
जब गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे तब उजीबेन 13 साल की थी.
उजीबेन काकड़िया के चेहरे पर पड़ी लकीरें बताती हैं कि उन्होंने इतिहास को अपने सामने बनते बिगड़ते देखा.
लेकिन गुजरात के सूरत शहर में रहने वाली 110 साल की इस बुज़ुर्ग महिला ने उस समय ख़ुद एक तरह का इतिहास रच दिया जब वो 13 दिसंबर को गुजरात विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव के पहले दौर में अपना वोट डालने मतदान केंद्र पहुँच गईं.
चलने-फिरने और सुनने-देखने से लाचार इस महिला ने अपने परिवार वालों को ये कहकर हतप्रभ कर दिया कि वो अपने वोट का इस्तेमाल करना चाहती हैं.
सूरत की एक मध्यवर्गीय कॉलोनी के उनके घर में जब मैं उजीबेन काकड़िया से मिलने पहुँचा तो वो लाल साड़ी में लिपटी अपने ड्राइंग रूम में बैठी थीं.
मैने बातचीत की शुरुआत करना चाही तो उनके नाती तुलसी भाई ने बताया कि वो कुछ नहीं सुन सकतीं.
'वोट देना ही है'
अपनी नानी के कान में उन्होंने चिल्लाकर बताया कि पत्रकार मिलने आए हैं.
एक सौ दस वर्ष की कृषकाय देह और देखने-सुनने की लाचारी के बावजूद उन्होंने अस्पष्ट गुजराती में जवाब दिया – वोट तो देना ही चाहिए.
उजीबेन सूरत में अपनी बेटी, दामाद, नाती-नातिनों और पड़नातियों के साथ रहती हैं.
"गाँधी बापू को मैंने देखा था. वो घोड़ागाड़ी में हमारे गाँव आया था"
उजीबेन काकडिया
मेरे सवालों को उनतक तुलसी भाई ने पहुँचाया और उनकी बात फिर मुझे समझाई.
महात्मा गाँधी जब दक्षिण अफ़्रीक़ा में रंगभेद विरोधी आंदोलन छेड़ने के बाद हिंदुस्तान लौटे, उस वक़्त उजीबेन काकड़िया तेरह वर्ष की थीं.
उन्होंने कहा, गाँधी बापू को मैंने देखा था. वो घोड़ागाड़ी में हमारे गाँव आया था.
लेकिन अब उनकी स्मृति उनका साथ नहीं दे पा रही है. उन्हें बीच की कई घटनाएँ याद नहीं हैं.
पर एक महामारी की डरावनी यादें अब भी काले साए की तरह उनके साथ रहती हैं.
उस बीमारी को वो ‘मिरजी’ जैसे नाम से पुकारती हैं.
'मिरजी'

उजीबेन का जन्म साल 1902 में हुआ था.
अब उन्हें सन याद नहीं है पर उजीबेन कहती हैं कि मिरजी बीमारी के प्रकोप से बहुत सारे लोग मारे गए थे. जैसे ही इस बीमारी का पता चलता था, लोग अपना घर और गाँव छोड़कर डर के मारे खेतों में चले जाते थे.
उनके पति की मृत्यु तभी हो गई थीं जब उनकी बेटी लाडूबेन सिर्फ चार साल की थीं.
आज लाडूबेन की उम्र 78 साल है और ख़ुद उनके नाती-पोते मौजूद हैं.
उजीबेन के झुर्रियों भरे पोपले चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेने की अपनी इच्छा को मैंने दबाया नहीं.
लेकिन जैसे ही मैंने उनके चेहरे को छुआ, उनकी रोशनी-हीन आँखों में आँसू छलक उठे.
उजीबेन ने अपनी लगभग दृष्टिहीन आँखों से आँसू पोंछे...मैं भी फिर वहाँ ज़्यादा देर नहीं ठहर सका था.
एक ऐसी महिला जो उम्र के आख़िरी पड़ाव में भी गुप्त मतदान के अपने हक का इस्तेमाल करना चाहती हो, उनसे ये पूछना मैंने उचित नहीं समझा कि आपने किसे वोट दिया !








