जो चेहरा कुदरत बनाए उसे डॉक्टर न रच पाए.....

आमतौर पर कहते हैं कि सूरत पर न जाएँ सीरत देखें. लेकिन अगर किसी का चेहरा बुरी तरह खराब हो चुका हो तो बहुत सी अनचाही नज़रें उसकी सूरत पर आकर टिक ही जाती हैं.

<link type="page"> <caption> तेज़ाब हमले के बाद ज़िंदा लाश हूँ: अनु</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130308_acid_attack_victim_anu_va.shtml" platform="highweb"/> </link>

एसिड अटैक का शिकार हुए लोगों का चेहरा भी अकसर तेज़ाब से झुलस जाता है, किसी की आँखों पर से पलकें ही जल जाती हैं या नथुने इस कदर जल चुके होते हैं कि साँस लेने में मुश्किल होने लगती है. ऐसे में इनके चेहरे को ठीक करने की कोशिश करना बड़ी चुनौती है और ये ज़िम्मा सर्जन के कंधों पर होता है.

डॉक्टर रवि शर्मा पेशे से सर्जन हैं और इस काम की दिक्कतें बखूबी समझते हैं. वे बताते हैं कि इलाज इस बात पर निर्भर करता है चेहरा किस हद तक जला है, कौन सा हिस्सा खराब हुआ है, तेज़ाब की तीव्रता कम थी या ज़्यादा और फर्स्ट एड कितना जल्दी ये देर से मिला.

त्वचा निकालर नए हिस्से पर लगाई जाती है

इलाज अलग-अलग चरणों में होता है. पहले तो दवाओं से ठीक करने की कोशिश होती है. अगर दो से तीन हफ्तों में किसी के घाव ठीक नहीं होते तो दूसरे चरण में स्किन ग्राफटिंग’ करनी पड़ती है.

स्किन ग्राफटिंग में पीड़ित के शरीर से त्वचा की एक पतली परत ली जाती है और जले हुए हिस्से पर नई त्वचा की परत लगा दी जाती है. मसलन कूल्हे से ली गई त्वचा चेहरे के घाव भरती है. अगर जले हुए हिस्से में खून की सप्लाई सही होत है वो हिस्सा धीरे धीरे ठीक हो जाता है.

<link type="page"> <caption> एसिड अटैक की पड़ितों की ज़िंदगी तस्वीरों में</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130308_acid_attack_gallery_va.shtml" platform="highweb"/> </link>

आमतौर पर पीड़ित के ही शरीर के किसी हिस्से ली त्वचा की एक परत निकालकर उसके चेहरे पर लगाई जाती है. लेकिन कई बार पीड़ित इतनी बुरी हालत में होती है कि तुरंत उसके शरीर के किसी हिस्से से त्वचा नहीं ली जा सकती.

<link type="page"> <caption> दिल्ली में पानी की तरह बिकता है तेज़ाब</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130308_acid_availabiltiy_va.shtml" platform="highweb"/> </link>

ऐसे में अस्थाई तौर पर दूसरे व्यक्ति की त्वचा लेकर भी लगा दी जाती है पर ये स्किन थोड़े दिन तक ही काम करती है लेकिन अंतत पीड़ित को ही अपने शरीर के हिस्से की त्वचा देनी पड़ती है.

पीड़ित के लिए ये प्रक्रिया आसान नहीं होती. मैं जब एसिड अटैक की पीड़ित अनु से मिली थी तो शरीर के घाव दिखाते हुए उसका यही कहना था- शरीर के एक हिस्से को खुरोच कर दूसरे हिस्से का घाव भरना...ये भी कोई ज़िंदगी है.

'जो भगवान ने रचा उसे डॉक्टर दोबारा कैसे बनाए'

डॉक्टरों के लिए भी ये काम चुनौती भरा होता है.डॉक्टर रवि बताते हैं, "जब शरीर के एक हिस्से से त्वचा निकालकर चेहरे पर लगाई जाती तो कई बार स्किन का रंग आपस में मेल नहीं खाता. बाद में लगाई गई त्वचा वैसे भी उतनी अच्छी नहीं होती. अगर पीड़ित पुरुष है तो ग्राफट करके लगाई गई त्वचा में दाढ़ी नहीं आएगी. ग्राफटिंग से लगाई गई त्वचा का रंग गहरा सा हो जाता है. ऐसा लगता है कि मानो अलग से कोई धब्बा हो. ये ज़रूर है कि इससे पीड़ित के घाव भर जाते हैं."

ग्राफटिंग की प्रक्रिया के बाद डॉक्टर देखते हैं कि किन हिस्सों के रिकन्स्ट्रक्शन की ज़रूरत है.

मिसाल के तौर पर कई बार तेज़ाब हमले में पलकें जल जाती हैं.ऐसे में आँख खुली रह जाती है और आँख खराब होने का डर रहता है. ऐसे मामलों में पलकें दोबारा बनानी पड़ती हैं.कई बार तेज़ाब से जलने के बाद पीड़ित का मुँह छोटा हो जाता है और वो खाना तक नहीं खा पाती.

चेहरा खो जाने का सदमा

तेज़ाब से हमले के बाद चेहरा खो जाने का सदमा मनोवैज्ञानिक स्तर भी पर पीड़ित के लिए तकलीफदेह होता है. उनके मनोबल पर गहरा असर होता है, उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है और वे खुद को अलग-थलग महसूस करती हैं.

इसलिए कुछ सर्जरी इसलिए करनी पड़ती है ताकि चेहरा देखने में ठीक लगे जो कॉसमेटिक सर्जरी के तहत आता है.

कॉस्मेटिक सर्जरी एक लंबी और तकलीफदेह प्रक्रिया है. लेकिन खुद डॉक्टर भी कुदरत के आगे हार मान लेते हैं. डॉक्टर रवि कहते हैं, “मेडिकल साइंस ने कितनी भी तरक्की कर ली हो लेकिन किसी के चेहरे को वैसा ही बना देना जैसा वो कुदरती तौर पर था ये लभगभ नामुमकिन है. भगवान ने जो बनाया है वो इंसान दोबारा नहीं बना सकता.”

भारत में बहुत सी पीड़ितों को सही समय पर इलाज और सर्जरी कराने का मौका नहीं मिलता क्योंकि ये इलाज बहुत मंहगा होता है.

सही समय पर सर्जरी होने से क्या फायदा हो सकता है केटी पाइपर इसकी मिसाल हैं. तेज़ाब फेंके जाने के बाद न सिर्फ उनका चेहरा जल गया था बल्कि एक आँख की रोशनी भी चली गई थी. उन्हें करीब 100 ऑपरेशनों से गुज़रना पड़ा. दो साल तक उन्हें दिन में 23 घंटों तक एक खास प्रेशर मास्क पहनकर रहना पड़ा. लेकिन आज वो देख सकती हैं.

ब्रिटेन के डॉक्टर चार्ल्स विवा दुनिया के कई हिस्सों में महिलाओं की सर्जरी कर चुके हैं. वे कहते हैं कि ये ये सर्जरी इन महिलाओं का चेहरा ही नहीं ठीक करती बल्कि उनका आत्मसम्मान वापस दिलाने की भी एक कोशिश है.