़्यादातर राहत कैंप बंद किए जा चुके हैं.
    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

पाकिस्तान से छपने वाले उर्दू अख़बारों में पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पर चले रहे मुक़दमों और उनकी क़ानूनी परेशानियों से जुड़ी ख़बरें सुर्खियां बनीं.

भारत से प्रकाशित होने वाले उर्दू अख़बारों में एक तरफ़ दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार और उसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल छाए थे तो दूसरी तरफ़ मुज़फ़्फरनगर दंगों और उनसे जुड़े बयानों को सुर्खियां बनाया गया.

शनिवार को भारत के उर्दू अख़बारों के पहले पन्नों पर भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रेस कांफ्रेंस को प्रमुखता मिली.

मुसलमानों के लिए क्या?

रोज़नामा सहारा ने मनमोहन सिंह के उस बयान को सुर्खी बनाया जिसमें कहा गया था कि मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए घातक होगा और क्या अहमदाबाद की ग़लियों में मारकाट मचाने से कोई मज़बूत नेता हो सकता है.

अरविंद केजरीवाल
इमेज कैप्शन, दिल्ली के नए सीएम अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी पूरे हफ़्ते अख़बारों में छाई रही.

दिल्ली से प्रकाशित उर्दू अख़बार हमारा समाज ने भी सुर्ख़ी लगाई मनमोहन सिंह ने किया अफ़सोस का इज़हार, दस साल में नहीं कर सके मुसलमानों के लिए कोई ख़ास काम, कमेटियों और कमीशनों में उलझाकर रखने की कोशिश.

अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा कि मुसलमानों ने हमेशा कांग्रेस का साथ दिया है लेकिन पार्टी की लगातार बेवफ़ाई के कारण मुसलमान अब कांग्रेस से बचने लगे हैं. और सवाल किया है कि कांग्रेसी नेताओं को इस बात का आंकलन करना चाहिए कि ऐसा क्यों है और इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है.

अख़बार लिखता है कि चुनावों से पहले सरकार के पास इतना वक़्त तो है ही कि वह सांप्रदायिक हिंसा बिल पास कर सके और सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशें लागू करा सके.

मुलायम से मोह भंग

तक़रीबन पूरे हफ़्ते केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से जुड़ी ख़बरें छाई रहीं.

हिंदुस्तान एक्सप्रेस अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा कि दंगों के बाद मुसलमानों का मुलायम सिंह यादव से मोहभंग हो रहा है. मुसलमान धीरे-धीरे उनसे नाराज़ हो रहे हैं जो नेक शगुन नहीं है.

पाकिस्तान से प्रकाशित होने वाले उर्दू अख़बारों में रोज़नामा नवाए वक़्त ने पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को पेश आ रही क़ानूनी दिक़्क़तों और उनकी बीमारी को संपादकीय पन्ने पर जगह दी.

मुशर्रफ़ की तबीयत

परवेज़ मुशर्रफ़
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की बीमारी की ख़बर भी उर्दू अख़बारों में प्रमुखता से प्रकाशित की गई.

अख़बार लिखता है कि अदालत जाते वक़्त परवेज़ मुशर्रफ़ की अचानक तबीयत ख़राब होने से अदालत ने उन्हें हाज़िर न होने की छूट दे दी. अगर उन्हें इलाज के लिए देश से बाहर भेजना पड़े, तो भी इसका फ़ैसला करने का हक़ सिर्फ़ अदालत को है जबकि सरकार का काम सिर्फ़ उन आदेशों का पालन करना है.

जंग अख़बार के संपादकीय पेज पर छपे एक लेख में इस बात पर बहस हुई है कि क्या परवेज़ मुशर्रफ़ को ग़द्दारी के मुक़दमे से निकलने में कामयाबी मिल सकती है.

कराची के अख़बार वक़्त ने मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के प्रमुख अलताफ़ हुसैन के हवाले से कहा है कि अलताफ़ हुसैन के मुताबिक़ अगर उर्दू बोलने वाले सिंधियों को सिंध का हिस्सा नहीं बनाना चाहते तो फिर उर्दूभाषी सिंधियों का अलग सूबा बना दिया जाए.

अलताफ़ ने आगे कहा है कि बात अगर सिंध से बढ़ी तो मुल्क़ तक जा सकती है. उनके मुताबिक़ सिंध में उर्दू बोलने वालों से सौतेला व्यवहार हो रहा है. उन्होंने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के मुखिया बिलावल भुट्टो पर आरोप लगाया है कि वे पाकिस्तान को कई हिस्सों में तोड़ना चाहते हैं.

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रेस वार्ता को पाकिस्तान से प्रकाशित होने वाले तमाम उर्दू अख़बारों ने जगह दी है.

नवाए वक़्त ने मनमोहन सिंह के हवाले से बताया है कि परवेज़ मुशर्रफ के समय दोनों देशों के रिश्ते सुधरे थे और दोनों समझौते के क़रीब थे लेकिन मुशर्रफ़ के सत्ता से हटने और कई दूसरे कारणों से बात आगे नहीं बढ़ पाई.

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