बिहार: गोपालगंज विधानसभा उपचुनाव में किसकी साख दांव पर, कौन मारेगा बाजी?

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- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं. एक सीट है गोपालगंज और दूसरी सीट है मोकामा.
सूबे में इस बार का चुनाव बदली परिस्थितियों का चुनाव है. नीतीश अब एनडीए के बजाय महागठबंधन के साथ हैं. नीतीश-लालू फिर से एक साथ आ गए हैं. नीतीश अब लालू यादव और उनके परिवार के बजाय भाजपा पर हमलावर हैं. वो अब भाजपा के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की बात कर रहे हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि क्या इन दोनों विधानसभा सीटों के परिणाम सूबे की सियासत के रुख को बदलने का माद्दा रखते हैं? क्या नीतीश-लालू के साथ आ जाने भर से उनका वोट बैंक भी साथ आ रहा है?
क्या दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे से तालमेल बिठा पा रहे हैं? क्या नीतीश के बगैर भाजपा इन दोनों सीटों को जीतने में सफल रहेगी? क्या नीतीश कुमार की साख बरकरार है? क्या सूबे के भीतर चुनावी समीकरण बदल रहे हैं, और यदि बदल रहे हैं तो किस हद तक?
इन्हीं तमाम सवालों के सीधे जवाब तो नहीं, लेकिन गोपालगंज के मतदाताओं से बातचीत में रुझान ज़रूर मिलते हैं.
क्या कह रहे गोपालगंज विधानसभा के वोटर?

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गोपालगंज में ज़िला कलेक्ट्रेट के सामने चाय की दुकान चलाने वाले राज कपूर शाह बताते हैं कि गोपालगंज में दो ही दलों के बीच लड़ाई है. एक है लालटेन और दूसरा है भाजपा. वे आमतौर पर भाजपा को वोट करते रहे हैं लेकिन इस बार बदलाव के साथ हैं.
महागठबंधन ने इस बार प्रयोग के तौर पर एक सर्राफा कारोबारी को अपना उम्मीदवार बनाया है.
शहर के सर्राफा कारोबारी विमल कुमार की मानें तो महागठबंधन को इस प्रयोग से कोई खास फायदा नहीं मिलने वाला. वे कहते हैं, "महागठबंधन ऐसी तमाम कोशिशें ध्रुवीकरण को रोकने के लिए कर रहा है लेकिन यह स्वांग अधिक है."
"इस चुनाव में सारी पार्टियां शहर के मूल मुद्दे पर बात नहीं कर रहीं. न कोई गोपालगंज के बाढ़ पर बात कर रहा है और न ही कोई कारोबार-धंधे पर. किसी सरकारी दफ्तर में चढ़ावे के बगैर काम नहीं हो रहा."
शहर के जंगलिया मोहल्ले में किराना का दुकान चलाने वाले शाहनवाज़ के नज़रिए से गोपालगंज में भाजपा मजबूत है क्योंकि दिवंगत विधायक सुभाष सिंह यदि किसी का अच्छा नहीं करते थे तो किसी का बुरा भी नहीं करते थे.
शहर से बाहर स्थित ग्रामीण इलाके भगवानपुर के ललन कुमार बिन्द कहते हैं, "इस बार यहां से भाजपा की हालत खराब है. पिछड़ा-अतिपिछड़ा वोट महागठबंधन के साथ है. पिछले बार यह वोट नीतीश की वजह से भाजपा को मिला था. मुकेश सहनी के समर्थन की बात से भी निषाद लोग महागठबंधन को वोट देगा. नगर निकाय चुनाव में आरक्षण को लेकर भी लोग भाजपा से नाराज हैं."
जब हमने उनसे भाजपा के साथ सहानुभूति फैक्टर को लेकर सवाल किए तो उनका जवाब था कि 'सिर्फ सहानुभूति से काम नहीं चलने वाला. काम भी तो होना चाहिए. जैसे वो दियर के इलाके में रहते हैं. हर बार बाढ़ से तबाह होते हैं लेकिन लगातार भाजपा के रहने के बावजूद इधर कुछ नहीं हुआ.'

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साल 2015 और 2020 में क्या हुआ?
गोपालगंज की सदर विधानसभा पर साल 2005 से ही भाजपा का कब्जा रहा. भाजपा के सुभाष सिंह जीतते रहे. हालांकि साल 2015 के चुनाव के दौरान जीत और हार का मार्जिन लगभग 5000 वोटों का ही रहा था. तब सुभाष सिंह को जहां लगभग 78000 वोट मिले थे, वहीं राजद उम्मीदवार रियाजुल हक 'राजू' को तब लगभग 73000 वोट मिले थे.
2020 के चुनाव के दौरान सुभाष सिंह और अन्य प्रत्याशियों के बीच जीत-हार का बड़ा फासला रहा. सुभाष सिंह को जहां साल 2015 की ही तरह लगभग 78,000 वोट मिले वहीं बसपा के टिकट पर खम ठोंक रहे अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव को लगभग 41,000 वोट मिले. तो वहीं महागठबंधन उम्मीदवार के तौर पर उतरे आसिफ गफूर को लगभग 36,000 वोट ही मिल पाए.

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गोपालगंज में इस बार नया-पुराना क्या?
इस उपचुनाव से पहले महागठबंधन का स्वरूप बदला है. तेजस्वी यादव राजद पर चस्पा किए जाने वाले माय (मुस्लिम+यादव) के बरक्स ए टू जेड की बात कर रहे हैं और ऐसी कोशिशें करते भी दिख रहे हैं. जैसे पिछले उपचुनाव में जहां उन्होंने तारापुर विधानसभा से वैश्य बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले एक व्यक्ति को टिकट दिया था.
वहीं इस बार गोपालगंज में भी उन्होंने वैश्य बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले सर्राफा कारोबारी मोहन प्रसाद गुप्ता को अपने दल का उम्मीदवार बनाया है. हालांकि तारापुर विधानसभा का उपचुनाव राजद तब जीतने में सफल नहीं रही थी, लेकिन यह भी सच है कि तब नीतीश कुमार समेत भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने तारापुर के सीट को जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था.
क्या कह रहे अलग-अलग प्रत्याशी?

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गोपालगंज विधानसभा की सीट भाजपा ने अपने दिवंगत विधायक सुभाष सिंह की पत्नी कुसुम देवी को उम्मीदवार बनाया है. कुसुम देवी ने इस चुनावी लड़ाई पर कहा, "हम इसी बात को लेकर लोगों के बीच जा रहे हैं कि विधायक जी के अधूरे काम को पूरा करेंगे. उनके विधायक रहते इलाके में जिस तरह की शांति रहती थी, तो उसे सुनिश्चित करेंगे."
महागठबंधन ने राजद के मोहन प्रसाद गुप्ता को अपना उम्मीदवार बनाया है. चुनाव प्रचार करते हुए वे कह रहे हैं कि, 'उनके पास इलाके के विकास का विजन है. वे काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं और यदि काम नहीं कर पाएंगे तो फिर चुनाव लड़ने नहीं आएंगे.'
बीते विधानसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार अनिरुद्ध प्रसाद उर्फ साधु यादव ने अपनी पत्नी इंदिरा यादव को मैदान में उतारा है.
साधु यादव भी इस चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे. साधु यादव कहते हैं, "देखिए मेरे लिए तो विकास ही एक मात्र मुद्दा है. मैं जात-पात के बजाय जमात पर वोट मांग रहा हूँ. अपने काम के आधार पर वोट मांग रहा हूँ. पिछली बार भी मैंने 42,000 वोट हासिल किए. बीजेपी और महागठबंधन के तमाम बड़े नेता यहां जमे हैं. तो उनको किससे डर है?"
हालांकि इस सीट पर एआईएमआईएम ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है, लेकिन नॉमिनेशन में किन्हीं ग़लतियों की वजह से उन्हें पार्टी का सिंबल नहीं मिल सका है. ऐसे में उनके सामने सारे वोटरों तक सिंबल पहुंचाना भी बड़ा टास्क है. इसके अलावा यह भी देखना होगा कि क्या असदुद्दीन ओवैसी चुनाव प्रचार करने आते हैं या नहीं?
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विजय सिन्हा समेत भाजपा के दोनों पूर्व उप मुख्यमंत्रियों ने गोपालगंज में इस बीच प्रेस वार्ता करते हुए महागठबंधन के प्रत्याशी 'मोहन प्रसाद गुप्ता' पर चुनाव आयोग के समक्ष हलफनामे में झूठ बोलने के आरोप लगाए हैं.
विजय सिन्हा ने कहा, "नीतीश कुमार शराबबंदी की बात कहते हैं लेकिन उनके गठबंधन के प्रत्याशी पर शराब के अवैध कारोबार के मामले में एफ़आईआर हुई है, और वह जानकारी प्रत्याशी ने छिपा ली. भाजपा इस मामले को लेकर चुनाव आयोग तक जाएगा. इसके अलावा यह नीतीश कुमार के लिए भी नैतिकता का तकाजा होगा कि वे ऐसे प्रत्याशी का प्रचार करेंगे या नहीं?"

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महागठबंधन प्रत्याशी मोहन प्रसाद गुप्ता से लगातार कोशिशों के बाद भी इन आरोपों पर जवाब नहीं मिल सका है.
हालांकि गोपालगंज में प्रचार करने पहुंचे बिहार सरकार के सूचना प्रौद्यीगिकी मंत्री व राजद नेता इसराइल मंसूरी ने मीडियाकर्मियों से बातचीत में कहा, "आरोप लगा देने भर से किसी की छवि धूमिल नहीं होती. भाजपा का यह आरोप राजनैतिक है. गोपालगंज की जनता महागठबंधन के पक्ष में मजबूती से खड़ी है."
स्थानीय पत्रकार सुनील कुमार तिवारी कहते हैं, "पहले लगा था कि सुभाष सिंह के न रहने की वजह से उनकी पत्नी (कुसुम देवी) को इसका पूरा लाभ मिलेगा. कहीं न कहीं मिल भी रहा है लेकिन महागठबंधन ने वैश्य समाज से अपना उम्मीदवार उतार दिया है. तो भाजपा के मजबूत वोट बैंक कहे जाने वाले वैश्य समाज में सेंध लगती दिख रही है."
"इसके अलावा नीतीश और लालू के साथ आने की वजह से महागठबंधन में अति पिछड़ा वोट जुड़ता दिख रहा है. इससे तो यही लग रहा कि यहां महागठबंधन और भाजपा में आमने-सामने की लड़ाई है."
साधु यादव फैक्टर पर उन्होंने कहा, "पिछली बार साधु यादव को यादव बिरादरी का सपोर्ट मिला था. इस बार यादव बिरादरी के लोग तेजस्वी की तरफ देख रहे हैं."
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