'नाकामी' छिपाने के लिए विदेशी हाथ का सहारा?

 मंगलवार, 21 अगस्त, 2012 को 17:47 IST तक के समाचार

पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ फैली हिंसात्मक अफवाहों के पीछे भारत सरकार ने बाहरी ताकतों को ज़िम्मेदार ठहराया, जिसके तुरंत बाद असम के मुख्यमंत्री ने भी कहा था कि उनका शक सही निकला.

हालांकि उनका शक पूर्वोत्तर के लोगों के पलायन से जुड़ा नहीं था बल्कि असम के दंगों को लेकर था.

मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा कि असम में बोडो और मुसलमान समुदाय के बीच हुई हिंसा के पीछे भी विदेशी हाथ था.

असम में इन दोनों समुदायों के बीच के तनाव का एक इतिहास रहा है और इससे पहले कभी राज्य सरकार ने इस समस्या के लिए विदेशी हाथ को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया था.

जिस तरह से केंद्र और राज्य सरकारों ने बीते दिन हुई जातीय हिंसा और फिर पूर्वोत्तर के लोगों के बीच फैली अफरा-तफरी को संभाला, उसे देख कर सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए विदेशी हाथ के सिर ठीकरा फोड़ रही है?

वरिष्ठ पत्रकार हरतोष सिंह बल और पूर्वोत्तर मामलों पर विश्लेषक सुबीर भौमिक का तो यही मानना है.

सबूत दे सरकार

"न तो सरकार असम के दंगे रोकने में कामयाब रही और न ही हाल ही में पूर्वोत्तर के लोगों में बैठे भय को दूर करने में. इसके अलावा असम में हिंसा के बाद विस्थापित हुए हज़ारों-लाखों लोगों को अपने घर भेजने में भी सरकार नाकाम रही. ऐसे में अपने निकम्मेपन को छिपाने के लिए सरकार विदेश ताकतों पर इल्ज़ाम डालने की कोशिश कर रही है"

हरतोष सिंह बल, वरिष्ठ पत्रकार

बीबीसी से बातचीत में हरतोष सिंह बल ने कहा, “न तो सरकार असम के दंगे रोकने में कामयाब रही और न ही हाल ही में पूर्वोत्तर के लोगों में बैठे भय को दूर करने में. इसके अलावा असम में हिंसा के बाद विस्थापित हुए हज़ारों-लाखों लोगों को अपने घर भेजने में भी सरकार नाकाम रही. ऐसे में अपने निकम्मेपन को छिपाने के लिए सरकार विदेश ताकतों पर इल्ज़ाम डालने की कोशिश कर रही है.”

वहीं विश्लेषक सुबीर भौमिक का कहना है कि लोगों का ध्यान राहत कार्य से हटाने के लिए सरकार ऐसी रणनीति अपना रही है.

उन्होंने कहा कि अगर सरकार ये कहने की कोशिश कर रही है कि बांग्लादेश में मौजूद कुछ पाकिस्तानी तत्व असम में हिंसा पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, तो ऐसा मानना मुश्किल है.

सुबीर भौमिक ने कहा, “बांग्लादेश सरकार हमेशा से ही भारत-विरोधी तत्वों पर लगाम लगाने में भारत सरकार का साथ देती आई है. ऐसे में ये मानना मुश्किल है कि बांग्लादेश का कोई गुट ऐसा करने में सफल रहा हो. जहां तक दंगों की बात है, तो अगर सरकार के पास कोई सबूत है तो वे उसे पेश करें. इस तरह की बयानबाज़ी से लोगों का ध्यान बांटने की सरकार की कोशिश सफल नहीं होगी.”

राज्य सरकार की कमज़ोरी

विश्लेषकों का कहना है कि केंद्र सरकार असम की मौलिक समस्याओं को संबोधित करने में नाकाम रही है

असम सरकार ने असम दंगों के कुछ ही दिनों बाद वादा किया था कि 15 अगस्त तक सभी शरणार्थियों को उनके घर भेज दिया जाएगा.

लेकिन बीबीसी की टीम ने हाल ही में शिविरों का दौरा किया और पाया कि अब भी हज़ारों लोग राहत शिविरों में दयनीय हालातों में रहने को मजबूर हैं.

सुबीर भौमिक ने बीबीसी को बताया कि चरमपंथी संगठन नैश्नल डैमोक्रेटिक फ्रन्ट ऑफ बोडोलैंड के उदारवादी गुट ने शिविरों में रह रहे मुसलमानों को धमकी दी है कि जब तक वे अपना भारतीय पहचान पत्र पेश नहीं करते, तब तक उन्हें घर लौटने नहीं दिया जाएगा.

उन्होंने कहा, “चूंकि असम सरकार और एनडीआरएफ के बीच बातचीत का दौर जारी है, इसलिए सरकार इस संगठन की ग़ैर-कानूनी हरकतों पर पर्दा डाल रही है. अगर सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर होती तो एनडीआरएफ को कभी ज़ोर-आज़माइश न करने देती. अगर सरकार को किसी पर इल्ज़ाम लगाना ही है तो ऐसी संगठनों पर लगाए जो शांति बहाली के बजाय तनाव बढ़ाने का काम कर रहे हैं.”

नस्लीय या सांप्रदायिक हिंसा?

"चूंकि असम सरकार और एनडीआरएफ के बीच बातचीत का दौर जारी है, इसलिए सरकार इस संगठन की ग़ैर-कानूनी हरकतों पर पर्दा डाल रही है. अगर सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर होती तो एनडीआरएफ को कभी ज़ोर-आज़माइश न करने देती. अगर सरकार को किसी पर इल्ज़ाम लगाना ही है तो ऐसी संगठनों पर लगाए जो शांति बहाली के बजाय तनाव बढ़ाने का काम कर रहे हैं"

सुबीर भौमिक, पूर्वोत्तर मामलों के जानकार

वरिष्ठ पत्रकार हरतोष सिंह बल ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि असम में हुई हिंसा दरअसल प्रजातीय हिंसा थी जिसे कांग्रेस सरकार ने सांप्रदायिक रंग दिया.

सुबीर भौमिक का भी कहना है कि बोडो समुदाय और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बीच का तनाव ज़मीन को लेकर है न कि किसी धार्मिक भावना को लेकर.

हरतोष सिंह बल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “असम में हुए दंगों को मीडिया के साथ-साथ सरकार और विपक्षी दलों ने भी एक सांप्रदायिक दंगे के रूप में दर्शाने की कोशिश की. कांग्रेस ने इसी तरह की राजनीति दूसरे राज्यों में भी इस्तेमाल की और असम में भी यही हुआ. इस स्थिति की तुलना 1984 के दंगों से की जा सकती है. हम सिर्फ भाजपा को ही क्यों दोष देते हैं? सच्चाई तो ये है कि कांग्रेस भी अपने फायदे के लिए सांप्रदायिक राजनीति खेलती है.”

उन्होंने कहा कि असम में दंगों के दौरान और दंगों के बाद की स्थिति को संभालने के बजाय सरकार ने विदेशी ताकतों पर इल्ज़ाम लगा दिया जो कि अपनी नाकामी छिपाने का ही एक संकेत है.

उधर सुबीर भौमिक का कहना है कि जब तक सरकार असम की मौलिक समस्याओं को गंभीरता से संबोधित नहीं करती, तब तक ऐसे दंगें भविष्य में भी खतरा बन कर असम पर मंडराते रहेंगें.

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