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गुरुग्राम में ‘मस्जिद पर हमले’ की पूरी कहानी-ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोरा कलां, गुरुग्राम
गुरुग्राम के भोरा कलां गांव की मार्केट में जैसे ही हम पहुंचे, आसपास के दुकानदारों ने आपस में बातें करनी शुरू कर दी, एक और मीडिया वाले आए हैं.
इन्हीं में से एक दुकानदार ने तेज़ आवाज़ में हमसे कहा, "यहां पर सब शांति है, अच्छा-अच्छा लिखना गांव के बारे में, बदनामी नहीं करवाना."
गांव के पुराने पोस्ट ऑफ़िस के पास जहां दो समुदायों के बीच झड़प हुई थी, वहां मौजूद एक व्यक्ति ने हमसे कहा, "सुबह से कई मीडिया वाले आए, किसी को कुछ नहीं मिला. छोटा सा झगड़ा था, आपस में सुलझ गया है."
शांति और भाईचारे की बात सिर्फ गांव के दूसरे लोग ही नहीं, सूबेदार नज़र मोहम्मद (रिटायर्ड) भी कर रहे थे, जिन्होंने घटना की शिकायत दर्ज कराई थी.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "कल गांव में पंचायत हुई थी, वो लोग भी मौजूद थे जिनपर हमें शक था, उन लोगों ने आश्वासन दिया है कि आगे कभी ऐसा नहीं होगा, और अगर हुआ, तो इसकी ज़िम्मेदारी हमारी होगी. हमने एफ़आईआर वापस ले ली है और गांव में पहले की तरह भाईचारा क़ायम है."
गांव में शुक्रवार को माहौल शांत था लेकिन दो दिन पहले हालात बिल्कुल उलट थे.
पुराने पोस्ट ऑफ़िस के ठीक बगल में मोहम्मद के परिवार की इबादत की जगह है. इस परिवार और गांव वालों के बीच पहले हुई सहमति के मुताबिक, इस जगह को सार्वजनिक मस्जिद नहीं बनाया जा सकता है, और यहां सिर्फ परिवार के लोग इबादत कर सकते हैं. किसी इमाम को रखने की इज़ाजत नहीं है. इसलिए आसपास के लोग इसे मस्जिद मानने से भी इनकार करते हैं.
बुधवार को क्या हुआ था
नासिर हुसैन का कहना है कि वो यहीं पर (एशा) रात की नमाज़ पढ़ रहे थे, जब उन्हें बाहर से शोर सुनाई दिया.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं यहां नमाज़ पढ़ रहा था, साथ ही तीन और लोग भी नमाज़ पढ़ रहे थे. वो लोग शोर मचाते हुए आए, उनके पास लाठी डंडे थे."
नासिर कहते हैं, "वे बोले कि बाहर निकलो, तुम्हारा नमाज़ हो गया है. यहां बुज़ुर्ग बैठे थे, उन्होंने उनके साथ मारपीट की. वहां पर पुरुष मौजूद नहीं थे. महिलाएं बचाव में आईं, उनके साथ भी बदसलूकी की गई."
नासिर अपनी बात की पुष्टि के लिए वीडियो भी दिखाते हैं जो उन्होंने ख़ुद रिकॉर्ड किया था. इसमें उनके पक्ष की महिलाओं और दूसरे लोगों के बीच तीखी बहस होती दिख रही है.
उनके अनुसार ये दूसरा मौक़ा था जब लोग यहां पर पहुँचे थे.
उन्होंने कहा,"क़रीब 150 से 200 लोग आए थे. उन्होंने देखा कि सब कुछ सही था, उन्होंने कहा कि वहां कोई वैसा निर्माण नहीं था, अफ़वाहें थीं. फिर वो चले गए, लेकिन कुछ शरारती तत्व थे जो कह रहे थे कि शाम में आकर ताला लगा देंगे."
नासिर के मुताबिक़ इसके बाद शाम की घटना घटी और लोगों ने मारपीट के बाद उन्हें और उनके परिवार के लोगों को इमारत से बाहर निकाल कर गेट पर ताला लगा दिया. उनके मुताबिक़ पुलिस ने आकर उस ताले को तोड़ा.
हिंसा के पीछे की वजह क्या है?
आसपास के कई लोग नाम न बताने की शर्त पर कहते हैं, "इबादत करने परिवार और गांव से बाहर के लोग भी आते हैं. इस कारण से आसपास के लोगों में नाराज़गी है."
हालांकि कई लोगों का मानना है कि हिंसा के पीछे राजनीतिक मक़सद भी हो सकता है.
इलाक़े में सरपंच के चुनाव की गहमागहमी है और जिन लोगों का नाम एफ़आईआर में है, वो भी राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं.
हम अभियुक्त राजेश चौहान से बात करने उनके घर पहुँचे. वो इस साल सरपंच का चुनाव भी लड़ रहे हैं. वो हमें घर पर नहीं मिले, हमने उन्हें फ़ोन पर संपर्क किया लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.
हमने बाक़ी दो अभियुक्त संजय व्यास और अनिल भदौरिया से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन दोनों ने भी बात करने से इनकार कर दिया.
पीड़ित पक्ष के आस अहमद कहते हैं, "पता नहीं ये कैसे हुआ. हो सकता है चुनाव होने वाले हैं तो सांप्रदायिता फैलाने की कोशिश हो रही है."
गुरुग्राम पुलिस के एसीपी हरिंदर कुमार ने बीबीसी से कहा, "हमने जाँच के लिए एसआईटी बनाई है. हम इस मामले में उचित कार्रवाई करेंगे. हमारे इलाक़े में इस तरह की ये पहली घटना है और हम सुनिश्चित करेंगे कि आगे ऐसा कुछ नहीं हो."
पहले भी गुरुग्राम में हो चुका है नमाज़ को लेकर विवाद
खुले में नमाज़ पढ़ने को लेकर पिछले साल गुरुग्राम के कई इलाक़ों में स्थानीय निवासी और हिंदू संगठनों के कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
गुरुग्राम के सेक्टर 12-ए में ऐसे ही विरोध प्रदर्शन के बाद 28 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था. ऐसे ही साप्ताहिक प्रदर्शन सेक्टर-47 में भी हो रहे थे.
सेक्टर-47 के ग्राउंड में पूजा करते हुए विरोध प्रदर्शन किए गए.
नवंबर में गुरुग्राम के सेक्टर-12 में हिंदुवादी संगठनों ने नमाज़ के लिए पहले मंज़ूर की गई जगह पर गोवर्धन पूजा की.
अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार इस पूजा का आयोजन 'संयुक्त हिंदू संघर्ष समिति' ने किया था. भाजपा नेताओं ने भी पूजा में हिस्सा लिया.
खुले में नमाज़ के ख़िलाफ़ प्रदर्शन साल 2018 में शुरू हुए थे. वार्ताओं के बाद मुसलमान समूह खुले में नमाज़ के स्थलों की संख्या को 108 से कम करके 37 करने पर राज़ी हो गए थे. इस साल प्रदर्शन किन कारणों से शुरू हुए ये अभी साफ़ नहीं है. विवाद के बाद अब मुसलमानों ने खुले में नमाज़ पढ़ने की जगहों की संख्या कम करके 20 कर दी है.
गुरुग्राम में मुसलमान दो दशकों से खुले में नमाज़ पढ़ रहे हैं. इस विवाद के केंद्र में प्रार्थना स्थलों की कमी है. गुरुग्राम में जितने नमाज़ी हैं उन्हें जगह देने लायक़ मस्जिदें नहीं हैं.
राजनीतिक इस्लाम पर शोध कर रहे हिलाल अहमद ने बीबीसी से कहा था, "ये उग्र समूह एक नागरिक समस्या का इस्तेमाल धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए कर रहे हैं. वो मुसलमानों से कह रहे हैं कि मस्जिदों में जाकर नमाज़ पढ़ें. समस्या ये है कि पर्याप्त संख्या में मस्जिदें ही नहीं हैं."
गुरुग्राम में सिर्फ़ 13 मस्जिदें हैं जिनमें से सिर्फ़ एक ही शहर के नए इलाक़े में है. शहर में अधिकतर प्रवासी यहीं रहते हैं और काम करते हैं. मुसलमानों की संपत्तियों की निगरानी करने वाले वक़्फ़ बोर्ड के स्थानीय सदस्य जमालुद्दीन कहते हैं कि बोर्ड की अधिकतर ज़मीनें शहर के बाहरी इलाक़ों में हैं जहां मुसलमानों की आबादी बहुत कम है.
वे कहते हैं कि ऐसे इलाक़ों में 19 मस्जिदों को बंद करना पड़ा है क्योंकि वहां पर्याप्त संख्या में नमाज़ी नहीं थे. उनके अनुसार बोर्ड के पास इतना पैसा नहीं है कि गुरुग्राम के महंगे इलाक़ों में ज़मीन ख़रीद सके.
गुरुग्राम मुस्लिम काउंसिल के मुताबिक़ गुरुग्राम शहर की परिकल्पना करने वाले नगर योजनाकारों ने 42 मंदिरों के लिए जगह दी और 18 गुरुद्वारों को जगह दी. लेकिन सिर्फ़ एक मस्जिद को ही जगह दी गई. पांच साल पहले मुसलमानों की दो संस्थाओं ने धार्मिक कार्यों के लिए ज़मीन के प्लॉटों की नीलामी में हिस्सा लिया था, लेकिन वो प्लॉट नहीं ख़रीद सके थे.
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